छायावाद और प्रगतिवाद के बाद हिंदी कविता में एक ऐसी प्रयोगशील प्रवृत्ति उभरी, जिसमें कवि अपनी बदलती हुई निजी व आधुनिक जीवन-अनुभूति को व्यक्त करने के लिए भाषा, बिम्ब और शिल्प के बिल्कुल नए रास्ते तलाशने लगा। इसी प्रवृत्ति को प्रयोगवाद कहा गया। हमारे पिछले लेखों — आधुनिक काल: परिचय एवं उपविभाजन, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद तथा प्रगतिवाद — में हमने आधुनिक काल के क्रमिक युगों को देखा था; प्रगतिवाद वाले लेख के अंत में हमने संकेत भी दिया था कि अगली कड़ी प्रयोगवाद व नई कविता की होगी। इस लेख में हम तार सप्तक के जन्म, "प्रयोगवाद" नाम को लेकर हुए विवाद, चारों सप्तकों के कवियों, तथा प्रयोगवाद व नई कविता के जटिल रिश्ते को विस्तार से समझेंगे।
एक नज़र में: प्रयोगवाद हिंदी काव्य की वह धारा है जिसका सूत्रपात 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित काव्य-संकलन "तार सप्तक" से माना जाता है। इसमें मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद्र जैन, रामविलास शर्मा तथा स्वयं अज्ञेय — इन सात कवियों की रचनाएँ संकलित थीं। "प्रयोगवाद" नाम स्वयं आलोचक नंददुलारे वाजपेयी ने, आरंभ में आलोचनात्मक ढंग से, गढ़ा था। आगे चलकर दूसरे व तीसरे सप्तक (1951, 1959) के साथ यही धारा "नई कविता" कहलाने लगी — और दोनों नामों के आपसी रिश्ते पर आज भी विद्वानों में मतभेद है।
प्रयोगवाद क्या है? (परिचय एवं पृष्ठभूमि)
प्रयोगवाद हिंदी काव्य की वह प्रवृत्ति है जिसमें कवि ने न तो छायावाद जैसी कल्पना-प्रधान वैयक्तिकता को अपनाया, न प्रगतिवाद जैसी वर्ग-चेतना प्रधान सामाजिक प्रतिबद्धता को — बल्कि अपनी निजी, प्रायः खंडित व जटिल अनुभूति को नए बिम्बों, नए प्रतीकों तथा नए काव्य-रूपों में व्यक्त करने का सायास "प्रयोग" किया। इसी सायास नएपन के कारण इसे प्रयोगवाद कहा गया। इसका जन्म दोनों पूर्ववर्ती धाराओं की सीमाओं की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुआ — छायावाद के भावाडंबर व शब्दाडंबर से भी मुक्ति चाहिए थी, और प्रगतिवादी कविता की कुछ रचनाओं में दिखाई देने वाली नारेबाज़ी तथा सीधी-अभिधात्मक अभिव्यक्ति से अलग रास्ता खोजने की इच्छा भी थी। इसके साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका, उससे उपजा मोहभंग, पश्चिमी अस्तित्ववादी चिंतन तथा फ्रायड के मनोविश्लेषण से हुए परिचय ने इस दौर की आत्मचेतना व मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को गहराई से प्रभावित किया, और तेज़ी से बढ़ते नगरीकरण व मध्यवर्गीय जीवन की उलझनों ने भी इस नई काव्य-चेतना को गढ़ने में भूमिका निभाई।
यहाँ "प्रयोग" का अर्थ केवल भाषा को कठिन या असामान्य बना देना भर नहीं है। प्रयोगवादी कवि अपने अनुभव को अधिक प्रामाणिक ढंग से व्यक्त करने के लिए भाषा, बिंब, प्रतीक, उपमान, छंद तथा संरचना — सभी स्तरों पर नए रूपों की तलाश करता है; इस अर्थ में प्रयोग स्वयं लक्ष्य नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति और सत्य तक पहुँचने का एक माध्यम है।
नामकरण — "प्रयोगवाद" शब्द की उत्पत्ति
"प्रयोगवाद" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग आलोचक नंददुलारे वाजपेयी ने अपने निबंध "प्रयोगवादी रचनाएँ" में किया — और उन्होंने यह नाम किसी प्रशंसा में नहीं, बल्कि आलोचनात्मक व उपेक्षापूर्ण स्वर में गढ़ा था — उन्होंने अपने इसी निबंध में इस नई काव्यधारा को "बैठे ठाले का धंधा" तक कह डाला। यह ठीक वैसा ही है जैसा हमने छायावाद वाले लेख में देखा था कि "छायावाद" नाम भी आरंभ में पूरी तरह प्रशंसात्मक नहीं था। दूसरी ओर, स्वयं अज्ञेय ने तार सप्तक की भूमिका में इन नए कवियों के लिए एक कहीं अधिक सकारात्मक शब्दावली चुनी — उन्होंने इन्हें "राहों के अन्वेषी" कहा, यानी नए रास्तों के खोजी।
यहाँ एक ज़रूरी विरोधाभास भी समझने योग्य है — जिस धारा को "प्रयोगवाद" नाम दिया गया, उसके सबसे प्रमुख कवि अज्ञेय स्वयं इस नामकरण से सहमत नहीं थे। आगे चलकर दूसरे सप्तक की भूमिका में उन्होंने स्पष्ट लिखा — "प्रयोग का कोई वाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं हैं।" उनका आशय था कि प्रयोग स्वयं में साध्य (लक्ष्य) नहीं, बल्कि आत्म-सत्य तक पहुँचने का एक साधन मात्र है — फिर भी उनके इस विरोध के बावजूद "प्रयोगवाद" नाम ही अंततः प्रचलन में बना रहा।
तार सप्तक — प्रयोगवाद का प्रस्थान-बिंदु
तार सप्तक की मूल योजना प्रभाकर माचवे और नेमिचंद्र जैन से जुड़ी मानी जाती है; अज्ञेय ने इसे संपादित करके प्रकाशित कराया। भारतीय ज्ञानपीठ से 1943 में प्रकाशित इस संकलन में सात युवा कवियों की रचनाएँ शामिल थीं:
- गजानन माधव 'मुक्तिबोध'
- नेमिचंद्र जैन
- भारतभूषण अग्रवाल
- प्रभाकर माचवे
- गिरिजाकुमार माथुर
- रामविलास शर्मा
- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (स्वयं संपादक)
ध्यान देने योग्य है कि रामविलास शर्मा, जिन्हें हमने प्रगतिवाद वाले लेख में मुख्यतः प्रगतिवादी आलोचना के सिद्धांतकार के रूप में देखा था, तार सप्तक में एक कवि के रूप में भी शामिल थे — यह दोनों काव्यधाराओं के बीच के जटिल, आपस में गुँथे रिश्ते का एक दिलचस्प उदाहरण है। प्रयोगवाद के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु अज्ञेय ने 1947 में इलाहाबाद से 'प्रतीक' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरंभ किया।
आगे के सप्तक और नई कविता की ओर यात्रा
अज्ञेय के संपादन में आगे तीन और सप्तक प्रकाशित हुए, जिनके साथ यह धारा धीरे-धीरे "नई कविता" कहलाने लगी:
दूसरा सप्तक (संपादन 1949, प्रकाशन 1951): भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंतला माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती। दूसरे सप्तक के प्रकाशन के साथ ही प्रयोगशील कविता को "नई कविता" के रूप में देखने की प्रवृत्ति तेज़ हुई। इसीलिए 1951 को नई कविता के विकास का एक प्रमुख आरंभ-बिंदु माना जाता है।
तीसरा सप्तक (1959): कीर्ति चौधरी, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तथा मदन वात्स्यायन।
चौथा सप्तक (1979): अवधेश कुमार, राजकुमार कुंभज, स्वदेश भारती, नंदकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा तथा राजेंद्र किशोर।
प्रयोगवाद और नई कविता — एक ही धारा या अलग?
सरल रूप में समझें तो प्रयोगवाद को नई कविता की पूर्वपीठिका या आरंभिक प्रयोगशील अवस्था माना जा सकता है — 1943 के तार सप्तक से शुरू हुई प्रयोगशील प्रवृत्तियाँ 1951 के दूसरे सप्तक तथा उसके बाद अधिक व्यापक जीवन-बोध के साथ नई कविता में विकसित हुईं। इसलिए प्रयोगवाद और नई कविता को न तो पूरी तरह अलग धाराएँ मानना उचित है, न दोनों को बिल्कुल समान समझना।
हालाँकि, हिंदी आलोचना में इनके संबंध को लेकर गहरे मतभेद भी रहे हैं। एक मत यह है कि प्रयोगवाद (तार सप्तक, 1943) और नई कविता (दूसरा-तीसरा सप्तक, 1951 से आगे) — दोनों एक ही आंदोलन के दो सोपान (चरण) मात्र हैं। इसके विपरीत, रामविलास शर्मा तथा नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने "नई कविता" को प्रयोगवाद का "छद्म रूप" माना — अर्थात उनकी दृष्टि में यह वास्तविक बदलाव नहीं, बल्कि प्रयोगवाद का ही नाम बदलकर प्रस्तुत किया गया रूप था। एक तीसरा विवाद इस बात पर भी है कि प्रयोगवाद का जन्म वास्तव में हुआ कहाँ से — आलोचक जगदीश गुप्त जैसे कुछ विद्वान मानते हैं कि प्रयोगवाद प्रगतिवाद की ही कोख से जन्मा (चूँकि तार सप्तक के कई कवियों, जैसे रामविलास शर्मा व स्वयं अज्ञेय की आरंभिक कविताओं में भी समाजवादी स्वर मिलता है), जबकि प्रगतिवादी खेमे का एक वर्ग इसके ठीक विपरीत यह मानता रहा कि प्रयोगवाद, प्रगतिवाद की जन-चेतना को कमज़ोर करने के उद्देश्य से सुनियोजित ढंग से खड़ा किया गया आंदोलन था।
काल-सीमा को लेकर विद्वानों के मत
व्यवहार में प्रयोगवाद को समझने के लिए 1943 के तार सप्तक को आरंभ-बिंदु और 1951 के दूसरे सप्तक को नई कविता की ओर संक्रमण का प्रमुख पड़ाव मानना सबसे सुविधाजनक है — परीक्षा की दृष्टि से सामान्यतः इसी 1943 से 1951 के संक्रमण को समझना पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त, प्रयोगवाद की कोई एक सर्वमान्य काल-सीमा नहीं है; छायावाद व प्रगतिवाद की तरह ही, अलग-अलग साहित्येतिहासकारों ने इसे अपने-अपने ढंग से भी सीमांकित किया है:
- गणपतिचंद्र गुप्त (हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास) — प्रयोगवाद को 1945 से 1965 तक की व्यापक अवधि में रखते हैं।
- डॉ. नागेंद्र — जैसा हमने प्रगतिवाद वाले लेख में भी देखा था, वे प्रगतिवाद व प्रयोगवाद दोनों को अलग-अलग स्वतंत्र "युग" के रूप में चिह्नित नहीं करते, बल्कि दोनों को मिलाकर एक व्यापक "प्रगति-प्रयोग काल" (1938–1953) के अंतर्गत रखते हैं।
- डॉ. नगेंद्र (आलोचक के रूप में परिभाषा) — प्रयोगवाद को एक शैलीगत विद्रोह मानते हैं, जो प्रगतिवाद की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया-स्वरूप उत्पन्न हुआ।
- डॉ. बच्चन सिंह — अपनी सतत दृष्टि के अनुरूप, इसे भी स्वतंत्र "युग" नहीं बल्कि अपने "उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग" (1938–वर्तमान) के भीतर की एक प्रवृत्ति मात्र मानते हैं।
वैचारिक आधार एवं प्रमुख विशेषताएँ
ध्यान रहे, इनमें से कुछ प्रवृत्तियाँ — विशेषकर लघु मानव के प्रति दृष्टिपात, नगरीय मध्यवर्गीय संवेदना व व्यंग्य — प्रयोगवाद से आगे बढ़कर नई कविता के व्यापक भाव-बोध में और भी अधिक मुखर रूप से विकसित हुईं।
