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प्रगतिवाद क्या है? पृष्ठभूमि, काल-सीमा, विशेषताएँ और प्रमुख कवि

छायावाद के व्यक्तिवादी, कल्पना-प्रधान तथा आत्माभिव्यक्ति-केंद्रित काव्य के बाद हिंदी कविता ने एक बार फिर करवट ली — इस बार कवि का ध्यान अपने भीतर की सूक्ष्म अनुभूतियों से हटकर समाज के शोषित, वंचित तथा श्रमजीवी वर्ग के यथार्थ जीवन की ओर मुड़ गया। इसी काव्य-प्रवृत्ति को प्रगतिवाद के नाम से जाना जाता है। हमारे पिछले लेखों — आधुनिक काल: परिचय एवं उपविभाजन, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग तथा छायावाद — में हमने आधुनिक काल के क्रमिक युगों को देखा था। इसी क्रम में अब बारी है प्रगतिवाद की — जिसकी जड़ें साहित्य से कहीं आगे, एक संगठित सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन में हैं। इस लेख में हम इसकी वैश्विक व भारतीय पृष्ठभूमि, प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना, काल-सीमा को लेकर विद्वानों के मतभेद, तथा इसके प्रमुख व सीमावर्ती कवियों को विस्तार से समझेंगे।

प्रगतिवाद क्या है? संक्षेप में, प्रगतिवाद हिंदी काव्य की वह प्रवृत्ति है जिसमें कल्पना-प्रधान सौंदर्य-चित्रण के स्थान पर सामाजिक यथार्थ को — विशेषतः किसान-मज़दूर व अन्य वंचित वर्गों के जीवन, आर्थिक विषमता तथा वर्ग-संघर्ष को — काव्य का केंद्रीय विषय बनाया गया, जिसके पीछे मार्क्सवादी व समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है।

पृष्ठभूमि — वैश्विक एवं भारतीय परिदृश्य

प्रगतिवाद का संगठित साहित्यिक रूप किसी एक कवि की व्यक्तिगत काव्य-प्रवृत्ति से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक-राजनीतिक व वैचारिक परिस्थितियों से विकसित हुआ — इसलिए इसे समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि को समझना ज़रूरी है:

  • 1917 की रूसी क्रांति एवं मार्क्सवाद का प्रभाव — सोवियत संघ में सर्वहारा (मज़दूर-किसान) वर्ग की सत्ता-प्राप्ति ने विश्व-भर के लेखकों-बुद्धिजीवियों को यह विश्वास दिलाया कि साहित्य भी सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम बन सकता है।
  • वैश्विक आर्थिक मंदी (1929 के बाद) — बेरोज़गारी, ग़रीबी तथा पूँजीवाद के प्रति मोहभंग ने समाजवादी विचारों को और बल दिया।
  • यूरोप में फ़ासीवाद का उभार — इटली व जर्मनी में फ़ासीवादी सत्ताओं के विरुद्ध विश्व-भर के प्रगतिशील लेखक-कलाकार लामबंद होने लगे थे।
  • भारत का स्वाधीनता आंदोलन — गांधीवादी असहयोग व सविनय अवज्ञा आंदोलनों के साथ-साथ भारत में समाजवादी व साम्यवादी विचारधारा भी युवा वर्ग में तेज़ी से फैल रही थी।
  • भारतीय किसान-मज़दूर आंदोलन — 1930 के दशक में देश के भीतर किसान सभाओं व मज़दूर संगठनों के विस्तार तथा समाजवादी विचारधारा के प्रसार ने भी इस चेतना को ठोस ज़मीन दी।

इन्हीं वैश्विक-भारतीय परिस्थितियों ने मिलकर हिंदी (व अन्य भारतीय भाषाओं) में उस चेतना को जन्म दिया, जो आगे चलकर एक संगठित साहित्यिक आंदोलन का रूप ले सकी।

प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना

प्रगतिवादी साहित्यिक आंदोलन को संगठित रूप देने का श्रेय प्रगतिशील लेखक संघ (Progressive Writers' Association) को जाता है:

  • 1935, लंदन — सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद तथा कुछ अन्य भारतीय छात्रों-लेखकों की पहल से प्रगतिशील लेखक संघ की प्रारंभिक रूपरेखा तथा घोषणा-पत्र तैयार किया गया। उसी वर्ष पेरिस में हुए 'संस्कृति की रक्षा हेतु अंतरराष्ट्रीय लेखक सम्मेलन' ने भी फ़ासीवाद-विरोधी सांस्कृतिक चेतना को मज़बूत करने में भूमिका निभाई, जिससे सज्जाद ज़हीर प्रभावित हुए।
  • 9–10 अप्रैल 1936, लखनऊ — 'रिफ़ाह-ए-आम' क्लब में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन हुआ। स्वागताध्यक्ष चौधरी मुहम्मद अली रुदौलवी के भाषण के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वसम्मति से अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। रशीद जहाँ का इस अधिवेशन को सफल बनाने में विशेष योगदान रहा।
  • प्रेमचंद का अध्यक्षीय भाषण — "साहित्य का उद्देश्य" — मूलतः उर्दू में लिखा-पढ़ा गया यह भाषण बाद में हिंदी में अनूदित होकर 'हंस' पत्रिका के जुलाई 1936 अंक में प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद ने इसमें साहित्य को राजनीति के पीछे चलने वाला नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाकर चलने वाला मार्गदर्शक बताया, और साहित्य की कसौटी उस रचना को माना जो पाठक में गति, संघर्ष व बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं।
"अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।" — प्रेमचंद, 'साहित्य का उद्देश्य' (1936)

हिंदी की ओर से इस अधिवेशन में प्रेमचंद के साथ जैनेंद्र कुमार व शिवदान सिंह चौहान भी शामिल हुए, जबकि निराला व रामविलास शर्मा उस समय लखनऊ में होते हुए भी अधिवेशन में सम्मिलित नहीं हो सके थे।

प्रगतिवाद की काल-सीमा और विद्वानों के मत

प्रगतिवाद की सर्वाधिक प्रचलित तथा परीक्षा-उपयोगी काल-सीमा 1936 से 1943 मानी जाती है — 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन से इस आंदोलन को संगठित साहित्यिक आधार मिला, और 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' के प्रकाशन के साथ हिंदी कविता में प्रयोगवादी प्रवृत्ति प्रमुखता से उभरने लगी। ध्यान रहे, इसका अर्थ यह नहीं कि प्रगतिवादी कवियों ने 1943 के बाद लिखना बंद कर दिया — जैसा आगे स्पष्ट होगा, इस धारा के कई महत्वपूर्ण संग्रह 1943 के बाद भी प्रकाशित होते रहे। छायावाद की तरह ही, विभिन्न साहित्येतिहासकारों ने इसकी काल-सीमा को भिन्न-भिन्न रूप से भी निर्धारित किया है (विस्तार से काल-विभाजन एवं नामकरण वाले लेख में भी देखें):

  • गणपतिचंद्र गुप्त (हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, 1965) — प्रगतिवाद को 1937–1945 की अवधि में रखते हैं।
  • डॉ. नागेंद्र — प्रगतिवाद को स्वतंत्र "युग" के रूप में अलग से चिह्नित नहीं करते; इसे छायावादोत्तर काल (1938 से आगे) के अंतर्गत आने वाले व्यापक "प्रगति-प्रयोग काल" (1938–1953) में समाहित मानते हैं।
  • डॉ. बच्चन सिंह (हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 1996) — इनकी दृष्टि सबसे भिन्न है: वे प्रगतिवाद को स्वतंत्र "युग" नहीं, बल्कि उनके "उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग" (1938–वर्तमान) के भीतर की एक "प्रवृत्ति" मात्र मानते हैं — जैसे इस युग की अन्य प्रवृत्तियाँ (प्रयोगवाद, जनवादी काव्य आदि) भी हैं।

