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हिंदी साहित्य का काल-विभाजन और नामकरण: शुक्ल, द्विवेदी, नागेंद्र व बच्चन सिंह के मतों का सम्पूर्ण अध्ययन | हिंदी साहित्य

हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हज़ार वर्षों से अधिक पुराना है। इतने लंबे इतिहास को समझने के लिए विद्वानों ने इसे अलग-अलग कालों में बाँटा — इसी प्रक्रिया को काल-विभाजन कहा जाता है। लेकिन क्या सभी विद्वान एक ही तरह का काल-विभाजन मानते हैं? बिल्कुल नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नागेंद्र तथा डॉ. बच्चन सिंह — इन सभी ने अलग-अलग आधारों पर अपनी योजनाएँ प्रस्तुत की हैं, और कई जगह इनके मत एक-दूसरे से सीधे टकराते भी हैं। इस लेख में हम इन्हीं सभी मतों का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे, ताकि आगे आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल — हर एक को विस्तार से पढ़ने से पहले पूरी पृष्ठभूमि स्पष्ट हो जाए।

संक्षेप में: हिंदी साहित्य का काल-विभाजन साहित्य के हज़ार वर्ष से अधिक लंबे इतिहास को उसकी भाषा, प्रमुख प्रवृत्तियों एवं रचनाकारों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में बाँटने की प्रक्रिया है। सर्वाधिक प्रामाणिक तथा प्रचलित योजना आचार्य रामचंद्र शुक्ल की है — आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा आधुनिक काल। किंतु हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नागेंद्र और डॉ. बच्चन सिंह जैसे विद्वानों ने इसमें अलग-अलग नामकरण तथा वर्गीकरण दिए हैं।

काल-विभाजन का अर्थ एवं आवश्यकता

काल-विभाजन का अर्थ है — साहित्य के सुदीर्घ इतिहास को उसकी भाषा, प्रमुख प्रवृत्तियों, रचनाकारों तथा ऐतिहासिक-सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में बाँटना।

यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि:

  • हज़ार वर्ष का साहित्य बिना विभाजन के व्यवस्थित रूप से पढ़ाया या समझाया नहीं जा सकता।
  • हर युग की भाषा, विषय-वस्तु और काव्य-प्रवृत्तियाँ अलग होती हैं — इन्हें अलग करके देखने से साहित्य के विकास-क्रम की स्पष्ट तस्वीर बनती है।
  • एक ही कालखंड की रचनाओं की आपस में तुलना करना तथा उनके सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को समझना आसान हो जाता है।

ध्यान दें: काल-विभाजन कोई एक निश्चित, सर्वसम्मत व्यवस्था नहीं है। अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग आधार (समय, प्रवृत्ति, रचनाकार का नाम) चुनकर भिन्न-भिन्न योजनाएँ प्रस्तुत की हैं — और यही मतभेद स्वयं में अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है।

हिंदी साहित्येतिहास-लेखन की संक्षिप्त परंपरा

हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की शुरुआत भारत में नहीं, बल्कि फ्रांस में हुई थी। फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी ने "इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ए ऐंदुस्तानी" नामक ग्रंथ में हिंदी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास प्रस्तुत किया — यह हिंदी साहित्य के इतिहास पर लिखा गया प्रथम ग्रंथ है, और फ्रेंच भाषा में लिखा गया था।

किंतु हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन को सबसे व्यवस्थित, वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक रूप आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने दिया। मूलतः यह "हिंदी शब्दसागर" की भूमिका के रूप में लिखा गया था, जिसे बाद में सन् 1929 में स्वतंत्र पुस्तक "हिंदी साहित्य का इतिहास" के रूप में प्रकाशित किया गया। शुक्ल जी का यह ग्रंथ आज भी सबसे अधिक प्रामाणिक तथा मानक माना जाता है, और आगे आने वाले लगभग सभी इतिहासकारों ने इसे अपनी चर्चा का केंद्र-बिंदु बनाया — चाहे वे इससे सहमत रहे हों या इसे चुनौती देना चाहे हों।

कालक्रम की दृष्टि से हिंदी साहित्येतिहास-लेखन की परंपरा इस प्रकार आगे बढ़ी:

  • गार्सा द तासी (1839–1871) — इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ए ऐंदुस्तानी (फ्रेंच भाषा में लिखा गया प्रथम व्यवस्थित इतिहास)
  • शिवसिंह सेंगर (1877, कुछ स्रोतों में 1883/1888) — शिवसिंह सरोज
  • जॉर्ज ग्रियर्सन (1889) — द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान
  • मिश्रबंधु (1913–1934) — मिश्रबंधु विनोद
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1929) — हिंदी साहित्य का इतिहास — सर्वाधिक प्रामाणिक तथा मानक ग्रंथ
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी (1940) — हिंदी साहित्य की भूमिका (बाद में "हिंदी साहित्य का आदिकाल" भी)
  • डॉ. नागेंद्र (1973) — हिंदी साहित्य का इतिहास (बाद में हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास, 10 खंडों में)
  • डॉ. बच्चन सिंह (1996, पूर्व कृति 1978) — हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास

इनके अतिरिक्त रामकुमार वर्मा, गणपतिचंद्र गुप्त तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी भी इस परंपरा के महत्वपूर्ण विद्वान हैं, जिनका उल्लेख आगे विस्तार से आएगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मूल काल-विभाजन

शुक्ल जी का काल-विभाजन प्रवृत्ति-आधारित है — अर्थात उन्होंने हर काल का नाम उस काल में प्रमुख रही साहित्यिक प्रवृत्ति के आधार पर रखा। उनकी योजना आज भी हिंदी साहित्य पढ़ाने की मुख्य रीढ़ मानी जाती है:

कालविक्रम संवतअनुमानित ईस्वी सन्प्रवृत्ति-आधारित नाम
आदिकालसं. 1050–1375लगभग 993–1318 ई.वीरगाथा काल
पूर्व मध्यकालसं. 1375–1700लगभग 1318–1643 ई.भक्तिकाल
उत्तर मध्यकालसं. 1700–1900लगभग 1643–1843 ई.रीतिकाल
आधुनिक कालसं. 1900–वर्तमानलगभग 1843 ई.–अब तकगद्यकाल

इसी चार-कालीन ढाँचे को नागरी प्रचारिणी सभा ने भी अपनाया, इसलिए यह आज भी सर्वाधिक परिचित तथा पाठ्यक्रमों में सबसे अधिक प्रयुक्त योजना है। आगे हम हर काल पर अलग-अलग विस्तृत पोस्ट में चर्चा करेंगे — यहाँ हम मुख्यतः नामकरण तथा काल-सीमा को लेकर विद्वानों के मतभेद पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

आदिकाल: नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद

हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल का नाम तय करना विद्वानों के बीच सबसे अधिक विवादित विषयों में से एक रहा है। कम से कम आठ अलग-अलग नाम प्रचलन में हैं — हर एक के पीछे अपना तर्क है:

  • जॉर्ज ग्रियर्सन (द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान) — नाम दिया चारण काल; तर्क: अधिकांश साहित्य चारण कवियों द्वारा रचा गया।
  • मिश्रबंधु (मिश्रबंधु विनोद) — नाम दिया आरंभिक काल; तर्क: केवल कालानुक्रमिक, तटस्थ नामकरण।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल (हिंदी साहित्य का इतिहास) — नाम दिया वीरगाथा काल; तर्क: उपलब्ध रचनाओं में वीर रस व वीरगाथाओं की प्रधानता।
  • महावीर प्रसाद द्विवेदी — नाम दिया बीजवपन काल; तर्क: परवर्ती समस्त हिंदी साहित्य के "बीज" इसी काल में पड़े।
  • राहुल सांकृत्यायन (हिंदी काव्यधारा) — नाम दिया सिद्ध-सामंत काल; तर्क: सिद्धों की धार्मिकता व सामंतों की वीरता, दोनों का सम्मिश्रित संकेत।
  • रामकुमार वर्मा (हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास) — नाम दिया संधिकाल (सं. 750–1000) + चारण काल (सं. 1000–1375); तर्क: अपभ्रंश-हिंदी के मिलन-बिंदु को अलग से चिह्नित करने हेतु द्विभाजन।
  • गणपतिचंद्र गुप्त (हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास) — नाम दिया प्रारंभिक काल / शून्यकाल; तर्क: 1184–1350 ई. की सीमा तय कर तटस्थ नामकरण।
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी (हिंदी साहित्य का आदिकाल) — नाम दिया आदिकाल; तर्क: न किसी एक प्रवृत्ति को अनुचित महत्व, न कालानुक्रम मात्र — आज सर्वाधिक स्वीकृत नाम।

इसके अतिरिक्त चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने इसे अपभ्रंश काल/पुरानी हिंदी, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने वीरकाल तथा कुछ विद्वानों ने संक्रमण/संक्रांति काल भी कहा है।

काल-सीमा पर भी मतभेद है — शुक्ल जी सं. 1050–1375 मानते हैं, तो हजारीप्रसाद द्विवेदी इसे लगभग 1000–1400 ई. तक (अधिक व्यापक सीमा में) देखते हैं, जबकि रामकुमार वर्मा सं. 750 से ही आरंभ मानते हैं। ऐसे मतभेदों को याद रखना प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी उपयोगी है।

शुक्ल बनाम हजारीप्रसाद द्विवेदी: सिद्ध-नाथ साहित्य पर मौलिक मतभेद

आदिकाल पर सबसे गहरा वैचारिक मतभेद शुक्ल जी और हजारीप्रसाद द्विवेदी के बीच है, और यह केवल नामकरण तक सीमित नहीं, बल्कि इस मूल प्रश्न पर है कि सिद्ध व नाथ साहित्य को "साहित्य" माना जाए या नहीं।

आचार्य शुक्ल का मत था कि सिद्धों व नाथों की रचनाओं में धार्मिक-साधनात्मक (योग-संबंधी) तत्व इतने प्रधान हैं कि उन्हें विशुद्ध साहित्य की कोटि में रखना उचित नहीं — उनकी दृष्टि में ये रचनाएँ मुख्यतः सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका प्रतिवाद किया। उनका तर्क था कि सिद्ध-नाथ रचनाकार आगे चलकर भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा (विशेषतः कबीर जैसे संत कवियों) को गहरे रूप से प्रभावित करते हैं; उनकी रचनाओं में सामाजिक असंतोष और आध्यात्मिक चेतना दोनों का सार्थक मिश्रण मिलता है — इसलिए वे साहित्य की कोटि में आती हैं। द्विवेदी जी ने "हिंदी साहित्य की भूमिका" तथा "हिंदी साहित्य का आदिकाल" में यह भी दिखाया कि हिंदी साहित्य को ठीक से समझने के लिए जैन-बौद्ध परंपरा, अपभ्रंश साहित्य, नाथ योगियों, कश्मीरी शैव-दर्शन तथा वैष्णव आगम — इन सभी की परंपरा-सातत्य को साथ लेकर चलना ज़रूरी है।

द्विवेदी जी ने शुक्ल जी के "वीरगाथा काल" नामकरण को भी चुनौती दी — उनके अनुसार शुक्ल द्वारा गिनाई गई अधिकांश रचनाएँ वीरगाथा की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं: पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता ही विवादित है, बीसलदेव रासो वस्तुतः एक गीति-रचना है (वीरगाथा नहीं), तथा जयचंद प्रकाश व जयमयंक-जस-चंद्रिका जैसी रचनाएँ आज अप्राप्य हैं और केवल सूचना-मात्र उपलब्ध है।

यह मतभेद वस्तुतः दो अलग-अलग साहित्येतिहास-दृष्टियों का प्रतिनिधित्व करता है — शुक्ल जी की सामाजिक-ऐतिहासिक दृष्टि (जो रचना के तात्कालिक सामाजिक उपयोग व प्रधान रस को महत्व देती है) और द्विवेदी जी की परंपरा-सातत्य दृष्टि (जो यह देखती है कि कोई रचना आगे के साहित्य को किस तरह प्रभावित करती है)।

बच्चन सिंह की सर्वथा भिन्न दृष्टि

डॉ. बच्चन सिंह ने अपनी चर्चित पुस्तक "हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास" (राधाकृष्ण प्रकाशन, 1996) की भूमिका में स्पष्ट लिखा है — "न तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर। नए इतिहास के लिए शुक्ल जी का इतिहास एक चुनौती है।" इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए उन्होंने एक बिल्कुल वैकल्पिक ढाँचा प्रस्तुत किया।

बच्चन सिंह "आदिकाल" नाम भी स्वीकार नहीं करते — वे इसे "अपभ्रंश काल: जातीय साहित्य का उदय" (लगभग 1000–1400 ई.) कहते हैं, और इसके भीतर चार उप-भाग बनाते हैं: हिंदी भाषा-जाति-साहित्य की अवधारणा, अपभ्रंश काव्य (बौद्ध सिद्ध, नाथ, जैन व जैनेतर काव्य), शृंगार व वीर-दर्पपूर्ण रासो-साहित्य, तथा प्राकृत पैंगलम् व हिंदी के कवि — जिनमें वे विद्यापति, अमीर खुसरो व मुल्ला दाउद को मैथिली, खड़ी बोली व अवधी के प्रतिनिधि "जातीय कवि" के रूप में एक साथ रखते हैं।

आदिकाल की प्रमुख काव्यधाराएँ — संक्षिप्त परिचय

नामकरण-विवाद के अतिरिक्त, आदिकाल में मुख्यतः पाँच काव्यधाराएँ मिलती हैं, जिन पर हम आगे स्वतंत्र, विस्तृत पोस्ट में चर्चा करेंगे:

  • सिद्ध साहित्य — सरहपा (जिन्हें राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी का प्रथम कवि माना), लुइपा, कण्हपा जैसे बौद्ध सिद्धों की दोहा-शैली रचनाएँ।
  • नाथ साहित्य — गोरखनाथ व गोरखबानी, योग-साधना प्रधान।
  • जैन साहित्य — स्वयंभू (अपभ्रंश के "वाल्मीकि" कहे जाते हैं) सहित रास-शैली की रचनाएँ।
  • रासो/चारण साहित्य — पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह), परमाल रासो (जगनिक) आदि वीर-काव्य परंपरा।
  • विद्यापति एवं अमीर खुसरो — क्रमशः मैथिली पदावली और फ़ारसी-मिश्रित पहेली-मुकरी शैली के प्रतिनिधि कवि।

भक्तिकाल: उदय के कारण को लेकर विद्वानों के मत

भक्तिकाल को प्रायः हिंदी साहित्य का "स्वर्ण युग" कहा जाता है, परंतु इसके उदय के कारण को लेकर भी विद्वानों में गहरा मतभेद है:

  • जॉर्ज ग्रियर्सन — भक्ति आंदोलन को ईसाइयत के प्रभाव की देन मानते हैं।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल — इस्लाम/मुस्लिम आक्रमण के विरुद्ध पराजित हिंदू-जाति की प्रतिक्रिया-स्वरूप भक्ति की ओर उन्मुख होना मानते हैं।
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी — भक्ति आंदोलन को भारतीय परंपरा का स्वाभाविक विकास मानते हैं, दक्षिण भारत के आलवार संतों (7वीं-8वीं शताब्दी) की परंपरा से इसका सातत्य जोड़ते हैं; शुक्ल जी की "प्रतिक्रिया" वाली व्याख्या का खंडन करते हैं।
  • बच्चन सिंह — मध्यमार्गी दृष्टि रखते हैं; इस्लाम को अकेला कारण नहीं मानते, फिर भी स्वीकारते हैं कि "यदि मुसलमान न आए होते तो न संत काव्य लिखा जाता, न सूफी काव्य"; भक्ति आंदोलन को "प्रथम नवजागरण" कहते हैं तथा साहित्येतिहास के मूल कारण को आर्थिक मानते हुए सांस्कृतिक कारणों को गौण स्थान देते हैं।

भक्तिकाल की चार काव्यधाराएँ

शुक्ल जी ने भक्तिकालीन काव्य को दो मुख्य भागों — निर्गुण व सगुण — और आगे चार शाखाओं में बाँटा है:

शाखाप्रमुख कविप्रतिनिधि रचना
निर्गुण — ज्ञानाश्रयी (संत काव्य)कबीर, गुरु नानक, दादू दयाल, रैदासबीजक (साखी, सबद, रमैनी)
निर्गुण — प्रेमाश्रयी (सूफी काव्य)मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, मुल्ला दाउदपद्मावत, मृगावती, मधुमालती, चंदायन
सगुण — रामभक्ति शाखातुलसीदासरामचरितमानस, विनयपत्रिका
सगुण — कृष्णभक्ति शाखासूरदास, अष्टछाप कवि, मीराबाईसूरसागर, पदावली

प्रथम सूफी काव्य-रचना पर चार विद्वानों के चार अलग मत

यह भक्तिकाल का एक बहुत दिलचस्प तथा परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण विवाद-बिंदु है — हिंदी की पहली सूफी काव्य-रचना कौन-सी थी, इस पर एकमत नहीं है:

विद्वानप्रथम सूफी रचना मानी गई कृति
आचार्य रामचंद्र शुक्लमृगावती (कुतुबन)
हजारीप्रसाद द्विवेदीसत्यवती कथा (ईश्वरदास)
रामकुमार वर्माचांदायन (मुल्ला दाउद, 1379 ई.)
डॉ. नागेंद्रहंसावली (असाइत, 1370 ई.)

रीतिकाल: नामकरण एवं वर्गीकरण को लेकर विवाद

रीतिकाल के लिए भी कई नाम प्रचलित रहे हैं — शुक्ल जी का रीतिकाल नाम सर्वाधिक प्रचलित है, जबकि मिश्रबंधु ने अलंकृत काल, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने शृंगार काल, चतुरसेन शास्त्री ने अलंकार काल, रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' ने कला काल तथा राहुल सांकृत्यायन ने दरबारी काल कहा है।

शुक्ल जी ने इस काल के कवियों को तीन भागों में बाँटा:

  • रीतिबद्ध — जिन्होंने विधिवत लक्षण-ग्रंथ रचे (केशवदास, चिंतामणि त्रिपाठी, देव, पद्माकर, मतिराम)
  • रीतिसिद्ध — जिन्होंने बिना लक्षण-ग्रंथ रचे भी रीति-सिद्धांतों को व्यवहार में सिद्ध किया (बिहारी — बिहारी सतसई)
  • रीतिमुक्त — जिन्होंने रीति-बंधन से मुक्त होकर स्वच्छंद प्रेम-काव्य रचा (घनानंद, बोधा, ठाकुर, आलम)

बच्चन सिंह इस त्रिविभाजन को "अवैज्ञानिक" मानते हुए इसकी शब्दावली ही पलट देते हैं — वे "बद्धरीति" और "मुक्तरीति" कहते हैं, और मुक्तरीति के भीतर भी "अभिजात्य वर्ग" (केवल बिहारी को रखते हैं) तथा "स्वच्छंद धारा" (घनानंद, ठाकुर, बोधा, आलम) का अलग वर्गीकरण करते हैं। बिहारी के शृंगार-वर्णन के विषय में उनकी टिप्पणी उल्लेखनीय है — वे इसे "चौगान का खेल... सामंतों का प्रिय खेल" कहते हैं, जो शुक्ल जी के उच्च मूल्यांकन ("हिंदी साहित्य का रत्न") से स्पष्टतः भिन्न है।

आधुनिक काल: उपविभाजन की चार अलग-अलग योजनाएँ

आधुनिक काल पर सबसे अधिक असहमति इसके उपविभाजन को लेकर है, क्योंकि शुक्ल जी का मूल इतिहास (1929) प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता तथा समकालीन साहित्य जैसे बाद के आंदोलनों को cover ही नहीं करता — ये सब शुक्ल जी के बाद के विद्वानों ने जोड़े।

  • गणपतिचंद्र गुप्त (हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, 1965) — भारतेंदु युग (1857–1900), द्विवेदी युग (1900–1920), छायावाद युग (1920–1937), प्रगतिवाद (1937–1945), प्रयोगवाद (1945–1965)।
  • डॉ. नागेंद्र (हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास) — पुनर्जागरण/भारतेंदु युग (1857–1900), जागरण-सुधार/द्विवेदी युग (1900–1918), छायावाद (1918–1938), छायावादोत्तर काल (1938 से आगे — जिसे आगे प्रगति-प्रयोग काल व नवलेखन काल में बाँटा गया)।
  • डॉ. बच्चन सिंह (हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 1996) — नवजागरण युग (1857–1920, भारतेंदु व द्विवेदी युग को एक ही मानते हैं), स्वच्छंदतावाद युग (1920–1938, "छायावाद" शब्द को अस्वीकार करते हैं), उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग (1938–वर्तमान, जिसके भीतर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद-नई कविता आदि को अलग "युग" नहीं बल्कि "प्रवृत्तियाँ" मानते हैं)।
  • नागरी प्रचारिणी/प्रचलित पाठ्यक्रम-योजना — संक्रांति काल (1843–1857), भारतेंदु युग (1857–1900), द्विवेदी युग (1900–1918), छायावाद (1918–1936), प्रगतिवाद (1936–1943), प्रयोगवाद (1943–1952), नई कविता (1952–1960), साठोत्तरी कविता (1960–1990), समकालीन (1990–अब तक)।

विशेष रूप से ध्यान देने योग्य: डॉ. बच्चन सिंह "छायावाद" शब्द को ही अस्वीकार करते हैं और इसके स्थान पर "स्वच्छंदतावाद युग" कहना उचित मानते हैं — यह उनके इतिहास-लेखन की सबसे विशिष्ट तथा परीक्षा-दृष्टि से याद रखने योग्य बात है।

काल-विभाजन की पद्धतियाँ — चार आधार

विद्वानों ने मुख्यतः चार आधारों पर काल-विभाजन किया है:

  1. समय के आधार पर — आदिकाल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल, आधुनिक काल
  2. प्रवृत्ति के आधार पर — वीरगाथा काल, भक्तिकाल, रीतिकाल, गद्यकाल
  3. साहित्यकार के नाम पर — भारतेंदु युग, द्विवेदी युग
  4. मिश्रित पद्धति — जैसे शुक्ल जी की योजना स्वयं समय और प्रवृत्ति, दोनों को साथ लेकर चलती है, और आधुनिक काल में साहित्यकार के नाम पर भी युग बाँटे गए हैं

एक नज़र में — संक्षेप तालिका

कालविक्रम संवतईस्वी सन्शुक्ल का नामहजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम
प्रथम कालसं. 1050–1375~993–1318 ई.वीरगाथा कालआदिकाल
द्वितीय कालसं. 1375–1700~1318–1643 ई.भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल)भक्तिकाल
तृतीय कालसं. 1700–1900~1643–1843 ई.रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल)रीतिकाल
चतुर्थ कालसं. 1900–वर्तमान~1843 ई.–अब तकगद्यकाल (आधुनिक काल)आधुनिक काल

महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)

  • "आदिकाल" नाम — हजारीप्रसाद द्विवेदी की देन माना जाता है।
  • "वीरगाथा काल" नाम व 12 प्रतिनिधि रचनाओं की सूची — आचार्य रामचंद्र शुक्ल।
  • "सिद्ध-सामंत काल" — राहुल सांकृत्यायन; "संधिकाल" — रामकुमार वर्मा; "शून्यकाल" — गणपतिचंद्र गुप्त; "चारण काल" — जॉर्ज ग्रियर्सन।
  • सरहपा को राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी का प्रथम सिद्ध कवि माना है।
  • प्रथम सूफी काव्य-रचना पर चार विद्वानों के चार भिन्न मत हैं (मृगावती/सत्यवती कथा/चांदायन/हंसावली)।
  • बिहारी को शुक्ल जी "रीतिसिद्ध" कवि मानते हैं।
  • "तार सप्तक" (अज्ञेय द्वारा संपादित) — सन् 1943 में प्रकाशित — प्रयोगवाद का आरंभ-बिंदु माना जाता है।
  • डॉ. बच्चन सिंह "छायावाद" शब्द को अस्वीकार कर "स्वच्छंदतावाद युग" कहते हैं।
  • शुक्ल जी का मूल इतिहास-ग्रंथ पहले "हिंदी शब्दसागर" की भूमिका के रूप में लिखा गया, बाद में सन् 1929 में स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।
  • हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास-ग्रंथ फ्रेंच भाषा में गार्सा द तासी ने लिखा था।

अभ्यास प्रश्न

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में दिए गए हैं)

  1. "आदिकाल" नाम किस विद्वान की देन माना जाता है?
    • (क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    • (ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (ग) राहुल सांकृत्यायन
    • (घ) रामकुमार वर्मा
  2. "वीरगाथा काल" नामकरण किसने किया?
    • (क) जॉर्ज ग्रियर्सन
    • (ख) मिश्रबंधु
    • (ग) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    • (घ) डॉ. नागेंद्र
  3. आदिकाल को "चारण काल" किसने कहा?
    • (क) जॉर्ज ग्रियर्सन
    • (ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
    • (ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (घ) गणपतिचंद्र गुप्त
  4. "हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास" (1996) के लेखक कौन हैं?
    • (क) डॉ. नागेंद्र
    • (ख) डॉ. बच्चन सिंह
    • (ग) रामस्वरूप चतुर्वेदी
    • (घ) गणपतिचंद्र गुप्त
  5. डॉ. बच्चन सिंह किस शब्द को अस्वीकार कर "स्वच्छंदतावाद युग" कहना उचित मानते हैं?
    • (क) भक्तिकाल
    • (ख) रीतिकाल
    • (ग) छायावाद
    • (घ) प्रगतिवाद
  6. डॉ. बच्चन सिंह ने रीतिकाल के रीतिबद्ध/रीतिसिद्ध/रीतिमुक्त वर्गीकरण को पलटकर क्या कहा?
    • (क) संतकाव्य/सूफीकाव्य
    • (ख) बद्धरीति/मुक्तरीति
    • (ग) पूर्वरीति/उत्तररीति
    • (घ) रीतिपूर्व/रीतिपर
  7. आदिकाल को "संधिकाल" तथा "चारण काल" — दो भागों में किसने बाँटा?
    • (क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (ख) रामकुमार वर्मा
    • (ग) गणपतिचंद्र गुप्त
    • (घ) मिश्रबंधु
  8. आचार्य शुक्ल का "हिंदी साहित्य का इतिहास" मूलतः किस ग्रंथ की भूमिका के रूप में लिखा गया था?
    • (क) हिंदी शब्दसागर
    • (ख) मिश्रबंधु विनोद
    • (ग) शिवसिंह सरोज
    • (घ) हिंदी साहित्य कोश
  9. भक्ति आंदोलन को "ईसाइयत के प्रभाव" की देन किसने बताया?
    • (क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    • (ख) जॉर्ज ग्रियर्सन
    • (ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (घ) डॉ. नागेंद्र
  10. पहली सूफी रचना "मृगावती" (कुतुबन) — यह किस विद्वान का मत है?
    • (क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (ख) रामकुमार वर्मा
    • (ग) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    • (घ) डॉ. नागेंद्र
  11. बिहारी को "रीतिसिद्ध" कवि किसने माना?
    • (क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
    • (ख) डॉ. बच्चन सिंह
    • (ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • (घ) मिश्रबंधु
  12. "तार सप्तक" किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    • (क) 1936
    • (ख) 1943
    • (ग) 1952
    • (घ) 1960
  13. "तार सप्तक" का संपादन किसने किया?
    • (क) निराला
    • (ख) अज्ञेय
    • (ग) मुक्तिबोध
    • (घ) शमशेर बहादुर सिंह
  14. नागरी प्रचारिणी/प्रचलित पाठ्यक्रम-योजना के अनुसार द्विवेदी युग किस अवधि का है?
    • (क) 1857–1900
    • (ख) 1900–1918
    • (ग) 1918–1936
    • (घ) 1936–1943
  15. "हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" किसने और कब लिखा?
    • (क) डॉ. नागेंद्र, 1973
    • (ख) गणपतिचंद्र गुप्त, 1965
    • (ग) रामकुमार वर्मा, 1938
    • (घ) डॉ. बच्चन सिंह, 1978
  16. राहुल सांकृत्यायन ने अपनी किस पुस्तक में आदिकाल को "सिद्ध-सामंत काल" कहा?
    • (क) हिंदी काव्यधारा
    • (ख) हिंदी साहित्य का इतिहास
    • (ग) मिश्रबंधु विनोद
    • (घ) शिवसिंह सरोज
  17. डॉ. बच्चन सिंह ने आदिकाल के स्थान पर क्या नाम प्रस्तावित किया?
    • (क) प्रारंभिक काल
    • (ख) अपभ्रंश काल: जातीय साहित्य का उदय
    • (ग) संधिकाल
    • (घ) शून्यकाल

लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. काल-विभाजन किसे कहते हैं तथा इसकी आवश्यकता क्यों है?
  2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मूल काल-विभाजन लिखिए।
  3. आदिकाल के कोई चार अलग-अलग नामकरण, उनके विद्वानों के नाम सहित लिखिए।
  4. शुक्ल तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी के बीच सिद्ध-नाथ साहित्य को लेकर क्या मतभेद है?
  5. भक्तिकाल के उदय के कारण पर ग्रियर्सन, शुक्ल तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी के मतों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  6. रीतिकाल के कवियों का शुक्ल जी द्वारा किया गया वर्गीकरण लिखिए।
  7. आधुनिक काल के उपविभाजन की कोई दो योजनाएँ तुलनात्मक रूप से लिखिए।
  8. काल-विभाजन की चार पद्धतियाँ कौन-सी हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. हिंदी साहित्य का काल-विभाजन किसने किया?

हिंदी साहित्य का सर्वाधिक प्रामाणिक तथा मानक काल-विभाजन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ "हिंदी साहित्य का इतिहास" (1929) में किया, जिसे बाद में अनेक विद्वानों ने आगे बढ़ाया या चुनौती दी।

2. हिंदी साहित्य के मुख्य चार काल कौन-से हैं?

आदिकाल, भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल), रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल) तथा आधुनिक काल — यही चार मुख्य काल शुक्ल जी की योजना में हैं तथा आज भी सबसे अधिक प्रचलित हैं।

3. आदिकाल को और किन-किन नामों से जाना जाता है?

आदिकाल को वीरगाथा काल (शुक्ल), चारण काल (ग्रियर्सन), बीजवपन काल (महावीर प्रसाद द्विवेदी), सिद्ध-सामंत काल (राहुल सांकृत्यायन), संधिकाल (रामकुमार वर्मा) तथा शून्यकाल (गणपतिचंद्र गुप्त) जैसे नामों से भी जाना जाता है।

4. हजारीप्रसाद द्विवेदी शुक्ल जी से किस बात पर असहमत थे?

द्विवेदी जी सिद्ध व नाथ साहित्य को साहित्य की कोटि में मानते थे, जबकि शुक्ल जी इसे मुख्यतः धार्मिक-सांप्रदायिक शिक्षा मानकर विशुद्ध साहित्य नहीं मानते थे। द्विवेदी जी ने "वीरगाथा काल" नामकरण को भी चुनौती दी।

5. डॉ. बच्चन सिंह का काल-विभाजन शुक्ल जी से किस तरह अलग है?

बच्चन सिंह "आदिकाल" के स्थान पर "अपभ्रंश काल" कहते हैं, रीतिकाल के रीतिबद्ध/रीतिसिद्ध/रीतिमुक्त वर्गीकरण को पलटकर "बद्धरीति/मुक्तरीति" कहते हैं, तथा आधुनिक काल में "छायावाद" शब्द को अस्वीकार कर "स्वच्छंदतावाद युग" प्रयोग करते हैं।

6. आधुनिक काल के उपविभाजन पर विद्वानों में एकमत क्यों नहीं है?

क्योंकि शुक्ल जी का मूल इतिहास-ग्रंथ (1929) प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता तथा समकालीन साहित्य जैसे बाद के आंदोलनों को cover नहीं करता — इन्हें बाद के विद्वानों (नागेंद्र, बच्चन सिंह, गणपतिचंद्र गुप्त आदि) ने अपने-अपने ढंग से जोड़ा, जिससे अलग-अलग योजनाएँ बन गईं।

7. हिंदी की पहली सूफी काव्य-रचना कौन-सी मानी जाती है?

इस पर भी एकमत नहीं है — शुक्ल जी "मृगावती" (कुतुबन), हजारीप्रसाद द्विवेदी "सत्यवती कथा" (ईश्वरदास), रामकुमार वर्मा "चांदायन" (मुल्ला दाउद) तथा डॉ. नागेंद्र "हंसावली" (असाइत) को प्रथम सूफी रचना मानते हैं।

8. भक्तिकाल की चार काव्यधाराएँ कौन-सी हैं?

निर्गुण भक्ति के अंतर्गत ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य — कबीर आदि) व प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य — जायसी आदि), तथा सगुण भक्ति के अंतर्गत रामभक्ति शाखा (तुलसीदास) व कृष्णभक्ति शाखा (सूरदास, मीराबाई आदि) — ये चार शाखाएँ शुक्ल जी ने गिनाई हैं।

9. रीतिकाल के कवियों का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?

शुक्ल जी ने रीतिकालीन कवियों को रीतिबद्ध (जिन्होंने लक्षण-ग्रंथ रचे), रीतिसिद्ध (जिन्होंने बिना लक्षण-ग्रंथ रचे भी रीति-सिद्धांत सिद्ध किए, जैसे बिहारी) तथा रीतिमुक्त (जिन्होंने रीति-बंधन से मुक्त होकर काव्य रचा, जैसे घनानंद) — तीन भागों में बाँटा है।

10. रीतिकाल को और किन नामों से जाना जाता है?

रीतिकाल को अलंकृत काल (मिश्रबंधु), शृंगार काल (विश्वनाथ प्रसाद मिश्र), अलंकार काल (चतुरसेन शास्त्री), कला काल (रमाशंकर शुक्ल 'रसाल') तथा दरबारी काल (राहुल सांकृत्यायन) भी कहा जाता है।

11. "तार सप्तक" का हिंदी साहित्य में क्या महत्व है?

अज्ञेय द्वारा संपादित "तार सप्तक" सन् 1943 में प्रकाशित हुआ, और इसे प्रयोगवाद नामक काव्य-प्रवृत्ति के आरंभ-बिंदु के रूप में देखा जाता है।

12. काल-विभाजन की कितनी पद्धतियाँ हैं?

मुख्यतः चार — समय के आधार पर, प्रवृत्ति के आधार पर, साहित्यकार के नाम पर, तथा इन सबको मिलाकर बनी मिश्रित पद्धति। शुक्ल जी की योजना मुख्यतः मिश्रित पद्धति का उदाहरण है।

13. हिंदी साहित्य का सबसे प्रामाणिक काल-विभाजन कौन-सा माना जाता है?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काल-विभाजन आज भी सबसे प्रामाणिक तथा सर्वाधिक प्रचलित माना जाता है, और लगभग सभी पाठ्यक्रमों में इसी को आधार बनाया जाता है। किंतु यह सर्वसम्मत नहीं है — हजारीप्रसाद द्विवेदी, नागेंद्र व बच्चन सिंह जैसे विद्वानों ने इसमें अलग-अलग संशोधन व चुनौतियाँ दी हैं, जिनकी चर्चा ऊपर विस्तार से की गई है।

14. हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले किस भाषा में लिखा गया?

हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले फ्रेंच भाषा में लिखा गया — फ्रेंच विद्वान गार्सा द तासी ने "इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐंदुई ए ऐंदुस्तानी" (1839–1871) नामक ग्रंथ में यह कार्य किया। हिंदी में लिखा गया प्रथम इतिहास-ग्रंथ शिवसिंह सेंगर की "शिवसिंह सरोज" है।

15. आधुनिक काल कब से माना जाता है?

आचार्य शुक्ल के अनुसार आधुनिक काल सं. 1900 (लगभग 1843 ई.) से आरंभ होकर वर्तमान तक चलता है। नागरी प्रचारिणी सभा/प्रचलित पाठ्यक्रम-योजना में इसे और स्पष्ट रूप से 1843 ई. से "संक्रांति काल" के रूप में गिना जाता है, जो 1857 ई. में भारतेंदु युग में परिणत होता है।

16. क्या इस लेख को PDF के रूप में सहेजा जा सकता है?

हाँ, लेख के ऊपर दिए गए "इस लेख का PDF डाउनलोड करें" बटन से आप इसे आसानी से PDF के रूप में सहेज सकते हैं।

उत्तर कुंजी (MCQ)

1. (ख)   2. (ग)   3. (क)   4. (ख)   5. (ग)   6. (ख)   7. (ख)   8. (क)   9. (ख)   10. (ग)   11. (क)   12. (ख)   13. (ख)   14. (ख)   15. (ख)   16. (क)   17. (ख)

यह भी पढ़ें

संदर्भ

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास — आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1929)
  2. हिंदी साहित्य की भूमिका — हजारीप्रसाद द्विवेदी (1940)
  3. हिंदी साहित्य का आदिकाल — हजारीप्रसाद द्विवेदी
  4. हिंदी साहित्य का इतिहास / हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास — डॉ. नागेंद्र (1973)
  5. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह (1996)
  6. हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास — रामकुमार वर्मा
  7. हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास — गणपतिचंद्र गुप्त (1965)
  8. मिश्रबंधु विनोद — मिश्रबंधु (1913–1934)
  9. शिवसिंह सरोज — शिवसिंह सेंगर

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