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नई कविता या प्रयोगवाद का ही विस्तार? नामकरण, प्रवृत्तियाँ एवं प्रमुख कवि | हिंदी साहित्य का इतिहास

पिछले लेख में हमने प्रयोगवाद की चर्चा की थी। प्रयोगवाद ने हिंदी कविता को रूढ़ियों से मुक्त करके नए शिल्प, नई भाषा और नए अनुभवों की ओर मोड़ा था। लेकिन समय के साथ यह आवश्यकता महसूस हुई कि कविता का यह नया प्रयोग केवल काव्य-रूप तक सीमित न रहे, बल्कि आधुनिक जीवन के व्यापक अनुभवों और यथार्थ से भी जुड़े। इसी व्यापक होती प्रयोगशील चेतना से आगे चलकर 'नई कविता' की पहचान विकसित हुई। इस लेख में हम यही यात्रा — उसका नामकरण, कवि, काव्य-दृष्टि, प्रवृत्तियाँ और मूल्यांकन — विस्तार से देखेंगे।

एक नज़र में: नई कविता हिंदी काव्य की वह धारा है जो प्रयोगवाद की ही प्रयोगशील चेतना से विकसित हुई और 1950 के दशक में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। इसका केंद्र आधुनिक मनुष्य की अनुभूति और जीवन-यथार्थ है, और इसके कवि किसी एक विचारधारा में बँधे नहीं थे — अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध और भवानी प्रसाद मिश्र तक, भिन्न-भिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि के रचनाकार इसमें शामिल हुए।

नई कविता क्या है? (परिचय एवं पृष्ठभूमि)

नई कविता, प्रयोगवाद की इसी विस्तृत होती चेतना से निकली — पर उसे केवल शिल्पगत विद्रोह तक सीमित न रखकर वर्तमान जीवन के हर स्तर के यथार्थ से जोड़ा। यह न छायावाद जैसी कल्पना-प्रधान वैयक्तिकता है, न प्रगतिवाद जैसी वर्ग-चेतना प्रधान प्रतिबद्धता — बल्कि दोनों की सीमाओं से आगे बढ़कर अपनी शर्तों पर यथार्थ को पकड़ने का प्रयास है। यही कारण है कि यह किसी एक निश्चित दर्शन या "वाद" से बँधी नहीं रही — यह इसकी सबसे बड़ी पहचान भी है और सबसे बड़ी जटिलता भी।

नामकरण और मंच — 'नई कविता' कैसे संगठित हुई

यह प्रयोगशील चेतना किस नाम से पहचानी जाए और उसे कौन-सा मंच मिले — यह प्रक्रिया भी चरणबद्ध रही —

  • 1952 ई. — अज्ञेय ने आकाशवाणी, पटना पर दी गई एक भेंटवार्ता में सबसे पहले 'नई कविता' शब्द का प्रयोग किया।
  • 1953 ई. — काव्य-संकलन 'नये पत्ते' के प्रकाशन के साथ यह धारा व्यावहारिक रूप में विकसित होने लगी।
  • 1954 ई.जगदीश गुप्त और रामस्वरूप चतुर्वेदी के संपादन में इलाहाबाद से 'नयी कविता' नामक अर्धवार्षिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्रिका ने नई कविता को एक संगठित साहित्यिक मंच दिया और इसके नाम को व्यापक रूप से प्रचलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई — ठीक वैसे ही जैसे प्रयोगवादी आंदोलन को गति देने में अज्ञेय की पत्रिका 'प्रतीक' की भूमिका रही थी।

नाम और मंच मिल जाने भर से कोई काव्यधारा जीवित नहीं रहती — असली सवाल यह था कि इसके कवि कौन थे, और उन्होंने इसे किस रूप में गढ़ा।

दूसरा और तीसरा सप्तक — नई कविता के कवि

प्रयोगवाद वाले लेख में हमने तार सप्तक (1943) के सातों कवियों की चर्चा की थी। सामान्यतः तार सप्तक के कवियों को प्रयोगवाद से अधिक जोड़ा जाता है, जबकि दूसरे और तीसरे सप्तक के कवियों को मुख्य रूप से 'नई कविता' का कवि माना जाता है

दूसरा सप्तक (1951): भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती।

तीसरा सप्तक (1959): कीर्ति चौधरी, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तथा मदन वात्स्यायन।

इसके प्रभाव-क्षेत्र से आगे चलकर श्रीकांत वर्मा, दुष्यंत कुमार तथा लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे कवियों की कविता ने भी नई दिशाएँ ग्रहण कीं — इस संक्रमण की विस्तृत चर्चा हमने समकालीन कविता वाले लेख में की है, जहाँ चौथे सप्तक (1979) के कवियों पर भी विस्तार से बात है।

नई कविता की अपनी काव्य-दृष्टि — विविध वाद-दर्शन का संगम

इतने भिन्न कवि एक साथ किस बुनियाद पर खड़े हुए? नई कविता की एक बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें एक साथ भिन्न-भिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि के रचनाकार शामिल हुए — यह किसी एक राजनीतिक-दार्शनिक खेमे का आंदोलन कभी नहीं रहा।

  • अज्ञेय आधुनिक भाव-बोध से प्रेरित अस्तित्ववादी व व्यक्तिवादी दृष्टि के प्रतिनिधि माने जाते हैं।
  • मुक्तिबोध जैसे कवियों पर मार्क्सवादी चेतना का गहरा प्रभाव दिखता है।
  • भवानी प्रसाद मिश्र गांधीवादी विचारधारा से जुड़े रहे।
  • रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को लोहियावादी समाजवादी दृष्टि के निकट माना जाता है।
  • केदारनाथ सिंह की कविता में लोक-संवेदना, आधुनिक जीवन-बोध और सामाजिक यथार्थ का विशिष्ट समन्वय मिलता है।

इसी वैचारिक विविधता के कारण नई कविता को किसी एक "वाद" के साँचे में बाँधना कठिन है।

अस्तित्ववाद और आधुनिकतावाद का प्रभाव

इस वैचारिक विविधता के भीतर भी दो पश्चिमी विचारधाराओं का साझा प्रभाव विशेष रूप से दिखता है —

  • अस्तित्ववाद — व्यक्ति की स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व, अस्तित्व-संकट, अजनबियत, मृत्यु-बोध, त्रास और ऊब जैसे अनुभवों पर बल देने वाली आधुनिक दार्शनिक दृष्टि, जो नई कविता में गहरे उतर आई।
  • आधुनिकतावाद — पूँजीवादी विकास के साथ उभरे नए जीवन-मूल्यों व नई जीवन-पद्धति से जुड़ी यह दृष्टि इतिहास-परंपरा से विच्छेद, गहन आत्म-चेतना, तटस्थता-अप्रतिबद्धता तथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर बल देती है।

नई कविता और प्रयोगवाद में अंतर

यह वैचारिक विविधता ही नई कविता को प्रयोगवाद से अलग खड़ा करती है —

  • प्रयोगवाद का प्रारंभिक रूप तार सप्तक (1943) में स्पष्ट हुआ, जहाँ नएपन और शिल्पगत विद्रोह पर बल था; नई कविता ने उसी प्रयोगशील चेतना को अधिक व्यापक जीवनानुभव और सामाजिक यथार्थ से जोड़ा।
  • प्रयोगवाद पर तीव्र व्यक्तिवाद हावी था; नई कविता ने व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया।

यह भेद कितना गहरा है — इसे लेकर भी विद्वानों में एकमत नहीं। रामविलास शर्मा तथा नामवर सिंह जैसे आलोचक तो "नई कविता" को प्रयोगवाद का "छद्म रूप" तक मानते हैं, जैसा हमने प्रयोगवाद वाले लेख में देखा था — अर्थात उनकी दृष्टि में यह कोई वास्तविक नया मोड़ नहीं, बल्कि प्रयोगवाद का ही नाम बदलकर प्रस्तुत रूप था।

काल-सीमा को लेकर विद्वानों में मतभेद

'नई कविता' के ठीक-ठीक प्रारंभ-बिंदु को लेकर भी विद्वानों में एकमत नहीं है। एक मत दूसरे सप्तक (1951) के प्रकाशन को ही इसका प्रारंभ मानने के पक्ष में है, क्योंकि इसके अधिकांश कवियों ने अपनी कविता को स्वयं ही "नई कविता" कहना शुरू कर दिया था। दूसरा मत 1954 में शुरू हुई 'नयी कविता' पत्रिका को इसका वास्तविक जन्म-बिंदु मानता है, क्योंकि इसी से यह धारा पहली बार एक संगठित मंच के साथ पहचान योग्य रूप में सामने आई। इन दोनों मतों के बीच का अंतर केवल तिथिगत नहीं, बल्कि इस प्रश्न पर भी आधारित है कि किसी काव्य-प्रवृत्ति की शुरुआत उसके पहले उदाहरणों से मानी जाए या उसके सैद्धांतिक रूप से पहचान पाने से।

नई कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

यही काव्य-दृष्टि आगे चलकर कुछ ठोस प्रवृत्तियों में ढली —

  • कथ्य की व्यापकता: जीवन के हर स्तर के यथार्थ को — चाहे वह कितना भी सामान्य या असुंदर क्यों न हो — काव्य-विषय बनाया गया।
  • अनुभूति की प्रामाणिकता: भावुक आदर्शीकरण के बजाय अनुभव को जैसा है वैसा ही, बिना किसी लाग-लपेट के, व्यक्त करने पर बल दिया गया।
  • लघुमानववाद: महाकाव्यात्मक नायकों के बजाय सामान्य, संघर्षरत "लघु मानव" के क्षणिक अनुभवों को केंद्र में रखा गया — यदि छायावाद का नायक "महामानव" था और प्रगतिवाद का नायक "शोषित मानव", तो नई कविता का नायक यही "लघुमानव" है।
  • क्षणवाद: जीवन के किसी बड़े दर्शन के बजाय क्षण-विशेष के अनुभव और उसकी सच्चाई को महत्व दिया गया।
  • तनाव और द्वंद्व: व्यक्ति के भीतर की उलझी, अक्सर परस्पर-विरोधी मनोदशाओं का ईमानदार चित्रण नई कविता की पहचान बना।
  • मूल्यों की परीक्षा: वैयक्तिकता को एक मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करने के साथ-साथ निरर्थकता-बोध, विसंगति-बोध और पीड़ा-बोध जैसे प्रश्न भी कविता में उभरे — फिर भी सामाजिकता को पूरी तरह नहीं छोड़ा गया।
  • लोक-संपृक्ति: लोक-जीवन के बिंबों, प्रतीकों व शब्दों को सीधे लोक-जीवन से चुनकर कविता को अधिक सजीव व संवेदनापूर्ण बनाया गया।

भाषा और शिल्पगत विशेषताएँ

इन्हीं प्रवृत्तियों ने भाषा और शिल्प के स्तर पर भी नए रास्ते खोले। नई कविता की काव्य-संरचना मोटे तौर पर दो रूपों में बँटी दिखती है — छोटी, प्रगीतात्मक कविताएँ, और लंबी, नाटकीय और जटिल संरचना वाली कविताएँ, जिनमें फैंटेसी व स्वप्न-कथा का भरपूर प्रयोग हुआ। भाषा किसी एक पद्धति में बँधकर नहीं चलती — बोलचाल की भाषा का प्रयोग अधिक हुआ, और विभिन्न बोलियों, लोक-प्रयोगों तथा प्रचलित देशज शब्दों को भी सहज स्वीकृति मिली। अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध की कविताओं में बिंब और प्रतीक-विधान की अलग-अलग विशिष्ट शैलियाँ दिखाई देती हैं। छंद को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया गया, बल्कि उसके साथ भी विविध प्रयोग हुए — गीत-संगीत की परंपरागत लय की जगह ध्वनि-परिवर्तन आधारित नई लय-चेतना अपनाई गई। प्रत्येक कवि की अपनी निजी शैलीगत विशिष्टता को स्वीकृति मिली, और संप्रेषण को शिल्प के किसी एक निश्चित माध्यम से अधिक महत्व दिया गया।

प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं

  • अज्ञेय: सप्तक-श्रृंखला के संपादक और प्रयोगशील आधुनिक कविता के प्रमुख कवि। प्रमुख कृतियाँ — हरी घास पर क्षण भर, इत्यलम्, आँगन के पार द्वार, तथा सर्जन-प्रक्रिया पर केंद्रित बहुचर्चित लंबी कविता असाध्य वीणा। इसी दौर में अज्ञेय के उपन्यास भी आए — विस्तार से आगे "गद्य साहित्य" सेक्शन में देखें।
  • मुक्तिबोध: तार सप्तक से जुड़े होने के बावजूद इनकी सबसे परिपक्व रचनाएँ इसी दौर में सामने आईं; जटिल फैंटेसी-प्रधान शैली और मार्क्सवादी चेतना के लिए विशिष्ट। प्रमुख कृति — चाँद का मुँह टेढ़ा है; दीर्घ कविता 'अंधेरे में' हिंदी की सर्वाधिक चर्चित लंबी कविताओं में गिनी जाती है।
  • शमशेर बहादुर सिंह: दूसरे सप्तक के कवि; बिंब-विधान की सूक्ष्मता के लिए विशेष रूप से समादृत। प्रमुख संग्रह — चुका भी हूँ मैं नहीं, काल तुझसे होड़ है मेरी।
  • धर्मवीर भारती: दूसरे सप्तक के कवि। प्रमुख काव्य-संग्रह — ठंडा लोहा, सात गीत वर्ष (गद्य-कृतियों की चर्चा आगे अलग सेक्शन में)।
  • नरेश मेहता: पौराणिक व आधुनिक चेतना का समन्वय करने वाले कवि; प्रमुख कृति — संशय की एक रात।
  • भवानी प्रसाद मिश्र: सहज-सरल भाषा में गहरी सामाजिक संवेदना के कवि; प्रमुख संग्रह — गीत फरोश।
  • रघुवीर सहाय: दूसरे सप्तक के कवि; व्यंग्य व विडंबना-बोध की तीखी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। प्रमुख संग्रह — सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध।
  • कुँवर नारायण: तीसरे सप्तक के कवि; बौद्धिक गहराई व मिथकीय चेतना के लिए विशिष्ट। प्रमुख कृति — आत्मजयी (नचिकेता प्रसंग पर आधारित प्रबंध-काव्य)।
  • सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: तीसरे सप्तक के कवि; प्रकृति व आम जीवन के बिंबों से युक्त काव्य-भाषा के लिए जाने जाते हैं। प्रमुख संग्रह — काठ की घंटियाँ।
  • विजयदेव नारायण साही: तीसरे सप्तक के कवि; वैचारिक स्पष्टता व आलोचनात्मक दृष्टि के लिए विशिष्ट।
  • केदारनाथ सिंह: तीसरे सप्तक के कवि; ग्राम्य-जीवन व लोक-संवेदना को नई कविता की भाषा में ढालने वाले कवि। प्रमुख संग्रह — अभी बिल्कुल अभी।

समांतर धाराएँ — प्रगतिशील कवि और नवगीत

नई कविता अकेली नहीं थी — इसी दौर में कविता की दो और धाराएँ समांतर सक्रिय रहीं।

प्रगतिशील परंपरा से जुड़े कवि: मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन तथा केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि मूलतः प्रगतिवादी परंपरा से जुड़े थे, लेकिन इसी दौर में इनकी सबसे परिपक्व रचनाएँ सामने आईं। इन्हें अक्सर प्रगतिवाद और नई कविता — दोनों की चर्चा में साथ रखा जाता है, क्योंकि इनका सक्रिय रचनाकाल दोनों धाराओं में फैला हुआ है।

नवगीत: इसी दौर में गीत-परंपरा का भी एक नया, आधुनिक-संवेदनासंपन्न रूप विकसित हुआ, जिसे 'नवगीत' कहा गया — शंभुनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, कुँवर बेचैन तथा देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' जैसे कवि इस धारा के प्रमुख नाम माने जाते हैं। नवगीत, नई कविता से इस मायने में भिन्न है कि यह छंद व गीतात्मकता को पूरी तरह नहीं छोड़ता, फिर भी संवेदना के स्तर पर आधुनिक जीवन-बोध से गहरा जुड़ाव रखता है।

इसी युग का गद्य साहित्य

इसी दौर में गद्य साहित्य में भी आधुनिक जीवन-बोध उभर रहा था — और दिलचस्प बात यह है कि नई कविता के दो प्रमुख कवि, अज्ञेय और धर्मवीर भारती, स्वयं इसी दौर में सफल गद्यकार के रूप में भी सामने आए।

  • अज्ञेय: उपन्यास "नदी के द्वीप" (1951, जिस वर्ष को नई कविता का एक प्रारंभ-बिंदु भी माना जाता है) तथा "अपने-अपने अजनबी" (1961) — दोनों में मनोवैज्ञानिक व अस्तित्ववादी चेतना की गहरी छाप मिलती है, जो उनकी कविता के भाव-बोध से मेल खाती है।
  • धर्मवीर भारती: उपन्यास "गुनाहों का देवता" तथा काव्य-नाटक "अंधा युग" (महाभारत-कथा पर आधारित) इसी दौर की उनकी बहुचर्चित गद्य-कृतियाँ हैं।
  • नई कहानी आंदोलन: हिंदी कहानी में भी इसी दौर में 'नई कहानी' आंदोलन सामने आया — राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर की त्रयी इसके प्रवर्तक मानी जाती है।
  • अन्य उल्लेखनीय कृतियाँ: फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल (1954) — हिंदी में आंचलिक उपन्यास-परंपरा का प्रवर्तक ग्रंथ; यशपाल का झूठा सच (1958-60) — भारत-विभाजन की त्रासदी पर केंद्रित विशाल उपन्यास; और मोहन राकेश का नाटक आषाढ़ का एक दिन (1958) — जिसे आधुनिक हिंदी नाटक की सशक्त शुरुआत माना जाता है।

आलोचना और सैद्धांतिक आधार

कविता हो या गद्य — इस पूरे दौर को वैचारिक आधार देने में आलोचना का भी उतना ही योगदान रहा। इस दौर के सबसे प्रभावशाली आलोचक नामवर सिंह रहे, जिनकी कृति 'कविता के नए प्रतिमान' (1968) नई कविता के मूल्यांकन का प्रामाणिक आधार-ग्रंथ मानी जाती है।

1959 के बाद — आगे की दिशा

1959 को नई कविता के विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, क्योंकि इसी वर्ष तीसरा सप्तक प्रकाशित हुआ। इसके बाद कविता में क्रमशः बिंब के सघन आयोजन से हटकर अधिक सीधी, सपाट कथन-शैली की प्रवृत्ति भी उभरने लगी। आगे चलकर हिंदी कविता में अनेक नई प्रवृत्तियाँ उभरीं और नई कविता की यह संवेदना अलग-अलग रूपों में विकसित हुई — यही व्यापक परिवर्तन समकालीन कविता के विविध रूपों की पृष्ठभूमि बना।

नई कविता का मूल्यांकन

उपलब्धियाँ: नई कविता ने हिंदी काव्य को न तो छायावाद जैसी कल्पना-प्रधान वैयक्तिकता में, न प्रगतिवाद जैसी वैचारिक प्रतिबद्धता में बाँधे रखा — बल्कि व्यक्ति और समाज, बुद्धि और भावना, तथा परंपरा और आधुनिकता के बीच एक जटिल, ईमानदार संतुलन खोजने का साहस दिखाया। भाषा को बोलचाल के निकट लाना, नए बिंबों का निर्माण करना, तथा "लघु मानव" को काव्य के केंद्र में प्रतिष्ठित करना इसकी स्थायी देन मानी जाती है।

सीमाएँ: जिस तरह प्रयोगवाद पर पश्चिमी प्रतीकवाद के अतिशय अनुकरण का आरोप लगा, उसी तरह नई कविता की कुछ रचनाओं पर भी दुरूहता, अतिशय बौद्धिकता तथा बिंब-योजना के धीरे-धीरे रूढ़ हो जाने का आरोप लगता रहा है।

इस प्रकार नई कविता का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उसने कविता के शिल्प को बदला, बल्कि इस बात में भी है कि उसने आधुनिक मनुष्य के अनुभव को कविता का केंद्र बनाया। प्रयोग, व्यक्तित्व, सामाजिक यथार्थ, बौद्धिकता और अनुभूति — इन अलग-अलग आग्रहों को एक ही काव्य-परिदृश्य में स्थान देना इसकी सबसे बड़ी विशेषता रही।

महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)

  • 'नई कविता' शब्द का प्रथम प्रयोग — अज्ञेय, 1952 में आकाशवाणी पटना की भेंटवार्ता में।
  • 'नये पत्ते' (1953) — नई कविता के व्यावहारिक विकास की पहली कड़ी।
  • 'नयी कविता' पत्रिका (1954) — प्रथम अंक के संपादक जगदीश गुप्त एवं रामस्वरूप चतुर्वेदी; प्रकाशन स्थल इलाहाबाद; अर्धवार्षिक पत्रिका।
  • दूसरा सप्तक (1951) — भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती।
  • तीसरा सप्तक (1959) — कीर्ति चौधरी, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्स्यायन।
  • चौथा सप्तक — 1979 (समकालीन कविता की ओर संक्रमण-बिंदु)।
  • नायक-तुलना — छायावाद का नायक "महामानव", प्रगतिवाद का नायक "शोषित मानव", नई कविता का नायक "लघुमानव"।
  • 1959 को नई कविता के विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, जब तीसरा सप्तक प्रकाशित हुआ।
  • नामवर सिंह की 'कविता के नए प्रतिमान' (1968) — नई कविता के मूल्यांकन का प्रामाणिक आलोचना-ग्रंथ।
  • अज्ञेय के इसी दौर के उपन्यास — "नदी के द्वीप" (1951), "अपने-अपने अजनबी" (1961)।
  • धर्मवीर भारती की गद्य-कृतियाँ — "गुनाहों का देवता" (उपन्यास), "अंधा युग" (काव्य-नाटक)।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में उत्तर-कुंजी में दिए गए हैं)

  1. 'नई कविता' शब्द का सबसे पहले प्रयोग किसने और कब किया?
    (क) नामवर सिंह, 1954 में (ख) अज्ञेय, 1952 में आकाशवाणी पटना भेंटवार्ता में (ग) जगदीश गुप्त, 1953 में (घ) मुक्तिबोध, 1959 में
  2. 'नई कविता' के व्यावहारिक विकास की पहली कड़ी माना जाने वाला संकलन 'नये पत्ते' किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1951 (ख) 1952 (ग) 1953 (घ) 1954
  3. 'नयी कविता' पत्रिका (1954) के प्रथम अंक के संपादक कौन थे?
    (क) अज्ञेय (ख) नामवर सिंह (ग) जगदीश गुप्त एवं रामस्वरूप चतुर्वेदी (घ) मुक्तिबोध
  4. 'नयी कविता' पत्रिका का प्रकाशन किस नगर से हुआ?
    (क) वाराणसी (ख) इलाहाबाद (ग) दिल्ली (घ) पटना
  5. दूसरा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1947 (ख) 1951 (ग) 1953 (घ) 1959
  6. दूसरे सप्तक के कवि नहीं हैं —
    (क) शमशेर बहादुर सिंह (ख) रघुवीर सहाय (ग) कुँवर नारायण (घ) धर्मवीर भारती
  7. तीसरा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1953 (ख) 1955 (ग) 1959 (घ) 1965
  8. निम्नलिखित में से कौन 'तीसरा सप्तक' के कवि नहीं हैं?
    (क) कुँवर नारायण (ख) केदारनाथ सिंह (ग) शमशेर बहादुर सिंह (घ) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
  9. चौथा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1969 (ख) 1975 (ग) 1979 (घ) 1985
  10. नई कविता के नायक को क्या कहा गया है?
    (क) महामानव (ख) शोषित मानव (ग) लघुमानव (घ) आदर्श मानव
  11. भवानी प्रसाद मिश्र किस विचारधारा से विशेष रूप से जुड़े माने जाते हैं?
    (क) मार्क्सवाद (ख) गांधीवाद (ग) लोहियावाद (घ) अस्तित्ववाद
  12. 'कविता के नए प्रतिमान' (1968) के लेखक कौन हैं?
    (क) रामचंद्र शुक्ल (ख) नामवर सिंह (ग) बच्चन सिंह (घ) नगेंद्र
  13. नवगीत धारा से जुड़े कवि कौन हैं?
    (क) शंभुनाथ सिंह, रामदरश मिश्र (ख) मुक्तिबोध, त्रिलोचन (ग) कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन (घ) रामविलास शर्मा, नागार्जुन
  14. 'आत्मजयी' (नचिकेता प्रसंग पर आधारित प्रबंध-काव्य) के रचयिता कौन हैं?
    (क) कुँवर नारायण (ख) केदारनाथ सिंह (ग) अज्ञेय (घ) धर्मवीर भारती
  15. मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन तथा केदारनाथ अग्रवाल मूलतः किस परंपरा से जुड़े कवि माने जाते हैं?
    (क) छायावादी (ख) प्रगतिवादी (ग) रीतिवादी (घ) भक्तिकालीन
  16. निम्नलिखित में से कौन-सा अस्तित्ववाद का तत्व नहीं है?
    (क) अजनबियत (ख) मृत्यु-बोध (ग) त्रास (घ) वर्ग-संघर्ष का प्रत्यक्ष आह्वान
  17. अज्ञेय का उपन्यास "नदी के द्वीप" किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    (क) 1947 (ख) 1951 (ग) 1954 (घ) 1961
  18. "गुनाहों का देवता" उपन्यास तथा "अंधा युग" काव्य-नाटक के रचयिता कौन हैं?
    (क) अज्ञेय (ख) मुक्तिबोध (ग) धर्मवीर भारती (घ) शमशेर बहादुर सिंह

उत्तर कुंजी

1. (ख) अज्ञेय, 1952 में | 2. (ग) 1953 | 3. (ग) जगदीश गुप्त एवं रामस्वरूप चतुर्वेदी | 4. (ख) इलाहाबाद | 5. (ख) 1951 | 6. (ग) कुँवर नारायण | 7. (ग) 1959 | 8. (ग) शमशेर बहादुर सिंह | 9. (ग) 1979 | 10. (ग) लघुमानव | 11. (ख) गांधीवाद | 12. (ख) नामवर सिंह | 13. (क) शंभुनाथ सिंह, रामदरश मिश्र | 14. (क) कुँवर नारायण | 15. (ख) प्रगतिवादी | 16. (घ) वर्ग-संघर्ष का प्रत्यक्ष आह्वान | 17. (ख) 1951 | 18. (ग) धर्मवीर भारती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नई कविता किसे कहते हैं?

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद विकसित हिंदी कविता की उस प्रमुख काव्यधारा को नई कविता कहा जाता है, जिसमें आधुनिक जीवन-बोध, अनुभूति की प्रामाणिकता, नए मूल्य, नए शिल्प और बदलते सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्ति मिली।

2. नई कविता का प्रारंभ कब माना जाता है?

इसे लेकर विद्वानों में मतभेद है — कई विद्वान दूसरे सप्तक (1951) को प्रारंभ-बिंदु मानते हैं, तो कई 1954 में शुरू हुई 'नयी कविता' पत्रिका को इसका वास्तविक जन्म मानते हैं।

3. 'नई कविता' शब्द का प्रयोग किसने और कब किया?

अज्ञेय ने सबसे पहले 1952 में आकाशवाणी, पटना पर एक भेंटवार्ता में इस शब्द का प्रयोग किया था।

4. नई कविता और प्रयोगवाद में क्या अंतर है?

प्रयोगवाद में नएपन व शिल्पगत विद्रोह पर बल था, जबकि नई कविता में अनुभूति की प्रामाणिकता और व्यक्ति-समाज के बीच संतुलन साधने की कोशिश केंद्र में आई।

5. नई कविता के प्रमुख कवि कौन हैं?

दूसरे सप्तक (भवानी प्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय आदि) और तीसरे सप्तक (कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि) के कवियों को मुख्य रूप से नई कविता का कवि माना जाता है।

6. नई कविता के नायक को क्या कहा गया है?

"लघुमानव" — छायावाद के "महामानव" और प्रगतिवाद के "शोषित मानव" से अलग, एक सामान्य, संघर्षरत व्यक्ति।

7. नई कविता को "अकविता" क्यों कहा गया?

यह परंपरागत काव्य-रूप, छंद-बंधन व अलंकरण से इतनी दूर चली गई कि कुछ आलोचकों को यह पारंपरिक अर्थों में "कविता" जैसी नहीं लगी, और उन्होंने इसे "अकविता" कहना शुरू कर दिया।

8. नई कविता के बाद हिंदी कविता किस दिशा में आगे बढ़ी?

1959 के बाद बिंब-प्रधान रूढ़ियों को तोड़ते हुए यह धीरे-धीरे अधिक सीधी, सपाट कथन-शैली और समकालीन कविता की ओर बढ़ी।

9. क्या इसी दौर में गद्य साहित्य में भी कोई समांतर बदलाव आया?

हाँ, ठीक इसी समय हिंदी कहानी में 'नई कहानी' आंदोलन (राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर की त्रयी) चल रहा था, और स्वयं अज्ञेय व धर्मवीर भारती जैसे कवि भी सफल गद्यकार साबित हुए। साथ ही फणीश्वरनाथ रेणु का 'मैला आँचल' (1954), यशपाल का 'झूठा सच' तथा मोहन राकेश का नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' (1958) भी इसी दौर की महत्वपूर्ण गद्य-कृतियाँ हैं।

10. अज्ञेय और धर्मवीर भारती की प्रमुख गद्य-कृतियाँ कौन-सी हैं?

अज्ञेय के उपन्यास "नदी के द्वीप" (1951) व "अपने-अपने अजनबी" (1961), तथा धर्मवीर भारती का उपन्यास "गुनाहों का देवता" व काव्य-नाटक "अंधा युग" — दोनों कवियों की कविता जैसी ही गहरी संवेदनात्मक व मनोवैज्ञानिक चेतना इन गद्य-कृतियों में भी मिलती है।

यह भी पढ़ें

संदर्भ

  1. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
  2. हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास — डॉ. नागेंद्र
  3. कविता के नए प्रतिमान — नामवर सिंह
  4. 'नयी कविता' पत्रिका (1954) — सं. जगदीश गुप्त एवं रामस्वरूप चतुर्वेदी
  5. दूसरा सप्तक / तीसरा सप्तक — सं. अज्ञेय
  6. हिन्दी उपन्यास का इतिहास — गोपाल राय

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