वैचारिक आधार एवं प्रमुख विशेषताएँ

  • सामाजिक यथार्थवाद — कल्पना-प्रधान सौंदर्य-चित्रण के स्थान पर समाज के वास्तविक, प्रायः कटु यथार्थ का सीधा चित्रण।
  • वर्ग-चेतना — मार्क्सवाद से प्रेरित होकर शोषक व शोषित वर्ग के द्वंद्व को केंद्र में रखा गया; मज़दूर, किसान व अन्य श्रमजीवी वर्ग काव्य के नायक बने।
  • व्यक्तिवाद से जनजीवन की ओर झुकाव — व्यक्तिगत सुख-दुख, वेदना व कल्पना-लोक से हटकर कविता का केंद्र सामूहिक जन-जीवन बना।
  • नारी की नई छवि — नारी को केवल सौंदर्य या प्रेम की प्रतीक मानने के बजाय संघर्षशील व चेतनशील व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया।
  • व्यंग्य का प्रयोग — सामाजिक विसंगतियों, पाखंड व शोषण पर तीखे व्यंग्य के माध्यम से प्रहार एक प्रमुख काव्य-उपकरण बना।
  • जनभाषा व लोकभाषा का प्रयोग — कविता को जनजीवन के निकट लाने के लिए बोलचाल की भाषा, लोकभाषा तथा देशज शब्दों को महत्व दिया गया।
  • साम्राज्यवाद व फ़ासीवाद का विरोध — औपनिवेशिक शोषण तथा विश्व-भर में उभर रही फ़ासीवादी सत्ताओं के विरुद्ध काव्य-स्वर मुखर हुआ।
  • रूढ़ि व अंधविश्वास का विरोध — सामाजिक कुरीतियों, रूढ़िवादी परंपराओं व धार्मिक पाखंड पर भी कविता ने प्रहार किया।
  • मानवतावाद एवं सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा — समतामूलक, शोषणमुक्त समाज के निर्माण की आकांक्षा प्रगतिवादी काव्य की केंद्रीय भावभूमि रही।

प्रमुख कवि और आलोचक

प्रगतिवाद में छायावाद जैसी किसी सर्वस्वीकृत "स्तंभ-चतुष्टय" वाली संरचना नहीं मिलती — यह एक व्यापक वैचारिक धारा थी जिसमें कवियों के साथ-साथ आलोचकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय नाम इस प्रकार हैं:

  • नागार्जुन (वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र) — हिंदी के साथ-साथ मैथिली, संस्कृत व बांग्ला के भी जानकार। इनका प्रमुख प्रगतिवादी संग्रह 'युगधारा' (1953) माना जाता है, साथ ही 'प्यासी पथराई आँखें', 'बादल को घिरते देखा है', 'सतरंगे पंखों वाली' व 'भस्मांकुर' जैसी रचनाएँ भी इसी काव्य-चेतना का विस्तार हैं। इन्हें प्रायः "जनकवि" कहा जाता है।
  • केदारनाथ अग्रवाल — पेशे से अधिवक्ता तथा साम्यवाद में गहरी आस्था रखने वाले केदार जी का पहला काव्य-संग्रह 'युग की गंगा' मार्च 1947 (स्वाधीनता-प्राप्ति से कुछ माह पूर्व) प्रकाशित हुआ। बाद के संग्रह 'फूल नहीं रंग बोलते हैं' (1965) के लिए उन्हें 1973 में 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' मिला।
  • त्रिलोचन (शास्त्री) — अवधी, हिंदी व उर्दू के गहरे जानकार तथा सॉनेट-छंद के हिंदी में सफल प्रयोक्ता। इनका प्रथम संग्रह 'धरती' (1945) माना जाता है।
  • रांगेय राघव — बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न कवि-उपन्यासकार; 'अजेय खंडहर', 'मेधावी' व 'पांचाली' जैसी प्रबंधात्मक रचनाओं में सामाजिक चेतना प्रमुख रही।
  • शिवमंगल सिंह 'सुमन' — 'जीवन के गान' व 'प्रलय-सृजन' जैसे संग्रहों के रचयिता।
  • रामविलास शर्मा — मुख्यतः कवि से अधिक प्रगतिवादी आलोचना के प्रमुख सिद्धांतकार के रूप में स्मरणीय। प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों से वे सक्रिय रूप से जुड़े रहे, और इनकी पुस्तक 'प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल' इस धारा के मूल्यांकन की महत्वपूर्ण कृति है।

संक्रमणकालीन व सीमावर्ती स्वर

कुछ कवि, जो मूलतः अन्य काव्यधाराओं (विशेषतः छायावाद) के स्तंभ माने जाते हैं, अपनी रचना-यात्रा के किसी दौर में प्रगतिवादी चेतना के निकट आए — इन्हें प्रगतिवाद का "मूल स्तंभ" कहना उचित नहीं, पर इनकी भूमिका उल्लेखनीय है:

  • निराला — छायावाद के मूल स्तंभों में गिने जाने वाले निराला की 'वह तोड़ती पत्थर', 'विधवा', 'कुकुरमुत्ता' व 'भिक्षुक' जैसी रचनाओं में सर्वहारा वर्ग के दैन्य का सीधा चित्रण मिलता है — इस दृष्टि से इन्हें छायावाद से प्रगतिवाद की ओर के सेतु-कवि के रूप में भी देखा जाता है।
  • सुमित्रानंदन पंत — जिस वर्ष (1936) प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई, उसी वर्ष पंत का संग्रह 'युगांत' प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने स्वयं छायावाद-युग की समाप्ति की घोषणा की — इसीलिए 'युगांत' को छायावाद के मृत्युलेख के रूप में भी देखा जाता है। आगे 'युगवाणी' व 'ग्राम्या' में उनका प्रगतिवादी झुकाव और स्पष्ट होता गया।
  • रामधारी सिंह 'दिनकर' — कुछ स्रोत इन्हें 'हुंकार' व 'रेणुका' जैसी रचनाओं के आधार पर प्रगतिवादी कवियों की सूची में भी गिनते हैं, यद्यपि हिंदी साहित्य के अधिकांश इतिहास-ग्रंथ इन्हें छायावादोत्तर की स्वतंत्र राष्ट्रीय-ओजस्वी काव्यधारा में रखना अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसलिए दिनकर को प्रगतिवाद के मूल कवियों में गिनने के बजाय राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा के प्रमुख कवि के रूप में रखना अधिक उचित है।

इसी दौर का गद्य साहित्य

प्रगतिशील लेखक संघ का प्रभाव सिर्फ़ कविता तक सीमित नहीं रहा — जिस मंच से इस आंदोलन की शुरुआत हुई, उसके अध्यक्ष स्वयं प्रेमचंद (मूलतः गद्यकार) थे, और गद्य में भी इसी दौर में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ आईं।

  • प्रेमचंद — अपने जीवन के अंतिम वर्ष में भी सक्रिय रहे; प्रसिद्ध कहानी "कफ़न" (1936) तथा अधूरा उपन्यास "मंगलसूत्र" (जिसे बाद में पुत्र अमृतराय ने 1948 में पूरा किया) इसी दौर से जुड़े हैं। अक्टूबर 1936 में उनका निधन हो गया।
  • जैनेंद्र कुमार — जो स्वयं 1936 के प्रथम अधिवेशन में उपस्थित थे — इनकी मनोवैज्ञानिक उपन्यास-शैली की प्रतिनिधि कृति "त्यागपत्र" (1937) इसी दौर में प्रकाशित हुई।
  • यशपाल — क्रांतिकारी पृष्ठभूमि से आए यशपाल का प्रथम कहानी-संग्रह "पिंजरे की उड़ान" (1939) तथा प्रथम उपन्यास "दादा कॉमरेड" (1941) इसी अवधि में आए; "देशद्रोही" (1943) भी इसी दौर की रचना है।
  • अज्ञेय — जो आगे चलकर स्वयं प्रयोगवाद के प्रवर्तक बने, उनका पहला उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" (भाग 1, 1941) भी इसी दौर के अंत में प्रकाशित हुआ — यह दिखाता है कि प्रगतिवाद से प्रयोगवाद की ओर की कड़ी गद्य में भी बनती है, जिसकी विस्तृत चर्चा हम प्रयोगवाद वाले लेख में करते हैं।

प्रगतिवाद का साहित्य में योगदान

  • साहित्य को जनजीवन के यथार्थ से सीधे जोड़ा।
  • किसान-मज़दूर व अन्य शोषित-वंचित वर्गों को काव्य के केंद्र में लाया।
  • सामाजिक यथार्थ, आर्थिक विषमता तथा वर्ग-संघर्ष को काव्य-विषय के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई।
  • साहित्य को सामाजिक परिवर्तन और जन-चेतना का प्रभावी माध्यम बनाया।

प्रगतिवाद पर आलोचना

अपने समय की सबसे सशक्त काव्यधाराओं में गिने जाने के बावजूद प्रगतिवाद आलोचना से अछूता नहीं रहा। इसके आलोचकों का मुख्य आक्षेप यह रहा है कि कई रचनाओं में वैचारिक प्रतिबद्धता, कहीं-कहीं नारेबाज़ी की सीमा तक, कलात्मक सूक्ष्मता पर हावी हो गई — अर्थात् कविता कहीं-कहीं विचारधारा का प्रचार-माध्यम मात्र बनकर रह गई। इसके बावजूद प्रगतिवाद ने हिंदी कविता को जनजीवन, सामाजिक विषमता, शोषण व संघर्ष जैसे वास्तविक जीवन के प्रश्नों से गहराई से जोड़े रखा।

आगे की दिशा — प्रयोगवाद की ओर

1943 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित 'तार सप्तक' ने हिंदी कविता को एक नई दिशा दी — इसके मूल सात कवियों में मुक्तिबोध भी शामिल थे, जो प्रगतिवाद से भी गहरा नाता रखते थे। आगे चलकर शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवियों ने भी (दूसरा सप्तक, 1951) इस नई काव्य-चेतना को समृद्ध किया। आधुनिक काल की इस अगली कड़ी — प्रयोगवाद तथा नई कविता — पर हमने विस्तार से चर्चा की है।

अभ्यास हेतु बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में उत्तर-कुंजी में दिए गए हैं)

  1. प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन किस वर्ष हुआ?
    • (क) 1932
    • (ख) 1936
    • (ग) 1938
    • (घ) 1943
  2. प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?
    • (क) सज्जाद ज़हीर
    • (ख) मुंशी प्रेमचंद
    • (ग) रामविलास शर्मा
    • (घ) निराला
  3. प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन का आयोजन किस नगर में हुआ?
    • (क) इलाहाबाद
    • (ख) लखनऊ
    • (ग) दिल्ली
    • (घ) बनारस
  4. प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण का शीर्षक क्या था?
    • (क) साहित्य और समाज
    • (ख) साहित्य का उद्देश्य
    • (ग) कलम का सिपाही
    • (घ) जनता का साहित्य
  5. प्रगतिशील लेखक संघ की प्रारंभिक रूपरेखा 1935 में कहाँ तैयार हुई?
    • (क) मास्को
    • (ख) पेरिस
    • (ग) लंदन
    • (घ) बर्लिन
  6. प्रगतिवाद की सर्वाधिक प्रचलित काल-सीमा क्या मानी जाती है?
    • (क) 1918–1936
    • (ख) 1936–1943
    • (ग) 1943–1952
    • (घ) 1952–1960
  7. डॉ. बच्चन सिंह प्रगतिवाद को क्या मानते हैं?
    • (क) स्वतंत्र युग
    • (ख) उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग के भीतर की एक प्रवृत्ति
    • (ग) छायावाद का ही अंग
    • (घ) रीतिकाल की परंपरा
  8. 1943 में किस काव्य-संग्रह के प्रकाशन के साथ हिंदी कविता में प्रयोगवादी प्रवृत्ति का प्रमुख उभार माना जाता है?
    • (क) कामायनी
    • (ख) तार सप्तक
    • (ग) युगांत
    • (घ) पल्लव
  9. नागार्जुन का वास्तविक नाम क्या था?
    • (क) वैद्यनाथ मिश्र
    • (ख) विद्यानिवास मिश्र
    • (ग) रामनाथ मिश्र
    • (घ) योगेंद्रनाथ मिश्र
  10. नागार्जुन का प्रमुख प्रगतिवादी काव्य-संग्रह कौन-सा माना जाता है?
    • (क) कामायनी
    • (ख) युगधारा
    • (ग) साकेत
    • (घ) पल्लव
  11. केदारनाथ अग्रवाल का पहला काव्य-संग्रह 'युग की गंगा' किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    • (क) 1947
    • (ख) 1936
    • (ग) 1953
    • (घ) 1965
  12. 'फूल नहीं रंग बोलते हैं' के लिए केदारनाथ अग्रवाल को कौन-सा सम्मान मिला?
    • (क) ज्ञानपीठ पुरस्कार
    • (ख) साहित्य अकादमी पुरस्कार
    • (ग) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
    • (घ) पद्म भूषण
  13. त्रिलोचन का प्रथम काव्य-संग्रह 'धरती' किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    • (क) 1936
    • (ख) 1943
    • (ग) 1945
    • (घ) 1953
  14. 'प्रगतिशील काव्यधारा और केदारनाथ अग्रवाल' के लेखक कौन हैं?
    • (क) नागार्जुन
    • (ख) रामविलास शर्मा
    • (ग) त्रिलोचन
    • (घ) रांगेय राघव
  15. 1936 में प्रकाशित सुमित्रानंदन पंत के किस संग्रह को छायावाद-समाप्ति की घोषणा माना जाता है?
    • (क) पल्लव
    • (ख) ग्राम्या
    • (ग) युगांत
    • (घ) युगवाणी
  16. निराला की किस रचना में सर्वहारा वर्ग के जीवन का सीधा यथार्थ-चित्रण मिलता है?
    • (क) राम की शक्तिपूजा
    • (ख) वह तोड़ती पत्थर
    • (ग) सरोज-स्मृति
    • (घ) परिमल
  17. प्रगतिवाद पर सबसे गहरा वैचारिक प्रभाव किस विचारधारा का माना जाता है?
    • (क) रहस्यवाद
    • (ख) मार्क्सवाद
    • (ग) भक्तिवाद
    • (घ) अस्तित्ववाद
  18. "त्यागपत्र" (1937) उपन्यास के रचयिता कौन हैं, जो स्वयं प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में उपस्थित थे?
    • (क) यशपाल
    • (ख) जैनेंद्र कुमार
    • (ग) अज्ञेय
    • (घ) प्रेमचंद
  19. यशपाल का प्रथम उपन्यास "दादा कॉमरेड" किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    • (क) 1937
    • (ख) 1939
    • (ग) 1941
    • (घ) 1943
  20. अज्ञेय के पहले उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" का पहला भाग किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
    • (क) 1936
    • (ख) 1939
    • (ग) 1941
    • (घ) 1944

उत्तर कुंजी

1. (ख) 1936  |  2. (ख) मुंशी प्रेमचंद  |  3. (ख) लखनऊ  |  4. (ख) साहित्य का उद्देश्य  |  5. (ग) लंदन  |  6. (ख) 1936–1943  |  7. (ख) उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग के भीतर की एक प्रवृत्ति  |  8. (ख) तार सप्तक  |  9. (क) वैद्यनाथ मिश्र  |  10. (ख) युगधारा  |  11. (क) 1947  |  12. (ग) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार  |  13. (ग) 1945  |  14. (ख) रामविलास शर्मा  |  15. (ग) युगांत  |  16. (ख) वह तोड़ती पत्थर  |  17. (ख) मार्क्सवाद  |  18. (ख) जैनेंद्र कुमार  |  19. (ग) 1941  |  20. (ग) 1941

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. प्रगतिवाद किसे कहते हैं?

प्रगतिवाद हिंदी काव्य की वह प्रवृत्ति है जिसमें कल्पना-प्रधान सौंदर्य-चित्रण के स्थान पर सामाजिक यथार्थ — विशेषतः किसान-मज़दूर के जीवन, आर्थिक विषमता तथा वर्ग-संघर्ष — को काव्य का केंद्रीय विषय बनाया गया, जिसके पीछे मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है।

2. प्रगतिवाद की काल-सीमा क्या मानी जाती है?

सर्वाधिक प्रचलित व परीक्षा-उपयोगी काल-सीमा 1936 से 1943 मानी जाती है, यद्यपि गणपतिचंद्र गुप्त, डॉ. नागेंद्र व डॉ. बच्चन सिंह जैसे विद्वानों ने इसे अलग-अलग रूप से भी निर्धारित किया है।

3. प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना कब व कहाँ हुई?

इसकी प्रारंभिक रूपरेखा 1935 में लंदन में बनी, और पहला अखिल भारतीय अधिवेशन 9-10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुआ, जिसकी अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद ने की।

4. प्रगतिवाद के प्रमुख कवि कौन हैं?

नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, रांगेय राघव तथा शिवमंगल सिंह 'सुमन' प्रमुख कवि माने जाते हैं, जबकि रामविलास शर्मा इसकी आलोचना-दृष्टि के प्रमुख सिद्धांतकार रहे।

5. क्या इसी दौर में गद्य साहित्य में भी कोई महत्वपूर्ण बदलाव आया?

