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वर्ण किसे कहते हैं? परिभाषा, भेद, ळ सहित 53 वर्ण, उदाहरण सहित सम्पूर्ण अध्ययन

किसी भी भाषा को समझने की शुरुआत उसकी सबसे छोटी इकाई से होती है। जिस प्रकार ईंट के बिना भवन नहीं बनता, उसी प्रकार वर्ण के बिना शब्द और वाक्य की रचना संभव नहीं। वर्ण ही वह मूल इकाई है जिससे मिलकर शब्द बनते हैं, शब्दों से पद, पदों से वाक्य और वाक्यों से पूरी भाषा

यही कारण है कि हिंदी व्याकरण का अध्ययन सदैव वर्ण-विचार से ही आरंभ होता है। विद्यालयी शिक्षा से लेकर CTET, UPTET, TGT, PGT, LT Grade, UGC NET, SSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक इस विषय से नियमित प्रश्न पूछे जाते हैं — विशेषकर वर्णों की संख्या, उनके भेद और उच्चारण-स्थान से संबंधित।

इस लेख में आप वर्ण की परिभाषा, ध्वनि एवं अक्षर से इसका अंतर, वर्ण के प्रकार एवं समस्त भेद, वर्णों की नवीनतम संख्या (ळ के समावेश के बाद 53), उच्चारण-स्थान एवं प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण, वर्ण-विच्छेद तथा परीक्षोपयोगी तथ्यों का सम्पूर्ण एवं प्रामाणिक अध्ययन करेंगे।

वर्ण किसे कहते हैं?

वर्ण भाषा की वह सबसे छोटी मूल ध्वनि है, जिसके और खंड या टुकड़े नहीं किए जा सकते। दूसरे शब्दों में — भाषा की लघुतम इकाई को वर्ण कहते हैं।

जैसे — कमल शब्द को तोड़ने पर हमें मिलता है : क् + अ + म् + अ + ल् + अ। अब इन ध्वनियों को और नहीं तोड़ा जा सकता। अतः क्, अ, म्, ल् — ये सभी वर्ण हैं।

ध्यान दें: 'वर्ण' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है — (1) मूल ध्वनि के अर्थ में, तथा (2) उस ध्वनि को लिखने के लिए प्रयुक्त लिपि-चिह्न के अर्थ में। व्याकरण में सामान्यतः दोनों को ही वर्ण कहा जाता है।

ध्वनि और वर्ण में अंतर

अधिकांश विद्यार्थी ध्वनि और वर्ण को एक ही मान लेते हैं, जबकि इनमें सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है। ध्वनि वह है जो मुख से निकलती है और कानों से सुनाई देती है — वह वायु में विलीन हो जाती है। उस ध्वनि को स्थायी रूप देने के लिए जो चिह्न कागज़ पर बनाया जाता है, वही वर्ण है।

ध्वनिवर्ण
ध्वनि: मुख से उच्चरित होने वाली आवाज़वर्ण: ध्वनि का लिखित चिह्न
ध्वनि: सुनी जाती हैवर्ण: देखा एवं लिखा जाता है
ध्वनि: बोलते समय निकलने वाली 'क्' की आवाज़वर्ण: लिखा हुआ 'क'

सरल शब्दों में — जो सुनाई दे वह ध्वनि, जो दिखाई दे वह वर्ण।

वर्ण और अक्षर में अंतर

यह परीक्षाओं का एक अत्यंत प्रिय प्रश्न है, और सबसे अधिक भ्रम भी यहीं होता है। बोलचाल में हम दोनों को एक ही मान लेते हैं, किंतु व्याकरण की दृष्टि से ये भिन्न हैं। इसे धीरे-धीरे समझते हैं।

अक्षर क्या है?

बोलते समय हमारी वाणी एक सतत धारा नहीं होती — वह छोटे-छोटे झटकों में निकलती है। एक बार में, एक ही प्रयास में जितनी ध्वनि मुख से निकलती है, वही एक अक्षर है। अंग्रेज़ी में इसे 'सिलेबल' (Syllable) कहते हैं।

इसे परखने का सबसे आसान तरीका है — ताली बजाकर बोलना। 'कमल' बोलिए और साथ-साथ ताली बजाइए : क — म — ल। तीन ताली बजेंगी, अर्थात् तीन अक्षर। इसी प्रकार 'विद्यालय' में : वि — द्या — लय — तीन अक्षर।

फिर वर्ण कैसे अलग हुआ?

अब उसी 'कमल' शब्द को व्याकरण की दृष्टि से खोलिए :

क + म + ल → क् + अ + म् + अ + ल् + अ

अर्थात् जिसे हम बोलते समय एक अक्षर 'क' समझते हैं, वह वास्तव में दो वर्णों से मिलकर बना है — व्यंजन 'क्' और स्वर 'अ'। इसलिए 'कमल' में अक्षर 3 हैं, किंतु वर्ण 6

इसका मूल कारण यह है कि व्यंजन अकेला नहीं बोला जा सकता — उसे बोलने के लिए किसी स्वर का सहारा चाहिए ही। इसीलिए हर अक्षर में कम-से-कम एक स्वर अवश्य होता है, जबकि वर्ण अकेला भी हो सकता है।

वर्णअक्षर
वर्ण: भाषा की लघुतम मूल ध्वनिअक्षर: एक बार में उच्चरित होने वाली ध्वनि-इकाई
वर्ण: अकेली ध्वनिअक्षर: केवल स्वर, या स्वर + व्यंजन का मेल
वर्ण: व्यंजन स्वतंत्र रूप से नहीं बोला जा सकताअक्षर: सदैव स्वतंत्र रूप से बोला जाता है
वर्ण: 'कमल' में 6 — क् + अ + म् + अ + ल् + अअक्षर: 'कमल' में 3 — क + म + ल
एक पंक्ति में: वर्ण भाषा की व्याकरणिक इकाई है, अक्षर उसकी उच्चारण संबंधी इकाई। वर्ण लिखने-विश्लेषण करने की दृष्टि से गिना जाता है, अक्षर बोलने की दृष्टि से।

वर्णमाला किसे कहते हैं?

किसी भाषा के समस्त वर्णों के व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी वर्णमाला देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जो अत्यंत वैज्ञानिक लिपि मानी जाती है — क्योंकि इसमें जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है।

संक्षेप में उत्तर: मानक हिंदी वर्णमाला में इस समय कुल 53 वर्ण हैं (अगस्त 2024 में 'ळ' जुड़ने के बाद)। यह संख्या गिनने के आधार पर 44 और 45 भी होती है — इसका पूरा गणित आगे विस्तार से दिया गया है।

वर्ण के भेद

उच्चारण की स्वतंत्रता के आधार पर वर्ण के मुख्यतः दो भेद होते हैं —

  1. स्वर (Vowels)
  2. व्यंजन (Consonants)

इनके अतिरिक्त अयोगवाह नामक एक तीसरा वर्ग भी है, जो न पूर्णतः स्वर है और न पूर्णतः व्यंजन।

स्वर किसे कहते हैं?

जिन वर्णों के उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं लेनी पड़ती तथा जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। इनके उच्चारण में वायु मुख से बिना किसी रुकावट के निकलती है।

मात्रा (उच्चारण-काल) के आधार पर स्वर के भेद

भेदपरिचय एवं उदाहरण
ह्रस्व स्वरपरिचय: उच्चारण में सबसे कम समय (1 मात्रा) — अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ स्वरपरिचय: ह्रस्व से दुगुना समय (2 मात्रा) — आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
प्लुत स्वरपरिचय: दीर्घ से भी अधिक समय (3 मात्रा) — ओ३म्, राऽऽम

उत्पत्ति के आधार पर स्वर के भेद

  • मूल स्वर — जो किसी अन्य स्वर से नहीं बने : अ, इ, उ, ऋ
  • संधि/संयुक्त स्वर — जो दो स्वरों के मेल से बने (विस्तार से देखें : संधि) : अ + इ = ए, अ + ए = ऐ, अ + उ = ओ, अ + ओ = औ

अनुनासिकता के आधार पर स्वर के भेद

  • निरनुनासिक स्वर — जिनके उच्चारण में वायु केवल मुख से निकले। जैसे — कल, हाथ
  • अनुनासिक स्वर — जिनके उच्चारण में वायु मुख के साथ नाक से भी निकले। इन पर चंद्रबिंदु (ँ) लगता है। जैसे — आँख, चाँद, गाँव

व्यंजन किसे कहते हैं?

जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से होता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। व्यंजन स्वतंत्र रूप से नहीं बोले जा सकते — जैसे 'क्' को बोलने के लिए उसमें 'अ' मिलाना पड़ता है (क् + अ = क)।

हिंदी में मूल व्यंजनों की संख्या 33 है, जिन्हें तीन वर्गों में बाँटा गया है। इनके अतिरिक्त द्विगुण, संयुक्त तथा विशिष्ट व्यंजन भी हैं।

1. स्पर्श व्यंजन (25)

जिनके उच्चारण में जीभ मुख के किसी भाग का स्पर्श करती है। ये पाँच वर्गों में विभाजित हैं, प्रत्येक वर्ग में पाँच व्यंजन।

वर्गव्यंजन एवं उच्चारण स्थान
क वर्गव्यंजन: क, ख, ग, घ, ङ — कंठ (कंठ्य)
च वर्गव्यंजन: च, छ, ज, झ, ञ — तालु (तालव्य)
ट वर्गव्यंजन: ट, ठ, ड, ढ, ण — मूर्धा (मूर्धन्य)
त वर्गव्यंजन: त, थ, द, ध, न — दाँत (दंत्य)
प वर्गव्यंजन: प, फ, ब, भ, म — ओष्ठ (ओष्ठ्य)

2. अंतःस्थ व्यंजन (4)

जो स्वर और व्यंजन के 'बीच' की स्थिति में हैं — इनके उच्चारण में मुख न पूरी तरह खुलता है, न बंद होता है।

3. ऊष्म व्यंजन (4)

जिनके उच्चारण में मुख से गर्म वायु (ऊष्मा) निकलती-सी प्रतीत होती है।

4. द्विगुण/उत्क्षिप्त व्यंजन (2)

जिनके उच्चारण में जीभ मूर्धा से टकराकर झटके से हटती है। ये 33 मूल व्यंजनों से अलग गिने जाते हैं।

ड़ढ़ — जैसे : पेड़, पढ़ना

5. संयुक्त व्यंजन (4)

दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से बने व्यंजन।

संयुक्त व्यंजननिर्माण एवं उदाहरण
क्षनिर्माण: क् + ष — क्षमा, रक्षा
त्रनिर्माण: त् + र — पत्र, नेत्र
ज्ञनिर्माण: ज् + ञ — ज्ञान, विज्ञान
श्रनिर्माण: श् + र — श्रम, श्रेष्ठ

6. विशिष्ट व्यंजन (1) — ळ

'ळ' हिंदी वर्णमाला में सबसे नया सम्मिलित वर्ण है। अगस्त 2024 में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने इसे विशिष्ट व्यंजन के रूप में आधिकारिक मान्यता दी।

  • प्रकृति: यह एक मूर्धन्य ध्वनि है — 'ल' और 'ड़' के बीच की।
  • उच्चारण: सामान्य 'ल' दंत्य है, किंतु 'ळ' बोलते समय जीभ को थोड़ा पीछे मूर्धा की ओर मोड़ना पड़ता है।
  • प्रयोग: यह ध्वनि हरियाणवी, मारवाड़ी, गढ़वाली, कुमाऊँनी जैसी हिंदी की बोलियों में सदैव से रही है। मराठी में इसका व्यापक प्रयोग होता है, तथा तमिळ, मलयाळम, तेलुगु, कन्नड़ एवं ओड़िया में भी यह ध्वनि प्रचलित है।
  • महत्व: पहले ऐसे शब्दों को विवशता में 'ल' से ही लिखा जाता था; अब उन्हें शुद्ध रूप में लिखना संभव हो सका है।

अयोगवाह किसे कहते हैं?

अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) को अयोगवाह कहा जाता है। 'अयोगवाह' का अर्थ है — जो योग न होते हुए भी अर्थ वहन करे।

ये न पूर्णतः स्वर हैं (क्योंकि इनका उच्चारण स्वतंत्र नहीं), और न पूर्णतः व्यंजन (क्योंकि ये स्वर के बाद ही आते हैं) — इसीलिए इन्हें अलग वर्ग में रखा गया है।

  • अनुस्वार (ं) — जैसे : अंक, संगम, गंगा
  • विसर्ग (ः) — जैसे : अतः, प्रातः, दुःख
यहाँ तक आपने सीखा
  • वर्ण — भाषा की लघुतम इकाई
  • ध्वनि और वर्ण का अंतर
  • वर्ण और अक्षर का अंतर
  • वर्णमाला की अवधारणा
  • स्वर, व्यंजन और अयोगवाह — तीनों वर्ग

अब आगे — वर्णों की कुल संख्या का गणित, उच्चारण-स्थान, प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण, आगत वर्ण तथा वर्ण-विच्छेद।

वर्णों की संख्या — 44, 45 और 53 का पूरा गणित

यही वह बिंदु है जहाँ सर्वाधिक भ्रम होता है। कहीं 44 लिखा मिलता है, कहीं 45, कहीं 52 और अब 53। सच यह है कि ये सभी उत्तर अपनी-अपनी जगह सही हैं — अंतर केवल गिनने के आधार का है, और एक नवीनतम संशोधन का।

महत्वपूर्ण अद्यतन: अगस्त 2024 में भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने हिंदी वर्णमाला में संशोधन करते हुए 'ळ' को विशिष्ट व्यंजन के रूप में सम्मिलित किया। इस प्रकार मानक वर्णमाला में कुल वर्णों की संख्या 52 से बढ़कर 53 हो गई है।

1. मानक/लेखन के आधार पर — 53

लिखित रूप में प्रयुक्त सभी वर्णों को गिनने पर :

वर्गसंख्या एवं वर्ण
स्वरवर्ण: 11 — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
अयोगवाहवर्ण: 2 — अं, अः
मूल व्यंजनवर्ण: 33 — क् से ह् तक
द्विगुण व्यंजनवर्ण: 2 — ड़, ढ़
संयुक्त व्यंजनवर्ण: 4 — क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
विशिष्ट व्यंजनवर्ण: 1 — ळ
कुलवर्ण: 53 — 11 स्वर + 2 अयोगवाह + 40 व्यंजन

2. मूल वर्ण — 44

केवल मूलभूत वर्णों को गिनने पर : 11 स्वर + 33 व्यंजन = 44
(इसमें अं, अः, ड़, ढ़, क्ष, त्र, ज्ञ, श्र तथा ळ सम्मिलित नहीं हैं।)

3. उच्चारण के आधार पर — 45

जो वर्ण वास्तव में बोले जाते हैं, उन्हें गिनने पर : 10 स्वर + 35 व्यंजन = 45
(यहाँ 'ऋ' को नहीं गिना जाता, क्योंकि आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण 'रि' जैसा होता है। व्यंजनों में 33 मूल + 2 द्विगुण = 35।)

गिनने का आधारकुल वर्ण
मानक/लेखन के आधार परकुल: 53 — 11 स्वर + 2 अयोगवाह + 40 व्यंजन (ळ सहित)
मूल वर्णकुल: 44 — 11 स्वर + 33 व्यंजन
उच्चारण के आधार परकुल: 45 — 10 स्वर + 35 व्यंजन
परीक्षा की दृष्टि से: यदि प्रश्न में आधार न बताया गया हो, तो वर्तमान मानक उत्तर 53 है। किंतु ध्यान रहे कि 'ळ' का समावेश अगस्त 2024 का है — अनेक पुरानी पुस्तकों तथा पुराने प्रश्न-पत्रों में यह संख्या अब भी 52 मिलेगी। यदि प्रश्न में स्पष्ट रूप से 'उच्चारण के आधार पर' लिखा हो, तो उत्तर 45 होगा।

उच्चारण-स्थान के आधार पर वर्गीकरण

मुख के जिस भाग से किसी वर्ण का उच्चारण होता है, उसे उसका उच्चारण स्थान कहते हैं। यह प्रतियोगी परीक्षाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।

नाम (उच्चारण स्थान)वर्ण
कंठ्य (कंठ)वर्ण: अ, आ, क वर्ग, ह, विसर्ग
तालव्य (तालु)वर्ण: इ, ई, च वर्ग, य, श
मूर्धन्य (मूर्धा)वर्ण: ऋ, ट वर्ग, र, ष, ळ
दंत्य (दाँत)वर्ण: त वर्ग, ल, स
ओष्ठ्य (ओष्ठ)वर्ण: उ, ऊ, प वर्ग
नासिक्य (नासिका)वर्ण: ङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार
कंठ्य-तालव्यवर्ण: ए, ऐ
कंठ्य-ओष्ठ्यवर्ण: ओ, औ
दंत्योष्ठ्यवर्ण:

प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण

उच्चारण करते समय श्वास एवं स्वर-तंत्रियों के प्रयत्न के आधार पर भी व्यंजनों का वर्गीकरण किया जाता है।

श्वास के आधार पर

भेदपरिचय एवं वर्ण
अल्पप्राणपरिचय: उच्चारण में कम श्वास लगे — प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा एवं पाँचवाँ वर्ण; य, र, ल, व
महाप्राणपरिचय: उच्चारण में अधिक श्वास लगे — प्रत्येक वर्ग का दूसरा एवं चौथा वर्ण; श, ष, स, ह
आसान पहचान: जिन व्यंजनों में 'ह' जैसी हवा की ध्वनि सुनाई दे (ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ) — वे महाप्राण हैं। शेष अल्पप्राण।

स्वर-तंत्रियों के कंपन के आधार पर

भेदपरिचय एवं वर्ण
अघोषपरिचय: स्वर-तंत्रियों में कंपन न हो — प्रत्येक वर्ग का पहला एवं दूसरा वर्ण; श, ष, स
घोषपरिचय: स्वर-तंत्रियों में कंपन हो — प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा एवं पाँचवाँ वर्ण; सभी स्वर; य, र, ल, व, ह

आगत या गृहीत वर्ण

अन्य भाषाओं (मुख्यतः अरबी, फ़ारसी एवं अंग्रेज़ी) से हिंदी में आए वे वर्ण, जो मूल देवनागरी वर्णमाला का भाग नहीं थे, आगत या गृहीत वर्ण कहलाते हैं। इन्हें नुक़्ता (़) लगाकर लिखा जाता है। शब्दों के इसी प्रकार के वर्गीकरण के लिए तत्सम एवं तद्भव शब्द वाला लेख भी पढ़ें।

प्रकारवर्ण एवं उदाहरण
गृहीत व्यंजनवर्ण: क़, ख़, ग़, ज़, फ़ — क़लम, ख़बर, ग़ज़ल, ज़मीन, फ़ोन
गृहीत स्वरवर्ण: ऑ — डॉक्टर, कॉलेज, ऑफ़िस

वर्ण-विच्छेद कैसे करें?

किसी शब्द को उसके मूल वर्णों में अलग-अलग करके लिखना वर्ण-विच्छेद कहलाता है। यह परीक्षा में अत्यंत सामान्य प्रश्न है।

नियम: प्रत्येक व्यंजन को हलंत (्) के साथ लिखें और उसके साथ लगे स्वर को अलग करके लिखें।

शब्दवर्ण-विच्छेद
कमलविच्छेद: क् + अ + म् + अ + ल् + अ
भारतविच्छेद: भ् + आ + र् + अ + त् + अ
विद्याविच्छेद: व् + इ + द् + य् + आ
पुस्तकविच्छेद: प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ
ज्ञानविच्छेद: ज् + ञ् + आ + न् + अ
क्षमाविच्छेद: क् + ष् + अ + म् + आ

वर्ण से जुड़े सामान्य भ्रम

  • वर्ण और अक्षर एक ही नहीं होते — 'कमल' में 6 वर्ण हैं, किंतु 3 अक्षर।
  • वर्णों की कोई एक निश्चित संख्या नहीं — यह गिनने के आधार पर बदलती है (44/45/53)।
  • अं और अः न स्वर हैं, न व्यंजन — ये अयोगवाह हैं।
  • ड़ और ढ़ मूल व्यंजनों में नहीं गिने जाते — ये द्विगुण व्यंजन हैं।
  • क्ष, त्र, ज्ञ, श्र स्वतंत्र वर्ण नहीं, बल्कि संयुक्त व्यंजन हैं।
  • अनुनासिक (ँ) और अनुस्वार (ं) अलग-अलग हैं — 'आँख' अनुनासिक है, 'अंक' अनुस्वार।
  • 'ळ' और 'ल' एक नहीं हैं — 'ल' दंत्य है, जबकि 'ळ' मूर्धन्य विशिष्ट व्यंजन है।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

  • भाषा की लघुतम इकाई — वर्ण
  • मानक हिंदी वर्णमाला में कुल वर्ण — 53 (अगस्त 2024 के संशोधन के बाद)
  • उच्चारण के आधार पर वर्ण — 45
  • मूल वर्ण — 44
  • सबसे नया सम्मिलित वर्ण — (विशिष्ट व्यंजन)
  • मूल स्वर — 4 (अ, इ, उ, ऋ)
  • स्पर्श व्यंजन — 25
  • अंतःस्थ व्यंजन — 4 (य, र, ल, व)
  • ऊष्म व्यंजन — 4 (श, ष, स, ह)
  • एकमात्र दंत्योष्ठ्य वर्ण —
  • अयोगवाह — 2 (अं, अः)
  • प्लुत स्वर का प्रसिद्ध उदाहरण — ओ३म्

निष्कर्ष

वर्ण हिंदी व्याकरण की आधारशिला है। वर्ण से अक्षर, अक्षर से शब्द, शब्द से पद और पद से वाक्य की रचना होती है — इसीलिए व्याकरण के किसी भी अन्य विषय को समझने से पहले वर्ण-विचार का स्पष्ट ज्ञान आवश्यक है। स्वर, व्यंजन एवं अयोगवाह के भेद, उच्चारण-स्थान, प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण तथा वर्णों की संख्या का गणित — ये सभी बिंदु प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। 'ळ' के समावेश के साथ यह विषय और भी अद्यतन हो गया है, अतः नवीनतम जानकारी के साथ इसका अभ्यास करना ही सफलता की कुंजी है।

वर्ण से संबंधित प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

वर्ण किसे कहते हैं?

भाषा की सबसे छोटी मूल ध्वनि, जिसके और खंड नहीं किए जा सकते, उसे वर्ण कहते हैं। जैसे — अ, क्, म्, ल्।

हिंदी वर्णमाला में कुल कितने वर्ण होते हैं?

मानक हिंदी वर्णमाला में अब कुल 53 वर्ण होते हैं (11 स्वर + 2 अयोगवाह + 33 मूल व्यंजन + 2 द्विगुण + 4 संयुक्त + 1 विशिष्ट व्यंजन 'ळ')। अगस्त 2024 से पूर्व यह संख्या 52 थी। उच्चारण के आधार पर यह संख्या 45 तथा केवल मूल वर्णों की दृष्टि से 44 मानी जाती है।

ळ वर्ण कब और क्यों जोड़ा गया?

अगस्त 2024 में भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने 'ळ' को विशिष्ट व्यंजन के रूप में हिंदी वर्णमाला में सम्मिलित किया। यह ध्वनि हिंदी की अनेक बोलियों तथा मराठी सहित कई भारतीय भाषाओं में पहले से प्रचलित थी, किंतु उसे लिखने के लिए कोई अलग वर्ण उपलब्ध नहीं था।

वर्ण के कितने भेद होते हैं?

वर्ण के मुख्यतः दो भेद होते हैं — स्वर और व्यंजन। इनके अतिरिक्त अयोगवाह (अं, अः) को एक अलग वर्ग माना जाता है।

वर्ण और अक्षर में क्या अंतर है?

वर्ण भाषा की लघुतम मूल ध्वनि है, जबकि अक्षर एक बार में उच्चरित होने वाली ध्वनि-इकाई है। जैसे — 'कमल' में वर्ण 6 हैं, किंतु अक्षर केवल 3।

अयोगवाह किसे कहते हैं?

अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) को अयोगवाह कहते हैं, क्योंकि ये न पूर्णतः स्वर हैं और न पूर्णतः व्यंजन।

ड़ और ढ़ कौन-से व्यंजन हैं?

ड़ और ढ़ द्विगुण या उत्क्षिप्त व्यंजन कहलाते हैं। इनके उच्चारण में जीभ मूर्धा से टकराकर झटके से हटती है। ये 33 मूल व्यंजनों में सम्मिलित नहीं हैं।

क्या ऋ स्वर है?

परंपरागत रूप से 'ऋ' को स्वर माना जाता है, किंतु आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण 'रि' जैसा होता है। इसीलिए उच्चारण के आधार पर वर्ण गिनते समय इसे नहीं गिना जाता।


संक्षेप में

  • वर्ण भाषा की लघुतम इकाई है, जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते।
  • वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।
  • वर्ण के दो मुख्य भेद हैं — स्वर (11) और व्यंजन (33 मूल)।
  • अं तथा अः अयोगवाह कहलाते हैं।
  • अगस्त 2024 में 'ळ' के समावेश के बाद मानक वर्णमाला में कुल 53 वर्ण हैं।
  • उच्चारण के आधार पर 45 तथा मूल वर्ण 44 होते हैं।
  • वर्ण-विच्छेद में प्रत्येक व्यंजन हलंत सहित तथा स्वर अलग लिखा जाता है।

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देवनागरी लिपि वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, मराठी, मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ (जैसे नेपाली) भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह लिपि भारत की अनेक अन्य लिपियों के सन्निकट भी है। इस आलेख में हम देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसके नामकरण, विशेषताओं, वैज्ञानिकता, गुण-दोष तथा अन्य लिपियों से इसकी तुलना — इन सभी पक्षों को विस्तार एवं प्रामाणिकता के साथ जानेंगे। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति संसार की सभी भाषाओं को लिखने के लिए किसी न किसी लिपि का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार देवनागरी भी एक लिपि है जिसका प्रयोग मूलतः हिंदी भाषा को लिखने के लिए किया जाता है। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। प्राचीन समय में आर्यों द्वारा प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त समस्त भारतीय लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। ...

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रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण (Ramayan) के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'। रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को यदि "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" जाय तो अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है। माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल...