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द्विवेदी युग: नामकरण, समय-सीमा, विशेषताएं, साहित्यकार और रचनाएं

आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग के बाद जो चरण आता है, उसे द्विवेदी युग कहा जाता है। यह वह दौर है जब खड़ी बोली — जो अब तक केवल गद्य की भाषा मानी जाती थी — कविता की भी भाषा बन गई, और हिंदी साहित्य को भाषा की दृष्टि से एक नई अनुशासित दिशा मिली। इस लेख में हम द्विवेदी युग की समय-सीमा, नामकरण, प्रमुख विशेषताएं, साहित्यकार और उनकी रचनाओं को विस्तार से समझेंगे।

नामकरण एवं समय-सीमा

नामकरण — आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग के बाद आने वाले चरण को द्विवेदी युग कहा जाता है। इसका नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर पड़ा। इसका प्रमुख कारण यह है कि उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी भाषा और साहित्य को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1903 में 'सरस्वती' का संपादन संभालने के बाद उन्होंने भाषा-परिष्कार, व्याकरण-सम्मत लेखन, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार और साहित्यिक अनुशासन पर विशेष बल दिया। उनके प्रभाव से अनेक नए रचनाकारों को दिशा मिली और खड़ी बोली हिंदी को काव्य की प्रतिष्ठित भाषा के रूप में विकसित होने में महत्वपूर्ण आधार मिला। इसीलिए उनके नाम पर इस साहित्यिक चरण को 'द्विवेदी युग' कहा गया।

अन्य नाम — डॉ. नगेन्द्र ने इस युग को “जागरण-सुधार काल” कहा है। यह नाम इस युग की प्रमुख प्रवृत्तियों को स्पष्ट करता है। एक ओर साहित्य में राष्ट्रीय चेतना, स्वदेश-प्रेम और सांस्कृतिक जागरण की भावना मजबूत हुई, तो दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध सुधारवादी दृष्टि विकसित हुई। इसलिए 'जागरण-सुधार काल' नाम द्विवेदी युग की व्यापक साहित्यिक चेतना को समझने में सहायक है।

समय-सीमा — इस लेख में द्विवेदी युग की समय-सीमा सन् 1900 से 1918 ई. मानी गई है। सन् 1900 में 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर इस युग के साहित्यिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बने और 1920 तक इस पद पर रहे। लेकिन किसी साहित्यिक युग की सीमा केवल किसी साहित्यकार के संपादकीय कार्यकाल से निर्धारित नहीं होती; साहित्यिक प्रवृत्तियों में होने वाले व्यापक परिवर्तन भी इसके निर्धारण का आधार होते हैं। सन् 1918 के आसपास हिंदी कविता में नए भावबोध और कलात्मक प्रवृत्तियों का उभार दिखाई देने लगा, जिसे आगे चलकर छायावाद के रूप में पहचान मिली। इसलिए सामान्य अध्ययन और परीक्षा की दृष्टि से 1900–1918 ई. को द्विवेदी युग की निश्चित समय-सीमा मानना सबसे सुविधाजनक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सन् 1900 में इलाहाबाद से 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। सन् 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बने और लगभग सत्रह-अठारह वर्षों तक (1920 तक) इस पद पर रहे। इन वर्षों में 'सरस्वती' केवल एक पत्रिका नहीं रही, बल्कि हिंदी नवजागरण, भाषा-परिष्कार और साहित्यिक चेतना के विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गई। द्विवेदी जी ने पत्रिका के माध्यम से भाषा की शुद्धता, व्याकरण-सम्मत लेखन और विषय-वस्तु की गंभीरता पर लगातार बल दिया, जिससे युवा रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी अनुशासित होकर सामने आई।

द्विवेदी युग की प्रमुख विशेषताएं

खड़ी बोली का काव्य-भाषा बननाभारतेंदु युग तक गद्य खड़ी बोली में और कविता ब्रजभाषा में लिखी जाती थी। द्विवेदी जी के संपादकीय प्रयासों और उनके समकालीन कवियों के रचनात्मक योगदान से खड़ी बोली हिंदी काव्य की प्रमुख और प्रतिष्ठित भाषा के रूप में स्थापित हुई — यह इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

भाषा एवं व्याकरण की शुद्धता — द्विवेदी जी ने भाषा-परिष्कार को एक आंदोलन का रूप दिया। वर्तनी, व्याकरण और शब्द-चयन में शुद्धता पर विशेष आग्रह इस युग के लेखन की पहचान बनी।

राष्ट्रीय चेतना — स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक दौर से जुड़ा यह समय था, इसलिए साहित्य में देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव के भाव प्रमुखता से उभरे।

समाज-सुधार की दृष्टि — अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सुधारवादी स्वर इस युग के निबंधों और कविताओं में स्पष्ट दिखता है।

आदर्शवाद और नीतिपरकता — इस युग का काव्य आदर्शवादी और उपदेशात्मक है — सत्य, त्याग और आत्मगौरव जैसे मूल्यों को केंद्र में रखकर रचनाएं लिखी गईं।

इतिहास-पुराण आधारित प्रबंध-काव्य — पौराणिक और ऐतिहासिक कथानकों को आधार बनाकर बड़े प्रबंध-काव्य रचे गए, जिनमें प्राचीन कथा को नए आदर्शों के साथ प्रस्तुत किया गया।

गद्य विधाओं का सतत विकास — निबंध और आलोचना जैसी विधाएं इस युग में विशेष रूप से गंभीर व अनुशासित रूप में विकसित हुईं; कहानी व उपन्यास में भी उल्लेखनीय सक्रियता रही (विस्तार से आगे देखें)।

इतिवृत्तात्मकता — इस युग के काव्य में कथा, घटनाओं और वर्णन को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिला — यानी काव्य वर्णनात्मक और आख्यानपरक शैली की ओर झुका, जो परीक्षा की दृष्टि से भी इस युग की एक पहचान मानी जाती है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी: युग-प्रवर्तक

महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 15 मई 1864 को रायबरेली के दौलतपुर गांव में हुआ और निधन 11 दिसंबर 1938 को हुआ। वे केवल एक कवि या निबंधकार ही नहीं, बल्कि संपादक, अनुवादक, आलोचक और व्याकरणाचार्य — सबकुछ एक साथ थे। 'सरस्वती' के संपादक के रूप में उन्होंने भाषा-शुद्धता और व्याकरण-सम्मत लेखन पर निरंतर बल देते हुए युवा रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी को दिशा दी — इसीलिए उन्हें युग-प्रवर्तक कहा जाता है।

प्रमुख साहित्यकार एवं उनकी रचनाएं

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' — इनका महाकाव्य 'प्रियप्रवास' खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य माना जाता है; 'वैदेही वनवास' भी इनकी उल्लेखनीय रचना है।

मैथिलीशरण गुप्त — इस युग में इन्होंने 'भारत-भारती', 'जयद्रथ-वध' और 'रंग में भंग' जैसी रचनाएं दीं। राष्ट्रीय चेतना जगाने में इनकी रचनाओं की बड़ी भूमिका रही, और आगे चलकर इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि मिली।

श्रीधर पाठक — प्रकृति-चित्रण के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।

रामनरेश त्रिपाठी — 'पथिक' और 'मिलन' जैसी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं।

अन्य प्रमुख नाम — गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', जगन्नाथदास 'रत्नाकर', नाथूराम शर्मा 'शंकर' और लोचन प्रसाद पाण्डेय भी इस युग के उल्लेखनीय साहित्यकारों में गिने जाते हैं।

इसी दौर का गद्य साहित्य

खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाने के साथ-साथ इसी दौर में गद्य की भी कई विधाएं — निबंध, कहानी व उपन्यास — तेज़ी से विकसित हुईं।

निबंध

स्वयं महावीर प्रसाद द्विवेदी एक श्रेष्ठ निबंधकार भी थे। इनके अतिरिक्त बालमुकुंद गुप्त — "शिवशंभु के चिट्ठे" (1903-1907, 'भारत मित्र' पत्रिका में प्रकाशित व्यंग्य-निबंध); अध्यापक पूर्णसिंह — "मज़दूरी और प्रेम"; तथा माधव प्रसाद मिश्र व श्यामसुंदर दास भी इस दौर के उल्लेखनीय निबंधकार माने जाते हैं।

कहानी

किशोरीलाल गोस्वामी की "इंदुमति" (1900, सरस्वती पत्रिका) को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी की प्रथम कहानी माना है, जबकि चंद्रधर शर्मा गुलेरी की "उसने कहा था" (1915, सरस्वती पत्रिका) को हिंदी की प्रथम आधुनिक कहानी माना जाता है — दोनों दावे अलग-अलग कसौटियों पर आधारित हैं, इसलिए परस्पर-विरोधी नहीं।

उपन्यास

किशोरीलाल गोस्वामी ने साठ से अधिक उपन्यास लिखे — तारा, चपला, लवंग लता जैसी रोमांटिक-ऐतिहासिक रचनाएं इनमें प्रमुख हैं। दूसरी ओर गोपाल राम गहमरी को "जासूसी उपन्यास का जनक" माना जाता है — उन्होंने 'जासूस' नामक मासिक पत्रिका के लिए लगभग हर महीने एक उपन्यास लिखा और कुल 200 से अधिक उपन्यासों की रचना की।

द्विवेदी युग का महत्व

द्विवेदी युग को हिंदी साहित्य के इतिहास में एक संक्रमण-काल कहा जा सकता है — भारतेंदु युग की स्वच्छंदता से आगे बढ़कर यह युग भाषा और विषय दोनों में अनुशासन लेकर आया। खड़ी बोली के काव्य-रूप को प्रतिष्ठित करके इस युग ने आगे आने वाले छायावाद और आधुनिक हिंदी काव्य के विकास के लिए मजबूत आधार तैयार किया। यही कारण है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके समकालीनों को आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. द्विवेदी युग किसे कहते हैं?
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के उस चरण को द्विवेदी युग कहते हैं जो लगभग 1900 से 1918 (कुछ विद्वानों के अनुसार 1920) तक चला और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर जाना जाता है।

2. भारतेंदु युग और द्विवेदी युग में मुख्य अंतर क्या है?
भारतेंदु युग में कविता ब्रजभाषा में और गद्य खड़ी बोली में लिखा जाता था; द्विवेदी युग में खड़ी बोली कविता की भी भाषा बन गई, और लेखन में भाषा-शुद्धता व अनुशासन पर विशेष बल दिया गया।

3. महावीर प्रसाद द्विवेदी को युग-प्रवर्तक क्यों माना जाता है?
'सरस्वती' के संपादक के रूप में उन्होंने भाषा-परिष्कार, व्याकरण-सम्मत लेखन, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े साहित्य को प्रोत्साहित किया तथा अनेक रचनाकारों को दिशा दी।

4. द्विवेदी युग की काव्य-भाषा क्या थी?
खड़ी बोली — जो इस युग की सबसे बड़ी और स्थायी देन मानी जाती है।

5. द्विवेदी युग के बाद कौन-सा युग आया?
द्विवेदी युग के बाद छायावाद युग की शुरुआत हुई, जिसमें काव्य भाषा और भी अधिक भावप्रवण व कल्पनाशील हो गई।

6. द्विवेदी युग में गद्य साहित्य की क्या स्थिति रही?
इस दौर में निबंध (बालमुकुंद गुप्त, अध्यापक पूर्णसिंह), कहानी (किशोरीलाल गोस्वामी, चंद्रधर शर्मा गुलेरी) तथा उपन्यास (किशोरीलाल गोस्वामी, गोपाल राम गहमरी) — तीनों विधाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ। गुलेरी की "उसने कहा था" (1915) को हिंदी की प्रथम आधुनिक कहानी माना जाता है।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में दिए गए हैं)

1. द्विवेदी युग की सामान्यतः स्वीकृत समय-सीमा क्या मानी जाती है?
(a) 1850-1868 (b) 1868-1900 (c) 1900-1918 (d) 1918-1936

2. द्विवेदी युग का नामकरण किसके नाम पर हुआ?
(a) भारतेंदु हरिश्चंद्र (b) महावीर प्रसाद द्विवेदी (c) रामचंद्र शुक्ल (d) जयशंकर प्रसाद

3. 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन किस वर्ष शुरू हुआ?
(a) 1868 (b) 1900 (c) 1918 (d) 1936

4. डॉ. नगेन्द्र ने द्विवेदी युग को क्या नाम दिया?
(a) गद्य-काल (b) पुनर्जागरण काल (c) जागरण-सुधार काल (d) छायावाद काल

5. खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य 'प्रियप्रवास' किसकी रचना है?
(a) मैथिलीशरण गुप्त (b) अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (c) श्रीधर पाठक (d) रामनरेश त्रिपाठी

6. द्विवेदी युग की कविता की मुख्य भाषा क्या बनी?
(a) ब्रजभाषा (b) अवधी (c) खड़ी बोली (d) भोजपुरी

7. "उसने कहा था" (1915) के रचयिता कौन हैं, जिसे हिंदी की प्रथम आधुनिक कहानी माना जाता है?
(a) किशोरीलाल गोस्वामी (b) चंद्रधर शर्मा गुलेरी (c) प्रेमचंद (d) बालमुकुंद गुप्त

8. "शिवशंभु के चिट्ठे" (व्यंग्य-निबंध) के लेखक कौन हैं?
(a) महावीर प्रसाद द्विवेदी (b) बालमुकुंद गुप्त (c) अध्यापक पूर्णसिंह (d) श्यामसुंदर दास

9. गोपाल राम गहमरी किस विधा के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं?
(a) निबंध (b) जासूसी उपन्यास (c) नाटक (d) आलोचना

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MCQ उत्तर

1. (c) 1900-1918  |  2. (b) महावीर प्रसाद द्विवेदी  |  3. (b) 1900  |  4. (c) जागरण-सुधार काल  |  5. (b) अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'  |  6. (c) खड़ी बोली  |  7. (b) चंद्रधर शर्मा गुलेरी  |  8. (b) बालमुकुंद गुप्त  |  9. (b) जासूसी उपन्यास

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