हाँ — जैनेंद्र कुमार की "त्यागपत्र" (1937), यशपाल की "दादा कॉमरेड" (1941) तथा अज्ञेय के पहले उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" (भाग 1, 1941) जैसी महत्वपूर्ण गद्य-कृतियाँ इसी दौर में सामने आईं। प्रेमचंद, जो स्वयं प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष थे, की अंतिम रचनाएँ भी इसी वर्ष (1936) आईं।

6. प्रगतिवाद के बाद हिंदी कविता किस दिशा में आगे बढ़ी?

1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' के साथ प्रयोगवाद की शुरुआत मानी जाती है, जो आगे चलकर नई कविता में विकसित हुआ — इसकी विस्तृत चर्चा हमारे अगले लेखों में है।

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भारतीय ज्ञान-परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा की नींव वेदों पर टिकी है, और इसी नींव पर उपनिषद, वेदांग, दर्शन-शास्त्र तथा पुराण जैसे अनेक ग्रंथों का विशाल भवन खड़ा हुआ है। प्रायः विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के मन में चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग) तथा अठारह पुराणों को लेकर कई भ्रम रहते हैं — जैसे "छह शास्त्र" वास्तव में कौन-से हैं, अठारहवां पुराण वायु है या शिव, कौन-सा उपनिषद किस वेद से जुड़ा है, अथवा कल्पसूत्र क्या होते हैं। अधिकांश लेख इस विषय पर केवल नामों की सूची तक सीमित रह जाते हैं। इस लेख में हम इससे आगे बढ़कर प्रत्येक ग्रंथ-समूह की प्रकृति, आंतरिक संरचना, संबंधित ब्राह्मण-आरण्यक ग्रंथों, तथा हर भ्रम के पीछे के वास्तविक कारण को भी विस्तार से, प्रामाणिक ढंग से समझेंगे। वैदिक साहित्य की संरचना भारतीय शास्त्र-परंपरा को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जाता है — श्रुति और स्मृति । श्रुति का अर्थ है वह ज्ञान जो ऋषियों ने साधना और श्रवण द्वारा प्राप्त किया — इसके अंतर्गत चारों वेद और उनसे जुड़े संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उ...

हिंदी भाषा की विशेषताएँ – उत्पत्ति, इतिहास, महत्व एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

एक नज़र में हिंदी भारत की राजभाषा है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी का विकास संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → आधुनिक हिंदी के रूप में हुआ। हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है तथा विश्वभर में करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। "हिन्दी भारतीय संस्कृति की आत्मा है" — कमलापति त्रिपाठी का यह कथन हिंदी के महत्व को बहुत सटीक ढंग से व्यक्त करता है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि भारत की पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। इस लेख में हम हिंदी की उत्पत्ति, उसकी भाषिक विशेषताओं तथा वर्तमान वैश्विक स्थिति को विस्तार से, तथ्यों सहित समझेंगे — हिंदी भाषा का परिचय हिंदी भारत की राजभाषा है तथा विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में गिनी जाती है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं — नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना जैसे कई देशों में भी हिंदी बोली और समझी जाती है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशाल जनसमूह की भाषा होते हुए भी अपनी सरलता और वैज्ञानिकता के लिए जानी जाती है। हिंदी की उत्पत्ति और विकास हिंदी का उद्भव संस्कृत से हु...

देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, मराठी, मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ (जैसे नेपाली) भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह लिपि भारत की अनेक अन्य लिपियों के सन्निकट भी है। इस आलेख में हम देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसके नामकरण, विशेषताओं, वैज्ञानिकता, गुण-दोष तथा अन्य लिपियों से इसकी तुलना — इन सभी पक्षों को विस्तार एवं प्रामाणिकता के साथ जानेंगे। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति संसार की सभी भाषाओं को लिखने के लिए किसी न किसी लिपि का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार देवनागरी भी एक लिपि है जिसका प्रयोग मूलतः हिंदी भाषा को लिखने के लिए किया जाता है। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। प्राचीन समय में आर्यों द्वारा प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त समस्त भारतीय लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। ...

रामचरितमानस (तुलसी रामायण) के सात कांड || 7 Kand of Ramcharitmans (Tulsidas_Ramayan)

रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण (Ramayan) के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'। रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को यदि "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" जाय तो अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है। माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल...