द्विवेदी युग की स्थूल, इतिवृत्तात्मक तथा सुधारवादी काव्य-प्रवृत्तियों के बाद हिंदी काव्य में एक नई धारा उभरी, जिसमें कवि का ध्यान बाहरी संसार के वर्णन से हटकर अपने भीतर के सूक्ष्म भावों, प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध और कल्पना-प्रधान सौंदर्य-चित्रण की ओर मुड़ गया। इसी काव्य-प्रवृत्ति को छायावाद के नाम से जाना जाता है। हमारे पिछले लेखों — आधुनिक काल: परिचय एवं उपविभाजन तथा द्विवेदी युग — में हमने कहा था कि आधुनिक काल के प्रमुख युगों और काव्य-आंदोलनों पर अलग-अलग विस्तृत लेख आएँगे। उसी क्रम में भारतेंदु युग और द्विवेदी युग के बाद अब बारी है छायावाद की — जिसे हिंदी काव्य में साहित्यिक खड़ीबोली के स्वर्णयुग के रूप में भी जाना जाता है। सामान्यतः छायावाद पर चर्चा चार प्रमुख कवियों तक सीमित रह जाती है; इस लेख में हम उनके साथ-साथ इस काल के अन्य महत्वपूर्ण कवियों, समानांतर काव्यधाराओं, समांतर गद्य साहित्य और प्रचलित वर्गीकरण एवं शब्दावली को विस्तार से समझेंगे।
एक नजर में: छायावाद हिंदी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की वह काव्यधारा है जो लगभग सन् 1918 से 1936 ई. तक की प्रमुख युगवाणी रही। इसके नामकरण का श्रेय मुकुटधर पांडेय को दिया जाता है, जिन्होंने 1920 में "श्री शारदा" पत्रिका में "हिंदी में छायावाद" शीर्षक लेखमाला प्रकाशित की थी। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत तथा महादेवी वर्मा — इन चार कवियों को छायावाद के "चार स्तंभ" कहा जाता है, जबकि रामकुमार वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', हरिवंशराय बच्चन जैसे अनेक अन्य कवि भी इसी दौर से जुड़े या इससे गहरे प्रभावित रहे। ठीक इसी दौर में प्रेमचंद का पूरा प्रमुख उपन्यास-काल (सेवासदन से गोदान तक) भी सामने आया।
छायावाद क्या है? (परिचय एवं काल-सीमा)
छायावाद द्विवेदी युग के बाद हिंदी कविता की वह धारा है जिसमें वैयक्तिक अनुभूति, कल्पना-प्रधानता, प्रकृति-प्रेम तथा प्रतीकात्मक अभिव्यंजना-शैली को केंद्रीय स्थान मिला। इसकी काल-सीमा को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है — सर्वाधिक प्रचलित सीमा 1918 से 1936 ई. मानी जाती है (यही सीमा हमने काल-विभाजन एवं नामकरण वाले लेख में भी नागरी प्रचारिणी की योजना के अंतर्गत दी थी), किंतु कुछ विद्वान इसे 1916 से, तो कुछ 1917 से आरंभ मानते हैं। नामवर सिंह के अनुसार सन् 1920 ई. तक इन नई कविताओं के लिए "छायावाद" नाम रूढ़ हो चुका था।
नामकरण — "छायावाद" शब्द की उत्पत्ति
"छायावाद" शब्द के प्रथम प्रयोग तथा नामकरण, दोनों का श्रेय मुकुटधर पांडेय को दिया जाता है। सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका "श्री शारदा" में उन्होंने "हिंदी में छायावाद" शीर्षक से चार निबंधों की एक लेखमाला प्रकाशित करवाई — यहीं से पहली बार आधिकारिक रूप से इस नई काव्य-प्रवृत्ति की विशेषताओं का उद्घाटन हुआ। मुकुटधर पांडेय ने अपने निबंधों में छायावाद की पाँच विशेषताएँ गिनाई थीं — वैयक्तिकता, स्वातंत्र्य चेतना, रहस्यवादिता, शैलीगत वैशिष्ट्य तथा अस्पष्टता। स्वयं मुकुटधर पांडेय की कविता "कुररी के प्रति" को कई परीक्षा-स्रोत छायावाद की प्रथम कविता मानते हैं।
छायावाद के सटीक प्रारंभ-बिंदु को लेकर भी एकमत नहीं है — कुछ विद्वान निराला की "जूही की कली" (1916) को छायावादी प्रवृत्ति की आरंभिक महत्वपूर्ण रचनाओं में गिनते हुए इसी से इसकी शुरुआत जोड़ते हैं, तो कुछ पंत के काव्य-संग्रह "उच्छ्वास" (1920) से इसका आरंभ मानते हैं — यानी किसी एक रचना या तिथि को निर्विवाद रूप से "पहला बिंदु" घोषित करना कठिन है। यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. बच्चन सिंह "छायावाद" शब्द को ही स्वीकार नहीं करते — वे इसके स्थान पर "स्वच्छंदतावाद युग" कहना उचित मानते हैं, जैसा हमने काल-विभाजन वाले लेख में भी नोट किया था।
इन तमाम मतभेदों के बावजूद, परीक्षा एवं पाठ्यक्रम की दृष्टि से एक बात स्थिर है — "छायावाद" नाम व उसका सूत्रपात मुकुटधर पांडेय (1920, "श्री शारदा") से ही जोड़ा जाता है, और यही सबसे सुरक्षित तथा सर्वाधिक स्वीकृत उत्तर माना जाता है।
उदय की पृष्ठभूमि
छायावाद का जन्म मुख्यतः द्विवेदी युग की काव्यगत इतिवृत्तात्मकता, स्थूलता तथा सुधारवादी आदर्शों की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुआ। इसके साथ ही अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों के अध्ययन तथा बंगला में रवींद्रनाथ ठाकुर की रहस्यात्मक कविताओं के प्रभाव ने भी इसे गहराई से प्रभावित किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार बंगाल में पुराने ईसाई संतों के "छायाभास" (फैंटज्मैटा) तथा यूरोपीय प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अनुकरण पर जो कविताएँ रची गईं, वे वहाँ "छायावाद" कही जाने लगीं — और यही नाम हिंदी में भी इस नई काव्यधारा के लिए प्रचलित हो गया। राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि से यह गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान की चेतना से भी प्रभावित रहा।
छायावाद की परिभाषा को लेकर विद्वानों के मत
"छायावाद" शब्द की कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा कभी स्थिर नहीं हो सकी — हर विद्वान ने इसे अपने ढंग से परिभाषित किया है:
- मुकुटधर पांडेय — इसे "रहस्यवाद" के अर्थ में प्रयुक्त मानते हैं, अंग्रेज़ी-बंगला की मिस्टिक कविताओं की तरह इसमें अस्पष्टता व भावों का धुंधलापन देखते हैं।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी — इसके प्रति आलोचनात्मक रहे; उनका कहना था कि इसका अर्थ स्पष्ट नहीं होता, संभवतः यह तब कहा जाता है जब किसी कविता के भावों की छाया कहीं और जाकर पड़े।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल — इसके दो अर्थ बताते हैं: एक रहस्यवाद के अर्थ में, दूसरा काव्य-शैली (शैली वैचित्र्य) के अर्थ में — अर्थात प्रस्तुत के स्थान पर उसे व्यंजित करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत कथन।
- सुशील कुमार — "अस्पष्टता" को इसका मूल लक्षण मानते हैं।
- नंददुलारे वाजपेयी — इसे "आध्यात्मिक छाया का भान" कहते हैं; छायावादी काव्य में भावों की अप्रासादकता (दुरूहता) को एक सीमा मानते हैं।
- डॉ. नगेंद्र — "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह" के रूप में परिभाषित करते हैं।
प्रवर्तक को लेकर मतभेद
छायावाद का "प्रवर्तक" या "जनक" किसे माना जाए, इस पर भी विद्वानों में एकमत नहीं है:
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल — मैथिलीशरण गुप्त तथा मुकुटधर पांडेय को खड़ी बोली काव्य को अधिक कल्पनामय व चित्रमय रूप देने वाले आरंभिक कवि मानते हैं, किंतु छायावादी रहस्यवादी कविता को इस परंपरा की स्वाभाविक निरंतरता नहीं मानते।
- नंददुलारे वाजपेयी — सुमित्रानंदन पंत तथा उनके काव्य-संग्रह "उच्छ्वास" (1920) से छायावाद का आरंभ मानते हैं।
- इलाचंद्र जोशी तथा शिवनाथ — जयशंकर प्रसाद को छायावाद का जनक मानते हैं।
- विनयमोहन शर्मा तथा प्रभाकर माचवे — माखनलाल चतुर्वेदी को इसका प्रवर्तक मानते हैं।
इस प्रकार छायावाद के "प्रवर्तक" या "जनक" के रूप में किसी एक कवि का नाम सर्वसम्मति से निर्धारित नहीं किया जा सकता। परीक्षा-सामग्री में जयशंकर प्रसाद को प्रायः प्रमुख प्रवर्तक/प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है — चूँकि उन्होंने इसे सबसे अधिक दार्शनिक गहराई तथा महाकाव्यात्मक विस्तार दिया — जबकि नामकरण का श्रेय सामान्यतः मुकुटधर पांडेय को ही दिया जाता है।
चार स्तंभ — प्रमुख कवि एवं रचनाएँ
जयशंकर प्रसाद (1889–1937)
काशी के "सुंघनी साहू" परिवार में जन्मे प्रसाद जी को छायावाद का प्रवर्तक व प्रतिनिधि कवि माना जाता है। उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अंतिम कृति "कामायनी" (1936) हिंदी की सर्वाधिक प्रतिष्ठित महाकाव्यात्मक रचनाओं में गिनी जाती है — "चिंता" सर्ग से आरंभ होकर "आनंद" सर्ग तक फैले इस 15 सर्गों के महाकाव्य में मनु, श्रद्धा तथा इड़ा के माध्यम से मानव-सभ्यता की यात्रा तथा शैव दर्शन पर आधारित "आनंदवाद" की स्थापना की गई है। इसे छायावाद का "उपनिषद" भी कहा जाता है। अन्य प्रमुख रचनाएँ — झरना (1918), आँसू (1925), लहर (1933) तथा चित्राधार (1918, ब्रजभाषा में)। प्रसाद जी एक सफल गद्यकार भी थे — इनके नाटक व उपन्यास आगे "इसी दौर का गद्य साहित्य" सेक्शन में देखें।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1896–1961)
निराला छायावाद के सबसे प्रयोगशील तथा विद्रोही स्वर के कवि माने जाते हैं। उनकी आरंभिक बहुचर्चित कविता "जूही की कली" (1916) से निराला को हिंदी में मुक्त छंद के प्रमुख प्रवर्तकों में गिना जाता है, और इसी आधार पर कुछ विद्वान इसी रचना से छायावाद के आरंभ को भी जोड़ते हैं। उनके काव्य पर अद्वैत वेदांत का गहरा प्रभाव है। प्रमुख रचनाएँ — परिमल, गीतिका, अनामिका, तथा तुलसीदास (जीवनीपरक महाकाव्य)।
सुमित्रानंदन पंत (1900–1977)
कौसानी (अल्मोड़ा) में जन्मे पंत जी को प्रकृति के सबसे कोमल तथा संवेदनशील चितेरे कवि के रूप में जाना जाता है; बाद के दौर में उनके चिंतन पर श्री अरविंद के दर्शन तथा अन्य दार्शनिक धाराओं का प्रभाव दिखाई देता है। आचार्य शुक्ल ने छायावादी कवियों में पंत को ही सर्वाधिक महत्व दिया था। प्रमुख रचनाएँ — उच्छ्वास (1920), पल्लव (1926, जिसे छायावाद का चरम-बिंदु प्रतिनिधि संग्रह माना जाता है), गुंजन तथा ग्रंथि। बाद में उन्होंने "लोकायतन" जैसी सामाजिक-चेतना प्रधान रचनाएँ भी लिखीं।
महादेवी वर्मा (1907–1987)
फर्रुखाबाद में जन्मीं महादेवी वर्मा को छायावादी कवियों में एकमात्र "शुद्ध रहस्यवादी" माना जाता है — स्वयं आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि छायावादी कहे जाने वाले कवियों में महादेवी जी ही रहस्यवाद के भीतर रही हैं। उनका दार्शनिक आधार सर्वात्मवाद है, तथा विरह-वेदना उनके काव्य का केंद्रीय स्वर है — इसी कारण उन्हें "आधुनिक युग की मीरा" भी कहा जाता है। प्रमुख काव्य-संग्रह — नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1935), सांध्यगीत (1936); इन्हीं चारों संग्रहों को मिलाकर बाद में "यामा" (1940) प्रकाशित हुआ, जिसके लिए उन्हें 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। महादेवी वर्मा एक अग्रणी गद्यकार (रेखाचित्र) भी थीं — विस्तार से आगे गद्य-सेक्शन में देखें।
वृहत्त्रयी एवं लघुत्रयी
परीक्षा-सामग्री तथा हिंदी साहित्य की प्रचलित आलोचनात्मक शब्दावली में छायावादी कवियों को कभी-कभी दो छोटे उप-समूहों में भी बाँटा जाता है — वृहत्त्रयी में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत तथा निराला — ये तीन कवि गिने जाते हैं, जबकि लघुत्रयी में महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा तथा भगवतीचरण वर्मा — अर्थात उपनाम से "वर्मा" कहलाने वाले तीन कवि — गिने जाते हैं। यह वर्गीकरण परीक्षा-दृष्टि से भी उपयोगी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः इन्हीं शब्दों में पूछे जाते हैं।
अन्य छायावादी एवं समकालीन कवि
चार स्तंभों के अतिरिक्त अनेक कवि इस दौर से गहरे जुड़े या इससे प्रभावित रहे, जिनके बिना छायावाद की तस्वीर अधूरी रहती है:
- रामकुमार वर्मा — छायावाद से प्रभावित होकर काव्य-रचना आरंभ करने वाले वर्मा जी आगे चलकर हिंदी के प्रतिष्ठित एकांकी-नाटककार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए। काव्य-कृतियाँ — चित्र-रेखा, निशीथ, आकाशगंगा।
- माखनलाल चतुर्वेदी (1889–1968) — होशंगाबाद के बाबई गाँव में जन्मे चतुर्वेदी जी को "एक भारतीय आत्मा" कहा जाता है; इन्होंने "प्रभा", "प्रताप" तथा "कर्मवीर" जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। सर्वाधिक प्रसिद्ध कविताएँ — "कैदी और कोकिला" तथा "पुष्प की अभिलाषा"; काव्य-कृति "हिम तरंगिणी" पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। कुछ विद्वान (विनयमोहन शर्मा, प्रभाकर माचवे) तो इन्हें ही छायावाद का प्रवर्तक मानते हैं, जैसा ऊपर देखा गया।
- बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' — ग्वालियर के भयाना गाँव में जन्मे नवीन जी को ओज व पौरुष का कवि कहा जाता है। प्रथम काव्य-संग्रह "कुंकुम"; क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के बलिदान पर लिखा खंडकाव्य "प्राणार्पण" तथा ब्रजभाषा में रचित खंडकाव्य "उर्मिला" इनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
- सियारामशरण गुप्त — झाँसी के चिरगाँव में जन्मे सियारामशरण गुप्त, मैथिलीशरण गुप्त के अनुज तथा मूलतः गांधीवादी कवि थे; इनकी प्रथम कविता 1910 में "इंदु" पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
- हरिवंशराय बच्चन — छायावाद से प्रभावित होकर काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले बच्चन जी ने आगे चलकर प्रेम, मस्ती व जीवन-दर्शन प्रधान "हालावाद" शैली को जन्म दिया — इनकी सर्वाधिक चर्चित कृति "मधुशाला" इसी प्रवृत्ति की प्रतिनिधि रचना है।
- रामधारी सिंह दिनकर — छायावाद के प्रभाव में काव्य-यात्रा आरंभ करने के बाद दिनकर जी की कविता में विद्रोह व ओज की मुखर आवाज़ उभरी; आगे चलकर वे राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा तथा प्रगतिवाद, दोनों से जुड़े — "कुरुक्षेत्र" जैसी रचनाएँ इनकी परवर्ती पहचान बनीं।
- अन्य उल्लेखनीय नाम — हरिकृष्ण 'प्रेमी', जानकी वल्लभ शास्त्री, भगवतीचरण वर्मा (जो आगे उपन्यासकार के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए), उदयशंकर भट्ट, नरेंद्र शर्मा तथा रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' भी छायावाद-प्रभावित कवियों में उल्लेखनीय हैं।
समानांतर काव्यधाराएँ
छायावाद के उभार के समांतर उस दौर में दो अन्य काव्यधाराएँ भी सक्रिय रहीं, जिन्हें प्रायः अलग से नहीं जोड़ा जाता:
- ब्रजभाषा काव्यधारा — छायावाद ने भले ही खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित किया, किंतु उसी दौर में ब्रजभाषा में भी काव्य-रचना जारी रही। इस धारा के प्रमुख कवियों में रामनाथ जोतिसी, राय कृष्णदास, जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी', दुलारे लाल भार्गव, वियोगी हरि, अनूप शर्मा, रामेश्वर 'करुण', किशोरीदास वाजपेयी तथा उमाशंकर वाजपेयी 'उमेश' उल्लेखनीय हैं — दिलचस्प यह है कि स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी इस ब्रजभाषा-परंपरा से जुड़े रहे।
- राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा — छायावाद के समानांतर राष्ट्रीय चेतना व स्वाधीनता-भावना प्रधान काव्यधारा भी चलती रही, जिसके प्रमुख कवि माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सियारामशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान (जिनकी "झाँसी की रानी" कविता विशेष प्रसिद्ध है), सोहनलाल द्विवेदी, श्यामनारायण पांडेय तथा आगे चलकर रामधारी सिंह दिनकर माने जाते हैं।
इसी दौर का गद्य साहित्य
कविता में जो रोमांटिक-आत्माभिव्यंजक मोड़ आ रहा था, ठीक उसी दौर (1918-1936) में हिंदी गद्य ने भी अपनी सबसे महत्वपूर्ण छलांग लगाई — इसी अवधि में प्रेमचंद का लगभग पूरा प्रमुख उपन्यास-काल आता है।
- प्रेमचंद (उपन्यास-सम्राट): सेवासदन (1918), प्रेमाश्रम (1922), रंगभूमि (1925), निर्मला (1925), कायाकल्प (1926), गबन (1931), कर्मभूमि (1932) तथा गोदान (1936, इनकी सर्वश्रेष्ठ रचना — कामायनी के साथ ही उसी वर्ष प्रकाशित)। कहानी-संग्रह "मानसरोवर" (8 खंड) तथा पूस की रात, कफ़न, ईदगाह, बड़े घर की बेटी जैसी कहानियाँ भी इसी दौर की देन हैं।
- जयशंकर प्रसाद (कवि होने के साथ सफल गद्यकार भी): नाटक — चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु; उपन्यास — कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण); कहानी-संग्रह — छाया, आंधी, आकाशदीप।
- वृंदावनलाल वर्मा (ऐतिहासिक उपन्यास): गढ़ कुंडार (1927), विराटा की पद्मिनी (1930)।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल (आलोचना): हिंदी साहित्य का इतिहास (1929) — हिंदी साहित्येतिहास-लेखन का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ, जिसका उल्लेख हमने काल-विभाजन एवं नामकरण वाले लेख में भी विस्तार से किया था।
छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ
- वैयक्तिकता एवं आत्माभिव्यक्ति — हिंदी काव्य में पहली बार व्यक्तिगत अनुभूति तथा निजी सुख-दुख को काव्य का केंद्रीय आधार बनाया गया।
- प्रकृति-प्रेम तथा मानवीकरण — प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सजीव, मानवीय संवेदना से युक्त सत्ता के रूप में चित्रित किया गया।
- रहस्यवाद एवं प्रतीकात्मकता — अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा तथा प्रतीक-पद्धति/चित्रभाषा शैली का व्यापक प्रयोग।
- प्रेम एवं सौंदर्य-चेतना — कोमल, भावप्रधान शैली में प्रेम, सौंदर्य तथा वेदना का सूक्ष्म चित्रण।
- गीतात्मकता एवं संगीतात्मक भाषा — भाषा में लय, नाद-सौंदर्य तथा संगीतमयता पर विशेष बल, जिसने छायावादी कविता को गीति-काव्य के निकट पहुँचाया।
- सांस्कृतिक जागरण — छायावादी कवियों में राष्ट्र-प्रेम की भावना है, किंतु यह संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं बल्कि विश्व-बंधुत्व की चेतना से युक्त है।
- खड़ी बोली की प्रतिष्ठा — छायावाद ने खड़ी बोली को आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में अत्यंत सुदृढ़ प्रतिष्ठा दी, हालाँकि उसी दौर में ब्रजभाषा में भी काव्य-रचना (ऊपर "समानांतर काव्यधाराएँ" देखें) जारी रही।
- गीति-प्रधानता के साथ महाकाव्य-रचना — मूलतः गीति-काव्य प्रधान होते हुए भी इस युग में कामायनी जैसे महाकाव्य की रचना भी हुई।
छायावाद और रहस्यवाद — संबंध व अंतर
आरंभिक वर्षों में (लगभग 1927 तक) "छायावाद" और "रहस्यवाद" — दोनों शब्दों का प्रयोग प्रायः पर्यायवाची रूप में होता था, दोनों को अंग्रेज़ी के "मिस्टिसिज्म" के समकक्ष माना जाता था। बाद में विद्वानों ने इनमें भेद किया — छायावाद एक व्यापक काव्य-प्रवृत्ति है जिसमें प्रकृति-चित्रण, प्रतीकात्मकता तथा वैयक्तिकता सभी शामिल हैं, जबकि रहस्यवाद उसके भीतर की एक विशिष्ट, अधिक आध्यात्मिक धारा है। इसी भेद के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने महादेवी वर्मा की काव्य-अनुभूति को छायावादी कवियों में सबसे स्पष्ट रूप से रहस्यवादी माना, जबकि प्रसाद, पंत तथा निराला मुख्यतः प्रतीक-पद्धति व चित्रभाषा-शैली की दृष्टि से छायावादी कहलाए।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचनात्मक दृष्टि
छायावाद के प्रति आचार्य शुक्ल का दृष्टिकोण सम्मिश्रित रहा। एक ओर उन्होंने माना कि छायावादी रहस्यवादी कविता, मैथिलीशरण गुप्त व मुकुटधर पांडेय द्वारा प्रवर्तित खड़ी बोली की स्वाभाविक परंपरा की सहज निरंतरता नहीं, बल्कि बंगाल और यूरोपीय साहित्य से प्रभावित प्रवृत्ति है — जो रवींद्रनाथ की रहस्यात्मक कविताओं तथा यूरोपीय प्रतीकवाद के अनुकरण पर आधारित रही। दूसरी ओर, उन्होंने छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पंत को सर्वाधिक महत्व दिया, तथा महादेवी वर्मा को अकेली ऐसी कवयित्री माना जिनकी अनुभूतियाँ वास्तव में रहस्यवाद के भीतर की हैं। इस प्रकार शुक्ल जी की आलोचना केवल खारिज करने वाली नहीं, बल्कि सूक्ष्म भेद करने वाली थी — जो हमने काल-विभाजन एवं नामकरण वाले लेख में सिद्ध-नाथ साहित्य को लेकर शुक्ल-द्विवेदी मतभेद में भी देखा था — वहाँ भी शुक्ल जी की कसौटी परंपरा के भीतर के तत्वों को वरीयता देने वाली रही।
उत्तर-छायावाद — संक्षिप्त परिचय
सन् 1936 के आसपास छायावाद की मूल प्रवृत्ति का प्रभाव कम होने लगा। इसके बाद छायावादी गीति-परंपरा से जुड़े या उससे प्रभावित कवियों की एक नई पीढ़ी सामने आई, जिसे प्रायः "उत्तर-छायावाद" कहा जाता है — निराला, पंत तथा महादेवी वर्मा जैसे मूल स्तंभ कवि स्वयं भी इस दौर में सक्रिय बने रहे, और उनके साथ जानकी वल्लभ शास्त्री जैसे नए कवि भी इस धारा से जुड़े। इसी दौर में हरिवंशराय बच्चन का हालावाद तथा रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' व नरेंद्र शर्मा जैसे गीतकारों का प्रगीत-काव्य भी फला-फूला। इसके बाद हिंदी काव्य की मुख्यधारा धीरे-धीरे प्रगतिवाद की ओर मुड़ने लगी, जिसकी विस्तृत चर्चा हमने अगले लेख में की है।
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)
- "छायावाद" शब्द का प्रथम प्रयोग व नामकरण — मुकुटधर पांडेय, 1920, "श्री शारदा" पत्रिका (जबलपुर), लेखमाला "हिंदी में छायावाद" (चार निबंध)।
- मुकुटधर पांडेय की कविता "कुररी के प्रति" — छायावाद की प्रथम कविता मानी जाती है।
- छायावाद की सर्वाधिक प्रचलित काल-सीमा — 1918 से 1936 ई.।
- छायावाद के चार स्तंभ — जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा।
- वृहत्त्रयी — प्रसाद, पंत, निराला; लघुत्रयी — महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, भगवतीचरण वर्मा।
- "कामायनी" (जयशंकर प्रसाद, 1936) — 15 सर्ग, "चिंता" से "आनंद" तक, पात्र: मनु, श्रद्धा, इड़ा; शैव दर्शन आधारित आनंदवाद।
- निराला को हिंदी में मुक्त छंद के प्रमुख प्रवर्तकों में गिना जाता है — उनकी "जूही की कली" (1916) इसकी आरंभिक बहुचर्चित रचना है।
- "पल्लव" (सुमित्रानंदन पंत, 1926) — छायावाद के चरम-बिंदु का प्रतिनिधि संग्रह माना जाता है।
- "यामा" (महादेवी वर्मा, 1940) — नीहार, रश्मि, नीरजा व सांध्यगीत का संकलन; 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार।
- माखनलाल चतुर्वेदी — "कैदी और कोकिला", "पुष्प की अभिलाषा"; "हिम तरंगिणी" पर साहित्य अकादमी पुरस्कार।
- रामकुमार वर्मा आगे चलकर एकांकी-नाटककार के रूप में प्रसिद्ध हुए।
- हरिवंशराय बच्चन का हालावाद — प्रतिनिधि रचना "मधुशाला"।
- आचार्य शुक्ल ने छायावादी कवियों में सर्वाधिक महत्व सुमित्रानंदन पंत को दिया, तथा महादेवी वर्मा को अकेली शुद्ध रहस्यवादी कवयित्री माना।
- डॉ. बच्चन सिंह "छायावाद" शब्द को अस्वीकार कर "स्वच्छंदतावाद युग" कहना उचित मानते हैं।
- प्रेमचंद का "गोदान" (1936) — प्रसाद की "कामायनी" के साथ उसी वर्ष प्रकाशित हुआ था।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की "हिंदी साहित्य का इतिहास" (1929) इसी दौर में प्रकाशित हुई।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
(उत्तर लेख के अंत में दिए गए हैं)
- "छायावाद" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया?
- (क) जयशंकर प्रसाद
- (ख) मुकुटधर पांडेय
- (ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी
- (घ) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- "हिंदी में छायावाद" नामक लेखमाला किस पत्रिका में प्रकाशित हुई?
- (क) सरस्वती
- (ख) हितकारिणी
- (ग) श्री शारदा
- (घ) इन्दु
- यह लेखमाला किस वर्ष प्रकाशित हुई?
- (क) 1918
- (ख) 1920
- (ग) 1926
- (घ) 1936
- निम्नलिखित में से कौन छायावाद के "चार स्तंभ" में शामिल नहीं है?
- (क) सुमित्रानंदन पंत
- (ख) महादेवी वर्मा
- (ग) मैथिलीशरण गुप्त
- (घ) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- "कामायनी" महाकाव्य के रचयिता कौन हैं?
- (क) सुमित्रानंदन पंत
- (ख) जयशंकर प्रसाद
- (ग) निराला
- (घ) महादेवी वर्मा
- "कामायनी" में कुल कितने सर्ग हैं?
- (क) 10
- (ख) 12
- (ग) 15
- (घ) 18
- "कामायनी" किस वर्ष प्रकाशित हुई?
- (क) 1926
- (ख) 1930
- (ग) 1933
- (घ) 1936
- "पल्लव" काव्य-संग्रह के रचयिता कौन हैं?
- (क) जयशंकर प्रसाद
- (ख) सुमित्रानंदन पंत
- (ग) निराला
- (घ) महादेवी वर्मा
- "पल्लव" किस वर्ष प्रकाशित हुआ, जिसे छायावाद का चरम-बिंदु माना जाता है?
- (क) 1918
- (ख) 1920
- (ग) 1926
- (घ) 1936
- "यामा" काव्य-कृति के लिए महादेवी वर्मा को कौन-सा सम्मान मिला?
- (क) साहित्य अकादमी
- (ख) ज्ञानपीठ पुरस्कार
- (ग) भारत भारती
- (घ) पद्म विभूषण
- "जूही की कली" (1916) के रचयिता कौन हैं, जिन्हें हिंदी में मुक्त छंद के प्रमुख प्रवर्तकों में गिना जाता है?
- (क) जयशंकर प्रसाद
- (ख) सुमित्रानंदन पंत
- (ग) निराला
- (घ) मुकुटधर पांडेय
- छायावाद को "रहस्यवाद" के अर्थ में किसने परिभाषित किया?
- (क) रामचंद्र शुक्ल
- (ख) मुकुटधर पांडेय
- (ग) डॉ. नगेंद्र
- (घ) नंददुलारे वाजपेयी
- छायावाद को "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह" किसने कहा?
- (क) सुशील कुमार
- (ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
- (ग) डॉ. नगेंद्र
- (घ) आचार्य शुक्ल
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने छायावादी कवियों में सर्वाधिक महत्व किसे दिया?
- (क) जयशंकर प्रसाद
- (ख) सुमित्रानंदन पंत
- (ग) निराला
- (घ) महादेवी वर्मा
- शुक्ल जी के अनुसार छायावादी कवियों में शुद्ध रहस्यवादी कौन थीं?
- (क) महादेवी वर्मा
- (ख) सुमित्रानंदन पंत
- (ग) निराला
- (घ) कोई नहीं
- सुमित्रानंदन पंत के काव्य-संग्रह "उच्छ्वास" (1920) से किस विद्वान ने छायावाद का आरंभ माना?
- (क) इलाचंद्र जोशी
- (ख) नंददुलारे वाजपेयी
- (ग) शिवनाथ
- (घ) आचार्य शुक्ल
- जयशंकर प्रसाद को छायावाद का जनक किन विद्वानों ने माना?
- (क) विनयमोहन शर्मा व प्रभाकर माचवे
- (ख) नंददुलारे वाजपेयी
- (ग) इलाचंद्र जोशी व शिवनाथ
- (घ) आचार्य शुक्ल
- डॉ. बच्चन सिंह ने "छायावाद" शब्द के स्थान पर किस नाम का प्रयोग करना उचित माना?
- (क) रहस्यवाद युग
- (ख) स्वच्छंदतावाद युग
- (ग) प्रतीकवाद युग
- (घ) भावुकतावाद युग
- छायावाद की "लघुत्रयी" में महादेवी वर्मा व रामकुमार वर्मा के अतिरिक्त कौन शामिल हैं?
- (क) सियारामशरण गुप्त
- (ख) भगवतीचरण वर्मा
- (ग) बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
- (घ) उदयशंकर भट्ट
- "कैदी और कोकिला" तथा "पुष्प की अभिलाषा" किस कवि की प्रसिद्ध कविताएँ हैं?
- (क) रामकुमार वर्मा
- (ख) माखनलाल चतुर्वेदी
- (ग) बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
- (घ) रामधारी सिंह दिनकर
- रामकुमार वर्मा आगे चलकर हिंदी की किस विधा में विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए?
- (क) उपन्यास
- (ख) कहानी
- (ग) एकांकी-नाटक
- (घ) निबंध
- बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' का प्रथम काव्य-संग्रह कौन-सा है?
- (क) कुंकुम
- (ख) प्राणार्पण
- (ग) उर्मिला
- (घ) हिम तरंगिणी
- सुभद्रा कुमारी चौहान, जिनकी "झाँसी की रानी" कविता विशेष प्रसिद्ध है, किस काव्यधारा से जुड़ी मानी जाती हैं?
- (क) उत्तर-छायावाद
- (ख) रहस्यवाद
- (ग) राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा
- (घ) ब्रजभाषा काव्यधारा
- हरिवंशराय बच्चन को मुख्यतः किस काव्य-प्रवृत्ति का कवि माना जाता है?
- (क) प्रगतिवाद
- (ख) हालावाद
- (ग) प्रयोगवाद
- (घ) रहस्यवाद
- "गोदान" (1936) के रचयिता कौन हैं, जो कामायनी के साथ उसी वर्ष प्रकाशित हुआ था?
- (क) जयशंकर प्रसाद
- (ख) प्रेमचंद
- (ग) वृंदावनलाल वर्मा
- (घ) रामचंद्र शुक्ल
- जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटकों में से एक कौन-सा है?
- (क) आषाढ़ का एक दिन
- (ख) स्कंदगुप्त
- (ग) अंधा युग
- (घ) आधे अधूरे
- "गढ़ कुंडार" (1927) — ऐतिहासिक उपन्यास के रचयिता कौन हैं?
- (क) प्रेमचंद
- (ख) वृंदावनलाल वर्मा
- (ग) जयशंकर प्रसाद
- (घ) किशोरीलाल गोस्वामी
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. छायावाद किसे कहते हैं?
छायावाद हिंदी काव्य की वह धारा है जो द्विवेदी युग के बाद, लगभग 1918 से 1936 ई. के बीच, वैयक्तिक अनुभूति, प्रकृति-प्रेम, प्रतीकात्मकता तथा रहस्यवादी भावुकता को केंद्र में रखकर विकसित हुई।
2. छायावाद शब्द किसने और कब गढ़ा?
मुकुटधर पांडेय ने 1920 में "श्री शारदा" पत्रिका में "हिंदी में छायावाद" शीर्षक लेखमाला के माध्यम से इस शब्द का पहली बार प्रयोग किया।
3. छायावाद के चार स्तंभ कौन हैं?
जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत तथा महादेवी वर्मा — इन चार कवियों को छायावाद के चार स्तंभ कहा जाता है।
4. छायावाद की समय-सीमा क्या मानी जाती है?
सर्वाधिक प्रचलित सीमा 1918 से 1936 ई. है, हालाँकि कुछ विद्वान इसे 1916 से तथा कुछ 1917 से मानते हैं।
5. "कामायनी" के बारे में क्या खास है?
जयशंकर प्रसाद रचित "कामायनी" (1936) 15 सर्गों का महाकाव्य है, जिसमें मनु, श्रद्धा तथा इड़ा के माध्यम से मानव-सभ्यता की यात्रा तथा शैव दर्शन आधारित आनंदवाद की स्थापना की गई है — इसे छायावादी काव्य-कला का सर्वोत्तम प्रतिनिधि उदाहरण माना जाता है।
6. छायावाद और रहस्यवाद में क्या फर्क है?
छायावाद एक व्यापक काव्य-प्रवृत्ति है जिसमें प्रकृति-चित्रण व प्रतीकात्मकता भी शामिल है, जबकि रहस्यवाद उसके भीतर की एक विशिष्ट, अधिक आध्यात्मिक धारा है — आचार्य शुक्ल के मतानुसार महादेवी वर्मा की अनुभूति इस अर्थ में सबसे स्पष्ट रूप से रहस्यवादी थी।
7. छायावाद के चार स्तंभों के अतिरिक्त और कौन-से कवि उल्लेखनीय हैं?
रामकुमार वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सियारामशरण गुप्त, हरिवंशराय बच्चन तथा रामधारी सिंह दिनकर जैसे कवि भी छायावाद से जुड़े या इससे गहरे प्रभावित रहे — इनमें से कई आगे चलकर अपनी अलग पहचान (नाटक, हालावाद, राष्ट्रीय काव्यधारा) बना बैठे।
8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल छायावाद के बारे में क्या राय रखते थे?
शुक्ल जी छायावादी रहस्यवादी कविता को खड़ी बोली की स्वाभाविक परंपरा की निरंतरता नहीं, बल्कि बंगाल-यूरोपीय साहित्य से प्रभावित प्रवृत्ति मानते थे, फिर भी उन्होंने पंत को छायावादी कवियों में सर्वाधिक महत्व दिया तथा महादेवी वर्मा को अकेली शुद्ध रहस्यवादी कवयित्री स्वीकार किया।
9. छायावाद के समानांतर और कौन-सी काव्यधाराएँ चलती रहीं?
छायावाद के साथ-साथ ब्रजभाषा काव्यधारा (रामनाथ जोतिसी, दुलारे लाल भार्गव आदि) तथा राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा (माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि) भी सक्रिय रहीं।
10. छायावाद के बाद कौन-सी काव्यधारा आई?
1936 के आसपास छायावाद का मूल उभार शांत होने लगा और "उत्तर-छायावाद" की एक नई पीढ़ी सामने आई; इसके बाद धीरे-धीरे हिंदी काव्य की मुख्यधारा प्रगतिवाद की ओर मुड़ी।
11. क्या इसी दौर में गद्य साहित्य में भी कोई बड़ा बदलाव आया?
हाँ — यही वह दौर है जब प्रेमचंद ने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं दीं (सेवासदन से गोदान तक), स्वयं जयशंकर प्रसाद ने भी नाटक-उपन्यास-कहानी में सफलता पाई, वृंदावनलाल वर्मा ने ऐतिहासिक उपन्यास-परंपरा को मज़बूत किया, तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल की "हिंदी साहित्य का इतिहास" (1929) प्रकाशित हुई।
उत्तर कुंजी (MCQ)
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- द्विवेदी युग
- प्रगतिवाद
- हिंदी साहित्य का काल-विभाजन एवं नामकरण
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संदर्भ
- हिंदी साहित्य का इतिहास — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
- हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास — डॉ. नागेंद्र
- छायावाद (आलोचना-ग्रंथ) — नामवर सिंह
- हिंदी में छायावाद (निबंधमाला, श्री शारदा, 1920) — मुकुटधर पांडेय
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