- व्यक्तिवाद (एक नए ढंग का): प्रयोगवादी व्यक्तिवाद छायावादी व्यक्तिवाद से भिन्न है — यह कल्पना-प्रधान आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति की जटिल, प्रायः खंडित मनोदशाओं का ईमानदार विश्लेषण है।
- बौद्धिकता की प्रधानता: भावुकता के स्थान पर तर्क, विश्लेषण व बौद्धिक व्यायाम को अधिक महत्व मिला — कविता पाठक के हृदय से पहले उसकी बुद्धि को संबोधित करने लगी।
- नए बिम्ब, प्रतीक एवं उपमान: परंपरागत, घिसे-पिटे उपमानों (जैसे चाँद-सूरज-फूल की रूढ़ तुलनाएँ) के स्थान पर रोज़मर्रा के जीवन से उठाए गए बिल्कुल नए, कभी-कभी असुंदर या असहज बिम्बों का साहसिक प्रयोग हुआ।
- निराशा, अनास्था एवं अकेलापन: युद्धोत्तर मोहभंग तथा अस्तित्ववादी चिंतन के प्रभाव से कविता में गहरी निराशा, अलगाव व अस्तित्व-संबंधी उलझनों का चित्रण प्रमुखता से उभरा।
- लघु मानव के प्रति दृष्टिपात: महाकाव्यात्मक या आदर्शवादी नायकों के बजाय सामान्य, "लघु" (आम) मनुष्य के क्षणिक अनुभवों व सूक्ष्म संवेदनाओं को काव्य-विषय बनाया गया।
- छंद-मुक्ति के साथ नई लय-चेतना: पारंपरिक छंद-बंधन से मुक्त होकर मुक्त छंद अपनाया गया, फिर भी भाषा की आंतरिक लय पर सजग ध्यान बना रहा।
- नगरीय मध्यवर्गीय संवेदना: शहरी, शिक्षित मध्यवर्ग का जटिल और विभाजित मनोविश्व विशेष रूप से उभरकर कविता के केंद्र में आया।
- व्यंग्य एवं आत्म-विश्लेषण: स्वयं अपने ऊपर तथा समाज की विसंगतियों पर तीखा आत्म-सजग व्यंग्य इस काव्यधारा की एक पहचान बना।
प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं
नीचे दी गई सूची में तार सप्तक के प्रमुख कवियों के साथ बाद के सप्तकों से जुड़े वे कवि भी शामिल हैं, जिनका संबंध प्रयोगवाद से विकसित नई कविता की परंपरा से रहा।
- अज्ञेय (1911–1987): प्रयोगवाद के प्रमुख प्रवर्तक तथा नई कविता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कवि। प्रमुख काव्य-कृतियाँ — हरी घास पर क्षण भर, इत्यलम्, तथा असाध्य वीणा (सर्जन-प्रक्रिया पर केंद्रित उनकी बहुचर्चित लंबी कविता)। जापानी हाइकु के हिंदी अनुवाद के लिए भी उल्लेखनीय। अज्ञेय एक सफल उपन्यासकार भी थे — विस्तार से आगे "इसी दौर का गद्य साहित्य" सेक्शन में देखें।
- गजानन माधव 'मुक्तिबोध' (1917–1964): प्रयोगवाद से जुड़े सबसे गंभीर व वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कवियों में मुक्तिबोध का स्थान विशेष है। प्रमुख कृतियाँ — चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल; इनकी दीर्घ कविता "अंधेरे में" हिंदी की सर्वाधिक चर्चित लंबी कविताओं में गिनी जाती है।
- गिरिजाकुमार माथुर: मंजीर तथा नाश और निर्माण जैसी कृतियों के रचयिता।
- धर्मवीर भारती: दूसरे सप्तक के कवि, आगे चलकर उपन्यासकार व नाटककार के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए — अंधा युग (काव्य-नाटक), कनुप्रिया तथा उपन्यास गुनाहों का देवता इनकी बहुचर्चित रचनाएँ हैं।
- शमशेर बहादुर सिंह: दूसरे सप्तक के कवि, बिंब-विधान की सूक्ष्मता के लिए विशेष रूप से समादृत। प्रमुख संग्रह — चुका भी हूँ मैं नहीं, इतने पास अपने, काल तुझसे होड़ है मेरी।
- रघुवीर सहाय: दूसरे सप्तक के कवि। प्रमुख संग्रह — सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध।
- भवानी प्रसाद मिश्र: दूसरे सप्तक के कवि, सहज-सरल भाषा में गहरी संवेदना के लिए जाने जाते हैं। प्रमुख संग्रह — गीत फरोश, खुशबू के शिलालेख।
इसी दौर का गद्य साहित्य
प्रयोगवाद का काल-दायरा (1943-1951) अपेक्षाकृत संकरा है — हिंदी गद्य की बड़ी हलचलें इससे पहले (प्रेमचंद, गुलेरी) या बाद में (नई कहानी, आंचलिक उपन्यास) ज़्यादा घटित हुईं। फिर भी, इसी दौर में स्वयं अज्ञेय — जो कविता में इस धारा के प्रवर्तक थे — एक उल्लेखनीय गद्यकार के रूप में भी सक्रिय रहे: उनके उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" का दूसरा भाग (1944, पहला भाग 1941 में आ चुका था) तथा "नदी के द्वीप" (1951) — दोनों इसी अवधि में प्रकाशित हुए, और मनोवैज्ञानिक गहराई व अस्तित्ववादी चेतना की दृष्टि से इन्हें उनकी कविता की ही सहयात्री रचनाएँ माना जाता है।
प्रयोगवाद और प्रगतिवाद में अंतर
दोनों के बीच मूल अंतर कविता के केंद्र-बिंदु और अभिव्यक्ति की प्राथमिकताओं में है; इसका यह अर्थ नहीं कि प्रयोगवादी कविता सामाजिक जीवन से, या प्रगतिवादी कविता व्यक्ति की अनुभूति से, पूरी तरह मुक्त थी।
- केंद्र-बिंदु: प्रगतिवाद समाज व वर्ग-चेतना को केंद्र में रखता है, जबकि प्रयोगवाद व्यक्ति की निजी, जटिल अनुभूति को।
- भाषा: प्रगतिवाद की भाषा अपेक्षाकृत सीधी व अभिधात्मक (स्पष्ट) है, जबकि प्रयोगवाद नए, कभी-कभी दुरूह बिम्बों व प्रतीकों का सायास प्रयोग करता है।
- दृष्टिकोण: प्रगतिवाद पर मार्क्सवादी सामाजिक-आर्थिक दृष्टि का गहरा प्रभाव था; प्रयोगवाद वैचारिक बंधन से मुक्त होकर वैयक्तिक अनुभव को अधिक प्रामाणिक मानता है।
- पात्र: प्रगतिवाद में किसान-मज़दूर केंद्रीय पात्र हैं, प्रयोगवाद में शहरी, शिक्षित, अक्सर अकेला मध्यवर्गीय व्यक्ति।
प्रयोगवाद का मूल्यांकन
उपलब्धियाँ: प्रयोगवाद ने हिंदी कविता को रूढ़ उपमानों व बंधी-बंधाई विचारधाराओं, दोनों से मुक्त कर उसे भाषा व शिल्प के स्तर पर अभूतपूर्व साहस दिया — नए बिंब-प्रतीकों का संसार, व्यक्ति के आंतरिक जीवन की गहरी पड़ताल, तथा छंद व संरचना में मिली स्वतंत्रता इसकी प्रमुख देन मानी जाती है।
सीमाएँ: आलोचक शिवदान सिंह चौहान जैसे विद्वानों ने प्रयोगवादी कविता में पश्चिमी प्रतीकवाद के अनुकरण की प्रवृत्ति की ओर संकेत किया; कुछ आलोचकों ने इसे अतिशय बौद्धिकता व दुरूहता में उलझा हुआ भी बताया, तथा सामाजिक सरोकार से दूरी का आरोप भी इस पर लगता रहा है। इन विवादों के बावजूद, तार सप्तक से शुरू हुई यह यात्रा आगे चलकर नई कविता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही, जिसकी विस्तृत चर्चा हमने अगले लेख में की है।
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)
- "प्रयोगवाद" शब्द का प्रथम प्रयोग — नंददुलारे वाजपेयी, निबंध "प्रयोगवादी रचनाएँ"; इन्होंने ही इसे "बैठे ठाले का धंधा" भी कहा।
- तार सप्तक (1943) — संपादक अज्ञेय; मूल योजना प्रभाकर माचवे व नेमिचंद्र जैन की थी; प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ।
- अज्ञेय ने तार सप्तक के कवियों को "राहों के अन्वेषी" कहा।
- तार सप्तक के 7 कवि — मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा, अज्ञेय।
- दूसरा सप्तक — संपादन 1949, प्रकाशन 1951; इसी के साथ "नई कविता" नाम प्रचलित हुआ।
- तीसरा सप्तक — 1959; चौथा सप्तक — 1979 (चारों के संपादक अज्ञेय)।
- प्रयोगवाद के प्रचार हेतु अज्ञेय द्वारा प्रकाशित पत्रिका — 'प्रतीक' (1947, इलाहाबाद)।
- अज्ञेय स्वयं "प्रयोगवाद" नाम से सहमत नहीं थे — दूसरे सप्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा: "प्रयोग का कोई वाद नहीं है। हम वादी नहीं रहे, नहीं हैं।"
- रामविलास शर्मा व नामवर सिंह — "नई कविता" को प्रयोगवाद का "छद्म रूप" मानते हैं।
- गणपतिचंद्र गुप्त — प्रयोगवाद की काल-सीमा 1945–1965 मानते हैं; डॉ. नागेंद्र इसे प्रगतिवाद सहित "प्रगति-प्रयोग काल" (1938–1953) में समाहित मानते हैं।
- मुक्तिबोध की प्रसिद्ध लंबी कविता — "अंधेरे में"; अज्ञेय की — "असाध्य वीणा"।
- अज्ञेय के इसी दौर के उपन्यास — "शेखर: एक जीवनी" (भाग 2, 1944) तथा "नदी के द्वीप" (1951)।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
(उत्तर लेख के अंत में उत्तर-कुंजी में दिए गए हैं)
- तार सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
(क) 1936 (ख) 1943 (ग) 1951 (घ) 1959 - तार सप्तक के संपादक कौन थे?
(क) प्रभाकर माचवे (ख) नेमिचंद्र जैन (ग) अज्ञेय (घ) रामविलास शर्मा - तार सप्तक की मूल परिकल्पना किसकी मानी जाती है?
(क) अज्ञेय (ख) प्रेमचंद (ग) प्रभाकर माचवे व नेमिचंद्र जैन (घ) मुक्तिबोध - तार सप्तक में कुल कितने कवि संकलित हैं?
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8 - निम्नलिखित में से कौन तार सप्तक के कवि नहीं हैं?
(क) मुक्तिबोध (ख) गिरिजाकुमार माथुर (ग) शमशेर बहादुर सिंह (घ) रामविलास शर्मा - "प्रयोगवाद" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया?
(क) अज्ञेय (ख) नंददुलारे वाजपेयी (ग) नामवर सिंह (घ) रामविलास शर्मा - नंददुलारे वाजपेयी ने प्रयोगवाद को क्या कहा था?
(क) राहों के अन्वेषी (ख) बैठे ठाले का धंधा (ग) छद्म रूप (घ) शैलीगत विद्रोह - अज्ञेय ने तार सप्तक की भूमिका में इन कवियों को क्या कहा?
(क) राहों के अन्वेषी (ख) जनकवि (ग) युग-चारण (घ) प्रगतिशील कवि - दूसरा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
(क) 1947 (ख) 1951 (ग) 1953 (घ) 1959 - दूसरे सप्तक के कवि नहीं हैं —
(क) शमशेर बहादुर सिंह (ख) रघुवीर सहाय (ग) मुक्तिबोध (घ) धर्मवीर भारती - तीसरा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
(क) 1953 (ख) 1955 (ग) 1959 (घ) 1965 - चौथा सप्तक किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
(क) 1969 (ख) 1975 (ग) 1979 (घ) 1985 - प्रयोगवाद के प्रचार-प्रसार हेतु अज्ञेय ने 1947 में कौन-सी पत्रिका शुरू की?
(क) हंस (ख) सरस्वती (ग) प्रतीक (घ) प्रताप - मुक्तिबोध की प्रसिद्ध लंबी कविता कौन-सी है?
(क) असाध्य वीणा (ख) अंधेरे में (ग) कनुप्रिया (घ) यह दीप अकेला - अज्ञेय की सर्जन-प्रक्रिया पर केंद्रित बहुचर्चित लंबी कविता कौन-सी है?
(क) चाँद का मुँह टेढ़ा है (ख) असाध्य वीणा (ग) अंधा युग (घ) यामा - डॉ. नगेंद्र के अनुसार प्रयोगवाद क्या है?
(क) पश्चिमी प्रतीकवाद का अनुकरण (ख) शैलीगत विद्रोह जो प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया-स्वरूप उत्पन्न हुआ (ग) छायावाद की निरंतरता (घ) रहस्यवाद का नया रूप - रामविलास शर्मा व नामवर सिंह ने "नई कविता" को क्या कहा?
(क) प्रगतिवाद का विस्तार (ख) प्रयोगवाद का छद्म रूप (ग) छायावाद का पुनर्जागरण (घ) स्वतंत्र आंदोलन - गणपतिचंद्र गुप्त प्रयोगवाद की काल-सीमा क्या मानते हैं?
(क) 1936–1943 (ख) 1938–1953 (ग) 1945–1965 (घ) 1951–1979 - डॉ. नागेंद्र प्रगतिवाद व प्रयोगवाद को मिलाकर किस काल में रखते हैं?
(क) उत्तर-स्वच्छंदतावाद युग (ख) प्रगति-प्रयोग काल (ग) आधुनिक काल (घ) नव्योत्तर काल - "अंधा युग" तथा "गुनाहों का देवता" के रचयिता कौन हैं, जो दूसरे सप्तक के कवि भी थे?
(क) शमशेर बहादुर सिंह (ख) रघुवीर सहाय (ग) धर्मवीर भारती (घ) नरेश मेहता - अज्ञेय ने "प्रयोगवाद" शब्द के संबंध में क्या मत व्यक्त किया था?
(क) प्रयोग स्वयं साध्य है (ख) प्रयोग का कोई वाद नहीं है (ग) प्रयोग केवल सामाजिक यथार्थ के लिए है (घ) प्रयोग छायावाद की पुनरावृत्ति है - अज्ञेय के उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" का दूसरा भाग किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
(क) 1941 (ख) 1944 (ग) 1947 (घ) 1951 - अज्ञेय के उपन्यास "नदी के द्वीप" के प्रकाशन का वर्ष क्या है?
(क) 1943 (ख) 1947 (ग) 1951 (घ) 1959
उत्तर कुंजी
1. (ख) 1943 | 2. (ग) अज्ञेय | 3. (ग) प्रभाकर माचवे व नेमिचंद्र जैन | 4. (ग) 7 | 5. (ग) शमशेर बहादुर सिंह | 6. (ख) नंददुलारे वाजपेयी | 7. (ख) बैठे ठाले का धंधा | 8. (क) राहों के अन्वेषी | 9. (ख) 1951 | 10. (ग) मुक्तिबोध | 11. (ग) 1959 | 12. (ग) 1979 | 13. (ग) प्रतीक | 14. (ख) अंधेरे में | 15. (ख) असाध्य वीणा | 16. (ख) शैलीगत विद्रोह जो प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया-स्वरूप उत्पन्न हुआ | 17. (ख) प्रयोगवाद का छद्म रूप | 18. (ग) 1945–1965 | 19. (ख) प्रगति-प्रयोग काल | 20. (ग) धर्मवीर भारती | 21. (ख) प्रयोग का कोई वाद नहीं है | 22. (ख) 1944 | 23. (ग) 1951
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. प्रयोगवाद किसे कहते हैं?
प्रयोगवाद हिंदी काव्य की वह धारा है, जिसमें कवि ने छायावाद की कल्पना-प्रधानता और प्रगतिवाद की वैचारिक प्रतिबद्धता — दोनों से हटकर, अपनी निजी व जटिल अनुभूति को नए बिम्बों, प्रतीकों व शिल्प में व्यक्त करने का सायास प्रयोग किया।
2. प्रयोगवाद का प्रारंभ कब और किससे माना जाता है?
1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित काव्य-संकलन "तार सप्तक" के प्रकाशन से।
3. "प्रयोगवाद" नाम किसने दिया?
आलोचक नंददुलारे वाजपेयी ने अपने निबंध "प्रयोगवादी रचनाएँ" में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया, और आरंभ में यह नाम आलोचनात्मक स्वर में ही गढ़ा गया था।
4. तार सप्तक में कौन-कौन कवि शामिल थे?
मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा तथा स्वयं अज्ञेय।
5. प्रयोगवाद और नई कविता में क्या अंतर है?
सरल रूप में, प्रयोगवाद को नई कविता की पूर्वपीठिका और आरंभिक प्रयोगशील चरण माना जा सकता है — नई कविता ने प्रयोगवाद से नए शिल्प व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ग्रहण की, पर उसका जीवन-बोध कहीं अधिक व्यापक हो गया। इसलिए दोनों को पूरी तरह समान मानना जितना अनुचित है, उतना ही दोनों को बिल्कुल अलग धाराएँ मान लेना भी। इस संबंध को लेकर आलोचकों में गहरा मतभेद भी रहा है — रामविलास शर्मा व नामवर सिंह जैसे आलोचक तो "नई कविता" को प्रयोगवाद का "छद्म रूप" तक मान चुके हैं।
6. चारों सप्तक कौन-कौन से हैं?
तार सप्तक (1943), दूसरा सप्तक (1951), तीसरा सप्तक (1959) तथा चौथा सप्तक (1979) — चारों के संपादक अज्ञेय थे।
7. प्रयोगवाद और प्रगतिवाद में क्या अंतर है?
प्रगतिवाद समाज व वर्ग-चेतना को केंद्र में रखता है और अपेक्षाकृत सीधी भाषा अपनाता है, जबकि प्रयोगवाद व्यक्ति की निजी अनुभूति को नए, जटिल बिम्बों में व्यक्त करता है।
8. प्रयोगवाद के प्रमुख कवि कौन हैं?
तार सप्तक के कवियों (अज्ञेय, मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर आदि) के साथ-साथ, प्रयोगवाद से विकसित नई कविता से जुड़े धर्मवीर भारती, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय तथा भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवि भी इस व्यापक काव्य-परंपरा के प्रमुख नाम हैं।
9. मुक्तिबोध की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन-सी है?
इनकी दीर्घ कविता "अंधेरे में" हिंदी की सर्वाधिक चर्चित लंबी कविताओं में गिनी जाती है।
10. प्रयोगवाद के बाद हिंदी कविता किस दिशा में आगे बढ़ी?
तार सप्तक से शुरू हुई यह यात्रा दूसरे-तीसरे सप्तक के साथ नई कविता में विकसित हुई, और आगे चलकर समकालीन हिंदी कविता के विकास में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
11. क्या इसी दौर में अज्ञेय ने गद्य में भी कुछ लिखा?
हाँ — इसी दौर में उनके उपन्यास "शेखर: एक जीवनी" का दूसरा भाग (1944) तथा "नदी के द्वीप" (1951) प्रकाशित हुए, जो उनकी कविता जैसी ही मनोवैज्ञानिक व अस्तित्ववादी चेतना से युक्त हैं।
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संदर्भ
- हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
- हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास — डॉ. नागेंद्र
- कविता के नए प्रतिमान — नामवर सिंह
- तार सप्तक (भूमिका सहित) — संपादक: अज्ञेय, भारतीय ज्ञानपीठ, 1943
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