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भारतेंदु युग : काल-निर्धारण, नामकरण, प्रवृत्तियाँ, प्रमुख साहित्यकार और साहित्यिक योगदान

आधुनिक हिंदी साहित्य के विकासक्रम में भारतेंदु युग को नवजागरण का प्रारंभिक चरण माना जाता है — वह दौर जब साहित्य दरबारी और मनोरंजन-प्रधान प्रवृत्तियों से आगे बढ़कर समाज, राष्ट्र, शिक्षा और तत्कालीन जीवन की समस्याओं से गहराई से जुड़ा, और हिंदी गद्य की आधुनिक विधाओं — निबंध, नाटक, उपन्यास, पत्रकारिता — को नई गति मिली।

भारतेंदु युग का काल-निर्धारण

हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग की सामान्य समय-सीमा 1868 ई० से 1900 ई० तक मानी जाती है — यानी रीतिकाल की शृंगारिकता और आलंकारिकता के ठीक बाद का चरण, जो आगे चलकर द्विवेदी युग की ज़मीन तैयार करता है।

इस काल-सीमा को भारतेंदु के निजी जीवनकाल (1850–1885) के बराबर मत समझिए। उनके निधन के बाद भी उनके समकालीन साहित्यकारों की सक्रियता जारी रही, इसलिए यह सीमा साहित्यिक आधार पर तय की जाती है, जन्म-मृत्यु के आधार पर नहीं।

भारतेंदु युग का नामकरण

इस युग का नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर पड़ा, क्योंकि इस पूरे कालखंड की साहित्यिक चेतना और दिशा उन्हीं के नेतृत्व में बनी। उन्हें 1880 ई० में काशी के विद्वानों द्वारा 'भारतेंदु' (भारत का चंद्रमा) की उपाधि दी गई थी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र — युग-प्रवर्तक

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी में हुआ और निधन मात्र 34 वर्ष की आयु में, 6 जनवरी 1885 को। इतनी छोटी उम्र में उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और पत्रकारिता — लगभग हर विधा में जितना काम किया, वह आज भी हैरान करता है। उन्हें प्रायः आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक अथवा प्रमुख प्रवर्तक कहा जाता है, और आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में उनका योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि

यह युग ऐसे समय में विकसित हुआ जब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और आधुनिक शिक्षा, मुद्रण-व्यवस्था तथा पश्चिमी विचारों का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा था। सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में नई चेतना जगाई, और साहित्यकारों ने सामाजिक कुरीतियों, स्त्री-शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना को अपने लेखन का विषय बनाया। मुद्रण और पत्र-पत्रिकाओं के विस्तार ने साहित्य को राजदरबार से निकालकर पहली बार एक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाया।

भारतेंदु युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • राष्ट्रीय चेतना और देश-प्रेम — पराधीनता और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े विचार साहित्य में प्रमुख हुए।
  • सामाजिक सुधार — बाल-विवाह, अंधविश्वास और रूढ़ियों के विरोध में लेखन हुआ।
  • नारी-शिक्षा और स्त्री-जागरण — बालाबोधिनी जैसी पत्रिकाओं के ज़रिए स्त्री-शिक्षा के प्रश्न उठाए गए।
  • व्यंग्य और यथार्थ — सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर सीधा प्रहार, तत्कालीन जीवन की वास्तविक समस्याओं को स्थान।
  • गद्य का विकास — निबंध, नाटक, पत्रकारिता और उपन्यास जैसी विधाओं को नई गति मिली।
  • खड़ी बोली गद्य की प्रतिष्ठा — गद्य में खड़ी बोली का प्रयोग तेज़ी से बढ़ा, हालाँकि काव्य में ब्रजभाषा का प्रभाव बना रहा।

प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ

भारतेंदु स्वयं सक्रिय पत्रकार-संपादक थे — उनकी कवि वचन सुधा (1868) पहली पत्रिका थी, फिर हरिश्चंद्र मैगज़ीन (1873) आई जो बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका कहलाई, और बालाबोधिनी स्त्री-शिक्षा-जागरण को समर्पित थी। इनके समकालीन बालकृष्ण भट्ट की हिंदी प्रदीप (1877), प्रतापनारायण मिश्र की ब्राह्मण, और बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की आनंद कादंबिनी भी इसी दौर की उल्लेखनीय पत्रिकाएँ रहीं — इन्हीं के ज़रिए साहित्यिक बहस और सामाजिक विचार आम पाठकों तक पहुँचे।

भारतेंदु युग के प्रमुख साहित्यकार और उनकी रचनाएँ

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र — अंधेर नगरी, भारत-दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी जैसे नाटक; कवि, निबंधकार, पत्रकार, युग-प्रवर्तक।
  • प्रतापनारायण मिश्र — कलि-कौतुक रूपक, हठी हम्मीर जैसे नाटक; निबंधकार-व्यंग्यकार; ब्राह्मण पत्र के संपादक।
  • बालकृष्ण भट्ट — नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान जैसे नाटक; हिंदी प्रदीप के संपादक।
  • बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' — भारत सौभाग्य (नाटक); आनंद कादंबिनी से जुड़े कवि-निबंधकार।
  • ठाकुर जगमोहन सिंह और राधाचरण गोस्वामी — काव्य और नाट्य-पत्रकारिता में योगदान।
  • राधाकृष्ण दास — नाटककार, 'दुखिनी बाला' जैसी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं।
  • लाला श्रीनिवास दास — 'परीक्षा गुरु' (1882) के रचयिता, जिसे प्रथम मौलिक हिंदी उपन्यास माना जाता है — हालाँकि हिंदी के प्रथम उपन्यास को लेकर साहित्येतिहास में मतभेद रहा है, इसलिए इसे निर्विवाद तथ्य न मानें।
  • देवकीनंदन खत्री — चंद्रकांता (1888) और उसकी अगली कड़ी चंद्रकांता संतति के रचयिता।
  • अंबिकादत्त व्यास — नाटक और काव्य दोनों में सक्रिय रहे। 'गो संकट' नामक रचना का उल्लेख (अपुष्ट) मिलता है।  

देवकीनंदन खत्री और 'चंद्रकांता'

देवकीनंदन खत्री का उपन्यास 'चंद्रकांता' (1888) तिलिस्म, ऐयारी और रहस्य-रोमांच से भरपूर था, और इसने हिंदी के प्रारंभिक अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासों में अपनी जगह बनाई। बाद में उन्होंने चंद्रकांता संतति नाम से इसकी अगली कड़ी की रचना की। परीक्षा की दृष्टि से यह याद रखना पर्याप्त है — 'चंद्रकांता' के लेखक देवकीनंदन खत्री हैं।

भारतेंदु युग की साहित्यिक देन

भारतेंदु युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने हिंदी साहित्य को रीतिकालीन शृंगार-प्रधान और दरबारी प्रवृत्तियों से आगे बढ़ाकर आधुनिक सामाजिक, राष्ट्रीय और यथार्थपरक चेतना से जोड़ा तथा आधुनिक गद्य-विधाओं के विकास को गति दी। भारतेंदु हरिश्चंद्र की साहित्यिक और पत्रकारिता संबंधी सक्रियता ने उनके समकालीन साहित्यकारों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। आगे चलकर महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय में भाषा-परिष्कार, वैचारिक अनुशासन और गद्य के अधिक व्यवस्थित स्वरूप की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस दृष्टि से भारतेंदु युग को आधुनिक काल के उस महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा सकता है, जिसने द्विवेदी युग के लिए साहित्यिक और वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भारतेंदु युग को नवजागरण काल क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इस दौर में साहित्य दरबारी-मनोरंजन प्रधान प्रवृत्तियों से हटकर समाज-सुधार और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा।

2. भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म और निधन कब हुआ?
जन्म 9 सितंबर 1850, निधन 6 जनवरी 1885 — मात्र 34 वर्ष की आयु में।

3. इस युग में काव्य किस भाषा में लिखा जाता रहा?
काव्य में अब भी मुख्यतः ब्रजभाषा का ही प्रयोग होता रहा; खड़ी बोली मुख्यतः गद्य तक सीमित रही।

4. भारतेंदु युग की सबसे बड़ी देन क्या मानी जाती है?
गद्य की आधुनिक विधाओं (निबंध, नाटक, उपन्यास, पत्रकारिता) के विकास को गति देना और साहित्य को समाज से जोड़ना।

5. भारतेंदु युग के बाद कौन-सा युग आता है और उसका संबंध कैसे है?
द्विवेदी युग आता है, जो भारतेंदु युग की बनाई ज़मीन पर भाषा-परिष्कार को आगे बढ़ाता है।

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

उत्तर-कुंजी लेख के अंत में दी गई है।

1. भारतेंदु युग की सामान्य समय-सीमा है —
(अ) 1850–1868 (ब) 1868–1900 (स) 1900–1918 (द) 1750–1850

2. 'अंधेर नगरी' के रचयिता कौन हैं?
(अ) महावीर प्रसाद द्विवेदी (ब) भारतेंदु हरिश्चंद्र (स) जयशंकर प्रसाद (द) प्रतापनारायण मिश्र

3. 'चंद्रकांता' के लेखक कौन हैं?
(अ) देवकीनंदन खत्री (ब) प्रेमचंद (स) बालकृष्ण भट्ट (द) राधाचरण गोस्वामी

4. 'ब्राह्मण' पत्र के संपादक कौन थे?
(अ) बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' (ब) प्रतापनारायण मिश्र (स) ठाकुर जगमोहन सिंह (द) भारतेंदु हरिश्चंद्र

5. 'हिंदी प्रदीप' के संपादक कौन थे?
(अ) बालकृष्ण भट्ट (ब) प्रतापनारायण मिश्र (स) भारतेंदु हरिश्चंद्र (द) राधाचरण गोस्वामी

6. 'परीक्षा गुरु' उपन्यास के रचयिता कौन हैं?
(अ) देवकीनंदन खत्री (ब) लाला श्रीनिवास दास (स) राधाकृष्ण दास (द) अंबिकादत्त व्यास

7. भारतेंदु युग के बाद कौन-सा युग आता है?
(अ) रीतिकाल (ब) आदिकाल (स) द्विवेदी युग (द) छायावाद

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उत्तर-कुंजी (MCQ Answers):
1. (ब) 1868–1900  |  2. (ब) भारतेंदु हरिश्चंद्र  |  3. (अ) देवकीनंदन खत्री  |  4. (ब) प्रतापनारायण मिश्र  |  5. (अ) बालकृष्ण भट्ट  |  6. (ब) लाला श्रीनिवास दास  |  7. (स) द्विवेदी युग

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