सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समकालीन कविता किसे कहते हैं? क्या यह हिन्दी साहित्य का कोई स्थिर कालखंड है? नामकरण, प्रवृत्तियाँ एवं प्रमुख कवि | हिंदी साहित्य का इतिहास

पिछले लेख में हमने नई कविता की चर्चा की थी, जो दूसरे-तीसरे सप्तक (1951, 1959) के कवियों के साथ अपनी पहचान बना चुकी थी। नई कविता की सघन बिंब-योजना के साथ-साथ कविता में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति भी अधिक प्रमुख होने लगी, और आगे चलकर चौथे सप्तक (1979) तथा उसके बाद की पीढ़ियों के साथ जिस व्यापक, बहुस्वरीय धारा में विकसित हुई, उसे 'समकालीन कविता' कहा जाता है। पर यहाँ एक बुनियादी सवाल है — "समकालीन" किसे कहें? क्या यह किसी और कालखंड जैसा तयशुदा नाम है, या कुछ अलग? इसी सवाल से हम अपनी बात शुरू करेंगे।

एक नज़र में: समकालीन कविता नई कविता की निरंतरता से आगे बढ़ी वह बहुस्वरीय धारा है, जिसकी पहचान साठोत्तरी कविता और चौथे सप्तक (1979) के आसपास अधिक स्पष्ट हुई। इसका केंद्र आधुनिक मनुष्य की अनुभूति और जीवन-यथार्थ है, और इसके कवि किसी एक विचारधारा में बँधे नहीं थे — अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध और भवानी प्रसाद मिश्र तक, भिन्न-भिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि के रचनाकार इसमें शामिल हुए।

समकालीन कविता क्या है? (परिचय एवं पृष्ठभूमि)

"समकालीन" शब्द को समझने के लिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि यह अन्य कालखंडों (छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता) से बुनियादी तौर पर अलग ढंग का नाम है। छायावाद या नई कविता किसी निश्चित दशक में शुरू होकर एक तरह से "बंद" कालखंड बन चुके हैं, जबकि "समकालीन" शब्द का अर्थ ही है — अपने समय की, "अभी" की कविता। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार साहित्य में "समकालीन" का अर्थ पिछली एक पीढ़ी (लगभग चौदह-पंद्रह वर्ष) के दौरान लिखी गई कविता से लिया जाता है — यानी यह कोई स्थिर तिथि-सीमा नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के साथ खिसकता हुआ एक सापेक्ष शब्द है। इसी कारण समकालीन कविता की कोई निश्चित "अंत-तिथि" तय नहीं की जा सकती — यह आज भी जारी मानी जाती है।

विषय-वस्तु की दृष्टि से समकालीन कविता अपने समय के मुख्य अंतर्विरोधों और द्वंद्वों को सीधे पकड़ने का प्रयास करती है — यह किसी दार्शनिक "वाद" की कविता नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक यथार्थ के बीच से गुज़रती हुई कविता है।

नामकरण और उद्भव — चौथा सप्तक और आगे

नई कविता वाले लेख में हमने देखा था कि दूसरे-तीसरे सप्तक के साथ नई कविता अपनी पहचान बना चुकी थी। इसके बाद के दौर में अज्ञेय ने 1979 में चौथा सप्तक संपादित किया, जिसे नई कविता से समकालीन कविता की ओर संक्रमण का सप्तक माना जाता है। इसमें अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज, स्वदेश भारती, नंदकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा तथा राजेंद्र किशोर — इन सात कवियों की रचनाएँ संकलित थीं।

साठ के दशक के बाद की कविता को कई आलोचक 'साठोत्तरी कविता' भी कहते हैं — विशेषकर धूमिल जैसे कवियों की तीखी राजनीतिक-सामाजिक चेतना वाली कविता के संदर्भ में। कुछ विद्वान इसकी जड़ें और पीछे, 1930 के दशक के आसपास प्रगतिवादी चेतना में भी तलाशते हैं, हालाँकि यह मत बहुत व्यापक रूप से स्वीकृत नहीं है।

समकालीन कविता के विविध स्वर

जिस तरह नई कविता में एक साथ अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी और गांधीवादी कवि शामिल थे, समकालीन कविता में भी विविधता है — पर यहाँ यह विविधता वैचारिक "वाद" से हटकर अनुभव और पहचान की विविधता में बदल गई —

  • राजनीतिक-जनवादी स्वर — धूमिल, रघुवीर सहाय आदि।
  • चिंतनशील मुख्यधारा — कुँवर नारायण, अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा, लीलाधर जगूड़ी आदि।
  • स्त्री-विमर्श — अनामिका, कात्यायनी आदि।
  • दलित-विमर्श — ओमप्रकाश वाल्मीकि, कँवल भारती आदि।
  • आदिवासी-विमर्श — अनुज लुगुन आदि।

इसी बहुस्वरता के कारण समकालीन कविता को किसी एक पहचान या समूह की कविता कहना उतना ही मुश्किल है, जितना नई कविता को किसी एक "वाद" में बाँधना था।

नई कविता और समकालीन कविता में अंतर

यह विविधता नई कविता और समकालीन कविता के बीच के अंतर को भी स्पष्ट करती है —

  • नई कविता में व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन साधने का प्रयास था; समकालीन कविता में पलड़ा स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की ओर झुक गया।
  • नई कविता का नायक "लघुमानव" व्यक्तिगत अनुभूति से जूझता था; समकालीन कविता में यही मनुष्य अब सत्ता-व्यवस्था से सीधे उलझता, सवाल पूछता और विरोध करता दिखता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि केदारनाथ सिंह, रघुवीर सहाय व कुँवर नारायण जैसे कई कवि दोनों ही धाराओं में गिने जाते हैं — वे नई कविता के सप्तक-कवि भी थे और समकालीन कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर भी। यह दिखाता है कि दोनों धाराओं के बीच कोई तीखी विभाजन-रेखा नहीं, बल्कि क्रमिक विकास है।

काल-सीमा को लेकर विद्वानों में मतभेद

समकालीन कविता की कोई निश्चित अंत-तिथि नहीं मानी जाती, क्योंकि "समकालीन" शब्द अपने समय के साथ बदलता रहता है। इसके अतिरिक्त 1980 के आसपास हिंदी कविता में किसी निर्णायक "वापसी" या मोड़ की धारणा को लेकर भी आलोचकों में मतभेद रहे हैं।

समकालीन कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • प्रत्यक्ष सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ: सत्ता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक विसंगतियों पर सीधा, अक्सर तीखा व्यंग्यात्मक प्रहार।
  • आम आदमी का संघर्ष: नई कविता के "लघुमानव" से आगे बढ़कर अब यह आम आदमी व्यवस्था से सीधे सवाल पूछता, विरोध जताता कवि-विषय बना।
  • हाशिए की चेतना: स्त्री, दलित व आदिवासी अनुभवों को अधिक केंद्रीय स्थान मिला।
  • मुक्तछंद व सहज भाषा: बोलचाल के और भी निकट, अलंकरण-रहित सीधी भाषा का व्यापक प्रयोग।
  • व्यंग्य व विडंबना-बोध: नई कविता से विरासत में मिला यह स्वर समकालीन कविता में और तीखा हुआ।
  • बाज़ारवाद व वैश्वीकरण जैसे नए विषय: हाल के दशकों की कविता में बदलते सामाजिक-आर्थिक संबंधों पर भी दृष्टि गई।

भाषा और शिल्पगत विशेषताएँ

समकालीन कविता की भाषा नई कविता से भी अधिक सहज व बोलचाल के निकट है — अलंकरण व सघन बिंब-योजना के बजाय सीधे, कभी-कभी गद्यात्मक कथन को प्राथमिकता मिली। व्यंग्य और विडंबना इसका प्रमुख शिल्पगत हथियार बना, जिसके ज़रिए राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों पर सीधा प्रहार किया गया। मुक्तछंद यहाँ पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका है, और छंद-बंधन का प्रश्न लगभग गौण हो गया। साथ ही, हाशिए के समुदायों (स्त्री, दलित, आदिवासी) की कविता ने अपने-अपने अनुभव-क्षेत्र से नए मुहावरे, नए बिंब व नई शब्दावली भी भाषा में जोड़ी।

प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं

  • धूमिल (सुदामा पांडेय, 1936-1975): साठोत्तरी कविता के प्रमुख कवि; राजनीतिक व्यवस्था व सत्ता पर तीखे व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख कृतियाँ — संसद से सड़क तक, कल सुनना मुझे, सुदामा पांडे का प्रजातंत्र।
  • रघुवीर सहाय: नई कविता के दूसरे सप्तक से जुड़े होने के बावजूद इनकी सबसे तीखी सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य-दृष्टि समकालीन कविता में और निखरी। प्रमुख संग्रह — सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध।
  • कुँवर नारायण: नई कविता से समकालीन कविता तक निरंतर सक्रिय; चिंतनशीलता व मानवीय दृष्टि के लिए विशिष्ट।
  • अशोक वाजपेयी: समकालीन कविता की काव्य-दृष्टि और संपादकीय-साहित्यिक सक्रियता के लिए उल्लेखनीय कवि।
  • श्रीकांत वर्मा: राजनीतिक अनुभव व इतिहास-बोध को कविता में पिरोने वाले प्रमुख कवि।
  • लीलाधर जगूड़ी तथा विनोद कुमार शुक्ल: रोज़मर्रा के जीवन के सूक्ष्म ब्योरों व नए बिंब-विधान के लिए जाने जाते हैं।
  • राजेश जोशी, मंगलेश डबराल तथा अरुण कमल: अपेक्षाकृत बाद की पीढ़ी के कवि, जिन्होंने समकालीन कविता को 1980 के दशक के बाद भी जीवंत बनाए रखा।

समांतर धाराएँ — स्त्री, दलित एवं आदिवासी विमर्श की कविता

समकालीन कविता के भीतर ही तीन महत्वपूर्ण विमर्श-धाराएँ अलग से उल्लेखनीय हैं —

स्त्री-विमर्श की कविता: अनामिका तथा कात्यायनी जैसी कवयित्रियों ने नारी-चेतना, आत्मसंघर्ष व स्वतंत्रता के प्रश्नों को केंद्र में रखकर एक सशक्त काव्य-परंपरा विकसित की।

दलित-विमर्श की कविता: ओमप्रकाश वाल्मीकि तथा कँवल भारती जैसे कवियों ने जातिगत भेदभाव व शोषण के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध दर्ज किया, और हिंदी कविता में नई शब्दावली व नए अनुभव-क्षेत्र जोड़े।

आदिवासी-विमर्श की कविता: अनुज लुगुन जैसे कवियों में पहचान, अधिकार व परंपरा-संरक्षण के प्रश्न केंद्रीय हैं — यह समकालीन कविता की सबसे नई उपधाराओं में से एक है।

इसी दौर का गद्य साहित्य

समकालीन कविता के समांतर, गद्य में भी दो अलग-अलग महत्वपूर्ण स्वर उभरे। एक ओर श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य-उपन्यास "राग दरबारी" (1968, साहित्य अकादमी पुरस्कार 1969) ग्रामीण राजनीति व सत्ता-तंत्र पर वही तीखा प्रहार करता है, जो धूमिल की कविता में मिलता है — दोनों साठोत्तरी दौर की उसी व्यंग्य-चेतना के गद्य व पद्य रूप माने जा सकते हैं। दूसरी ओर, बाद के दशकों में दलित आत्मकथा-साहित्य भी हिंदी गद्य में महत्वपूर्ण रूप से उभरा। मोहनदास नैमिशराय की अपने अपने पिंजड़े (1995) और ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन (1997) ने जाति-आधारित उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव के अनुभवों को प्रत्यक्ष स्वर दिया।

आलोचना और सैद्धांतिक आधार

समकालीन कविता के मूल्यांकन को लेकर आलोचकों में भी मतभेद रहे हैं — कुछ ने इसे अपने समय के अंतर्विरोधों की सच्ची, प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति माना, तो कुछ ने इसकी सपाट, कभी-कभी नारेबाज़ी जैसी शैली पर सवाल भी उठाए। नामवर सिंह जैसे आलोचकों का काम, जो नई कविता तक केंद्रित था, आगे चलकर समकालीन कविता के मूल्यांकन का भी एक संदर्भ-बिंदु बना।

समकालीन कविता — अब तक जारी एक यात्रा

"समकालीन" शब्द की प्रकृति के कारण यह कविता किसी निश्चित अंतिम सीमा में बंद नहीं होती। हर नई पीढ़ी अपने नए अनुभवों और सामाजिक सरोकारों के साथ इस धारा को आगे बढ़ाती रहती है।

समकालीन कविता का मूल्यांकन

उपलब्धियाँ: समकालीन कविता ने हिंदी काव्य को नई कविता के अपेक्षाकृत सीमित दायरे से निकालकर व्यापक सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ तथा हाशिए के अनुभवों तक पहुँचाया। स्त्री, दलित व आदिवासी कविता को स्वतंत्र स्वर मिलना इसकी सबसे बड़ी और स्थायी देन मानी जाती है।

सीमाएँ: कुछ आलोचकों ने इसकी सीधी, "सपाट बयानी" शैली को कलात्मक सघनता की कमी के रूप में भी देखा है, और कभी-कभी इसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को नारेबाज़ी के करीब पहुँचता हुआ भी आरोप लगा है।

इस प्रकार समकालीन कविता का महत्व इसी में है कि उसने कविता के केंद्र में केवल व्यक्ति की अनुभूति को नहीं, बल्कि समाज के हर हाशिए पर खड़े मनुष्य की आवाज़ को जगह दी। नई कविता के "लघुमानव" से आगे बढ़कर यहाँ हर पहचान — स्त्री, दलित, आदिवासी, आम नागरिक — अपनी शर्तों पर बोलती है।

महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)

  • चौथा सप्तक (1979) — अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज, स्वदेश भारती, नंदकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा, राजेंद्र किशोर।
  • "साठोत्तरी कविता" — साठ के दशक के बाद की, विशेषकर धूमिल जैसे कवियों की राजनीतिक-सामाजिक कविता के लिए प्रयुक्त शब्द।
  • धूमिल (सुदामा पांडेय, 1936-1975) — संसद से सड़क तक (1972); 1975 में मुक्तिबोध पुरस्कार।
  • श्रीलाल शुक्ल का "राग दरबारी" (1968) — साथ ही उसी वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969) — धूमिल की कविता के समांतर गद्य-व्यंग्य।
  • मोहनदास नैमिशराय की 'अपने अपने पिंजड़े' (1995) — पहला दलित आत्मकथन।
  • ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' (1997) — हिंदी की सर्वाधिक चर्चित दलित आत्मकथा।
  • केदारनाथ सिंह, रघुवीर सहाय व कुँवर नारायण — नई कविता (सप्तक) और समकालीन कविता, दोनों में गिने जाने वाले कवि।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में उत्तर-कुंजी में दिए गए हैं)

  1. चौथा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1969 (ख) 1975 (ग) 1979 (घ) 1985
  2. निम्नलिखित में से कौन चौथे सप्तक के कवि नहीं हैं?
    (क) अवधेश कुमार (ख) नंदकिशोर आचार्य (ग) सुमन राजे (घ) कुँवर नारायण
  3. साठ के दशक के बाद की राजनीतिक-सामाजिक कविता को क्या कहा जाता है?
    (क) नवगीत (ख) साठोत्तरी कविता (ग) छायावादोत्तर कविता (घ) प्रगीत
  4. धूमिल का मूल नाम क्या था?
    (क) सुदामा पांडेय (ख) रामनाथ पांडेय (ग) श्याम सुंदर पांडेय (घ) राम अवतार पांडेय
  5. धूमिल का प्रथम काव्य-संग्रह 'संसद से सड़क तक' किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1968 (ख) 1972 (ग) 1975 (घ) 1979
  6. धूमिल को 1975 में कौन-सा पुरस्कार मिला?
    (क) साहित्य अकादमी पुरस्कार (ख) ज्ञानपीठ पुरस्कार (ग) मुक्तिबोध पुरस्कार (घ) पद्मश्री
  7. एक प्रचलित मान्यता के अनुसार साहित्य में "समकालीन" शब्द से आशय है —
    (क) पिछले 50 वर्षों की कविता (ख) पिछले एक पीढ़ी (लगभग 14-15 वर्ष) की कविता (ग) केवल 21वीं सदी की कविता (घ) एक निश्चित कालखंड जो 1979 में समाप्त हो गया
  8. निम्नलिखित में से कौन नई कविता (सप्तक) और समकालीन कविता — दोनों में गिना जाता है?
    (क) मुक्तिबोध (ख) रघुवीर सहाय (ग) अज्ञेय (घ) जगदीश गुप्त
  9. पहला दलित आत्मकथन किसे माना जाता है?
    (क) जूठन (ख) अपने अपने पिंजड़े (ग) मुर्दहिया (घ) बलूत
  10. 'अपने अपने पिंजड़े' किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1992 (ख) 1995 (ग) 1997 (घ) 2001
  11. 'जूठन' के लेखक कौन हैं?
    (क) मोहनदास नैमिशराय (ख) ओमप्रकाश वाल्मीकि (ग) कँवल भारती (घ) अनुज लुगुन
  12. 'जूठन' किस वर्ष प्रकाशित हुई?
    (क) 1995 (ख) 1997 (ग) 2001 (घ) 2005
  13. समकालीन कविता में स्त्री-विमर्श की प्रमुख कवयित्री कौन हैं?
    (क) अनामिका (ख) महादेवी वर्मा (ग) सुभद्रा कुमारी चौहान (घ) कीर्ति चौधरी
  14. निम्नलिखित में से कौन-सी समकालीन कविता की प्रवृत्ति नहीं है?
    (क) हाशिए की चेतना (ख) मुक्तछंद व सहज भाषा (ग) रीतिबद्ध शृंगारिक शैली (घ) व्यंग्य व विडंबना-बोध
  15. "राग दरबारी" (1968) व्यंग्य-उपन्यास के रचयिता कौन हैं?
    (क) श्रीलाल शुक्ल (ख) धूमिल (ग) फणीश्वरनाथ रेणु (घ) यशपाल
  16. "राग दरबारी" को किस वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?
    (क) 1968 (ख) 1969 (ग) 1972 (घ) 1975

उत्तर कुंजी

1. (ग) 1979 | 2. (घ) कुँवर नारायण | 3. (ख) साठोत्तरी कविता | 4. (क) सुदामा पांडेय | 5. (ख) 1972 | 6. (ग) मुक्तिबोध पुरस्कार | 7. (ख) पिछले एक पीढ़ी (लगभग 14-15 वर्ष) की कविता | 8. (ख) रघुवीर सहाय | 9. (ख) अपने अपने पिंजड़े | 10. (ख) 1995 | 11. (ख) ओमप्रकाश वाल्मीकि | 12. (ख) 1997 | 13. (क) अनामिका | 14. (ग) रीतिबद्ध शृंगारिक शैली | 15. (क) श्रीलाल शुक्ल | 16. (ख) 1969

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. समकालीन कविता किसे कहते हैं?

अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को सीधे पकड़ने वाली हिंदी कविता की उस धारा को समकालीन कविता कहा जाता है, जिसकी शुरुआत चौथे सप्तक (1979) के आसपास मानी जाती है और जो आज भी जारी है।

2. "समकालीन" शब्द की कोई निश्चित काल-सीमा क्यों नहीं है?

क्योंकि यह शब्द स्वयं सापेक्ष है — यह हमेशा "अभी की" कविता की ओर इशारा करता है, इसलिए हर पीढ़ी के साथ इसका दायरा भी आगे खिसकता रहता है।

3. समकालीन कविता की शुरुआत किससे मानी जाती है?

अज्ञेय द्वारा संपादित चौथे सप्तक (1979) को इसका एक प्रमुख प्रारंभ-बिंदु माना जाता है, यद्यपि धूमिल जैसे कवियों की साठोत्तरी कविता को भी इसकी पूर्वपीठिका माना जाता है।

4. समकालीन कविता और नई कविता में क्या अंतर है?

नई कविता में व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन साधने का प्रयास था, जबकि समकालीन कविता में स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ केंद्र में आ गया।

5. समकालीन कविता के प्रमुख कवि कौन हैं?

धूमिल, रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण, अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा, लीलाधर जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल तथा अरुण कमल इसके प्रमुख कवि माने जाते हैं।

6. समकालीन कविता में हाशिए की चेतना का क्या महत्व है?

स्त्री-विमर्श (अनामिका, कात्यायनी), दलित-विमर्श (ओमप्रकाश वाल्मीकि, कँवल भारती) तथा आदिवासी-विमर्श (अनुज लुगुन) की कविता ने समकालीन कविता को उन अनुभवों तक पहुँचाया, जिन्हें पहले की काव्यधाराओं में उतना केंद्रीय स्थान नहीं मिला था।

7. धूमिल की सबसे प्रसिद्ध कृति कौन-सी है?

'संसद से सड़क तक' (1972), जिसमें राजनीतिक सत्ता और भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य किया गया है।

8. क्या समकालीन कविता के समांतर गद्य में भी कोई बदलाव आया?

हाँ — श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य-उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) धूमिल की कविता जैसी ही राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य-चेतना गद्य में लेकर आया। बाद में दलित आत्मकथा-साहित्य भी उभरा — मोहनदास नैमिशराय की 'अपने अपने पिंजड़े' (1995) तथा ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' (1997) इसकी सबसे उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

9. क्या समकालीन कविता समाप्त हो चुकी है?

नहीं — चूँकि "समकालीन" शब्द ही सतत खिसकता रहता है, यह धारा आज भी जारी मानी जाती है और हर नई पीढ़ी के साथ इसमें नए स्वर जुड़ते रहते हैं।

यह भी पढ़ें

संदर्भ

  1. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
  2. हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास — डॉ. नागेंद्र
  3. चौथा सप्तक — सं. अज्ञेय, 1979
  4. दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र — ओमप्रकाश वाल्मीकि
  5. जूठन (आत्मकथा) — ओमप्रकाश वाल्मीकि, 1997

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग)और अठारह पुराण – परिचय, वर्गीकरण एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

भारतीय ज्ञान-परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा की नींव वेदों पर टिकी है, और इसी नींव पर उपनिषद, वेदांग, दर्शन-शास्त्र तथा पुराण जैसे अनेक ग्रंथों का विशाल भवन खड़ा हुआ है। प्रायः विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के मन में चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग) तथा अठारह पुराणों को लेकर कई भ्रम रहते हैं — जैसे "छह शास्त्र" वास्तव में कौन-से हैं, अठारहवां पुराण वायु है या शिव, कौन-सा उपनिषद किस वेद से जुड़ा है, अथवा कल्पसूत्र क्या होते हैं। अधिकांश लेख इस विषय पर केवल नामों की सूची तक सीमित रह जाते हैं। इस लेख में हम इससे आगे बढ़कर प्रत्येक ग्रंथ-समूह की प्रकृति, आंतरिक संरचना, संबंधित ब्राह्मण-आरण्यक ग्रंथों, तथा हर भ्रम के पीछे के वास्तविक कारण को भी विस्तार से, प्रामाणिक ढंग से समझेंगे। वैदिक साहित्य की संरचना भारतीय शास्त्र-परंपरा को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जाता है — श्रुति और स्मृति । श्रुति का अर्थ है वह ज्ञान जो ऋषियों ने साधना और श्रवण द्वारा प्राप्त किया — इसके अंतर्गत चारों वेद और उनसे जुड़े संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उ...

हिंदी भाषा की विशेषताएँ – उत्पत्ति, इतिहास, महत्व एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

एक नज़र में हिंदी भारत की राजभाषा है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी का विकास संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → आधुनिक हिंदी के रूप में हुआ। हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है तथा विश्वभर में करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। "हिन्दी भारतीय संस्कृति की आत्मा है" — कमलापति त्रिपाठी का यह कथन हिंदी के महत्व को बहुत सटीक ढंग से व्यक्त करता है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि भारत की पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। इस लेख में हम हिंदी की उत्पत्ति, उसकी भाषिक विशेषताओं तथा वर्तमान वैश्विक स्थिति को विस्तार से, तथ्यों सहित समझेंगे — हिंदी भाषा का परिचय हिंदी भारत की राजभाषा है तथा विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में गिनी जाती है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं — नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना जैसे कई देशों में भी हिंदी बोली और समझी जाती है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशाल जनसमूह की भाषा होते हुए भी अपनी सरलता और वैज्ञानिकता के लिए जानी जाती है। हिंदी की उत्पत्ति और विकास हिंदी का उद्भव संस्कृत से हु...

देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, मराठी, मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ (जैसे नेपाली) भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह लिपि भारत की अनेक अन्य लिपियों के सन्निकट भी है। इस आलेख में हम देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसके नामकरण, विशेषताओं, वैज्ञानिकता, गुण-दोष तथा अन्य लिपियों से इसकी तुलना — इन सभी पक्षों को विस्तार एवं प्रामाणिकता के साथ जानेंगे। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति संसार की सभी भाषाओं को लिखने के लिए किसी न किसी लिपि का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार देवनागरी भी एक लिपि है जिसका प्रयोग मूलतः हिंदी भाषा को लिखने के लिए किया जाता है। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। प्राचीन समय में आर्यों द्वारा प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त समस्त भारतीय लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। ...

रामचरितमानस (तुलसी रामायण) के सात कांड || 7 Kand of Ramcharitmans (Tulsidas_Ramayan)

रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण (Ramayan) के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'। रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को यदि "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" जाय तो अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है। माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल...