सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भाषा किसे कहते हैं? – परिभाषा, अर्थ, प्रकार, विशेषताएँ, उत्पत्ति एवं विकास

भाषा मानव सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। मनुष्य अपने विचारों, भावों, अनुभवों और ज्ञान का आदान-प्रदान भाषा के माध्यम से ही करता है। भाषा केवल संप्रेषण (Communication) का साधन नहीं है, बल्कि संस्कृति, साहित्य, इतिहास और ज्ञान-विज्ञान की संवाहक भी है। इसी कारण भाषा को मानव समाज की आधारशिला माना जाता है।

यदि आपके मन में भी यह प्रश्न उठता है कि भाषा किसे कहते हैं, भाषा की परिभाषा क्या है, भाषा के कितने प्रकार होते हैं, भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई तथा भाषा का विकास किस प्रकार हुआ, तो इस लेख में इन सभी प्रश्नों के उत्तर सरल, प्रमाणिक तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से उपयोगी रूप में दिए गए हैं।

भाषा किसे कहते हैं? – परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ, उत्पत्ति | हिंदीजन

भाषा किसे कहते हैं?

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों, इच्छाओं तथा अनुभवों का आदान-प्रदान करता है।

दूसरे शब्दों में, मनुष्य अपने मन की बात दूसरों तक पहुँचाने तथा दूसरों के विचारों को समझने के लिए जिस माध्यम का प्रयोग करता है, उसे भाषा कहते हैं।

भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति समाज, परिवार, विद्यालय तथा संपूर्ण विश्व से जुड़ता है। यदि भाषा न होती तो ज्ञान, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और सभ्यता का विकास संभव नहीं हो पाता।

सरल शब्दों में: विचारों एवं भावों के आदान-प्रदान का सबसे प्रभावी माध्यम भाषा है।


भाषा का शाब्दिक अर्थ

'भाषा' शब्द संस्कृत की 'भाष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'बोलना' अथवा 'कहना'

इसी धातु से भाषण, भाषित, भाष्य, संभाषण आदि शब्द बने हैं।

संस्कृत में कहा गया है—

"भाष्यते इति भाषा।"

अर्थात् जो बोली या व्यक्त की जाती है, वही भाषा है।


भाषा की परिभाषा

विभिन्न भाषाविदों ने भाषा की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। यद्यपि शब्दों में कुछ अंतर है, परंतु सभी का मूल भाव एक ही है कि भाषा विचारों और भावों के आदान-प्रदान का माध्यम है।

1. डॉ. भोलानाथ तिवारी

"भाषा मनुष्य के उच्चारण-अवयवों से प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न सार्थक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से किसी समाज के लोग अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।"

2. बाबूराम सक्सेना

"जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उन्हें समष्टि रूप में भाषा कहते हैं।"

3. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा

"भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का सर्वाधिक प्रभावशाली साधन है।"

इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि भाषा मानव समाज में संप्रेषण का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम है।


भाषा की प्रमुख विशेषताएँ

भाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • भाषा विचारों एवं भावों के आदान-प्रदान का माध्यम है।
  • भाषा एक सामाजिक व्यवस्था है।
  • भाषा अर्जित (सीखी हुई) संपत्ति है, जन्मजात नहीं।
  • भाषा परिवर्तनशील एवं विकासशील होती है।
  • भाषा परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
  • भाषा संस्कृति और सभ्यता की संवाहक है।
  • भाषा ध्वनि-आधारित होती है।
  • भाषा नियमबद्ध होती है।
  • भाषा निरंतर विकसित होती रहती है।
  • समय, स्थान और समाज के अनुसार भाषा में परिवर्तन होता रहता है।

"कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी।"

यह प्रसिद्ध कहावत भाषा की परिवर्तनशील प्रकृति को स्पष्ट करती है।


भाषा के रूप

अभिव्यक्ति के आधार पर भाषा के मुख्यतः तीन रूप माने जाते हैं।

1. मौखिक भाषा (Oral Language)

जब हम बोलकर अपने विचारों और भावों को व्यक्त करते हैं तथा दूसरा व्यक्ति उन्हें सुनकर समझता है, तब उसे मौखिक भाषा कहते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • भाषा का सबसे प्राचीन एवं स्वाभाविक रूप।
  • इसे सीखने के लिए किसी औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती।
  • बच्चा इसे परिवार और समाज से स्वतः सीख लेता है।

उदाहरण: वार्तालाप, भाषण, कहानी सुनाना, कक्षा में पढ़ाना, टेलीफोन पर बातचीत आदि।

2. लिखित भाषा (Written Language)

जब हम अपने विचारों को लिपि के माध्यम से लिखकर व्यक्त करते हैं और दूसरा व्यक्ति उन्हें पढ़कर समझता है, तब उसे लिखित भाषा कहते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • भाषा का स्थायी स्वरूप।
  • ज्ञान, साहित्य और इतिहास के संरक्षण का माध्यम।
  • इसके लिए लिपि का ज्ञान आवश्यक होता है।

उदाहरण: पुस्तक, पत्र, समाचार-पत्र, ईमेल, आलेख, संदेश आदि।

3. सांकेतिक भाषा (Sign Language)

जब बिना बोले अथवा लिखे केवल संकेतों, हाव-भाव अथवा इशारों के माध्यम से विचार व्यक्त किए जाते हैं, तब उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • इसमें शब्दों के स्थान पर संकेतों का प्रयोग किया जाता है।
  • मूक-बधिर व्यक्तियों के लिए अत्यंत उपयोगी होती है।
  • विशेष परिस्थितियों में सामान्य लोग भी इसका प्रयोग करते हैं।

उदाहरण: ट्रैफिक पुलिस के संकेत, हाथ हिलाकर अभिवादन करना, मूक-बधिर व्यक्तियों की सांकेतिक भाषा आदि।


भाषा के प्रकार

भाषा का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है। सामाजिक, प्रशासनिक तथा व्यवहारिक दृष्टि से भाषा के अनेक प्रकार माने जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष रूप से मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, मानक भाषा तथा अंतरराष्ट्रीय भाषा से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।

1. मातृभाषा (Mother Tongue)

जिस भाषा को कोई व्यक्ति जन्म के बाद अपने परिवार, विशेषकर माता तथा अपने आसपास के सामाजिक वातावरण से स्वाभाविक रूप से सीखता है, उसे मातृभाषा कहते हैं। यह व्यक्ति की प्रथम भाषा होती है।

मातृभाषा के माध्यम से ही बालक सोचने, बोलने तथा अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारम्भ करता है। इसलिए शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर पर मातृभाषा को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

उदाहरण: उत्तर प्रदेश में किसी बालक की मातृभाषा हिंदी, अवधी, भोजपुरी, ब्रज आदि हो सकती है।


2. राजभाषा (Official Language)

जिस भाषा का प्रयोग किसी देश या राज्य के शासन, प्रशासन तथा सरकारी कार्यों में किया जाता है, उसे राजभाषा कहते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी तथा उसकी लिपि देवनागरी है। साथ ही, राजकीय कार्यों में अंग्रेज़ी का भी सहायक भाषा के रूप में प्रयोग किया जाता है।

परीक्षोपयोगी तथ्य: भारत की राजभाषा हिंदी है, राष्ट्रभाषा नहीं।


3. राष्ट्रभाषा (National Language)

जो भाषा किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय भावना तथा एकता का प्रतीक मानी जाती है, उसे राष्ट्रभाषा कहते हैं।

भारत में प्रायः हिंदी को राष्ट्रभाषा समझ लिया जाता है, जबकि यह तथ्य सही नहीं है।

महत्वपूर्ण तथ्य: भारतीय संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है। यह प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न है।

4. संपर्क भाषा (Link Language)

जब विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले लोग आपस में संवाद स्थापित करने के लिए किसी एक सामान्य भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उसे संपर्क भाषा कहते हैं।

भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी अनेक राज्यों के बीच संपर्क भाषा के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उदाहरण: तमिलनाडु का व्यक्ति और उत्तर प्रदेश का व्यक्ति आपस में हिंदी के माध्यम से संवाद कर सकते हैं।


5. मानक भाषा (Standard Language)

किसी भाषा का वह परिष्कृत, व्याकरण-सम्मत तथा सर्वमान्य रूप, जिसे शिक्षा, साहित्य, प्रशासन, न्यायालय तथा मीडिया में स्वीकार किया जाता है, मानक भाषा कहलाता है।

मानक भाषा किसी भाषा के अनेक बोली रूपों में से विकसित होकर व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है।

उदाहरण: खड़ी बोली पर आधारित आधुनिक हिंदी, हिंदी की मानक भाषा है।


6. अंतरराष्ट्रीय भाषा (International Language)

जिस भाषा का प्रयोग अनेक देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचार, व्यापार, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा तथा कूटनीति के लिए किया जाता है, उसे अंतरराष्ट्रीय भाषा कहते हैं।

उदाहरण: वर्तमान समय में अंग्रेज़ी विश्व की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा मानी जाती है।


भाषा की उत्पत्ति

भाषा की उत्पत्ति मानव इतिहास के सबसे रोचक एवं जटिल विषयों में से एक है। आज तक कोई भी ऐसा सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया जा सका है जिसे सभी विद्वानों ने पूर्णतः स्वीकार किया हो। इसलिए भाषा की उत्पत्ति के संबंध में अनेक सिद्धांत प्रचलित हैं।

इन सिद्धांतों से यह समझने का प्रयास किया गया है कि आदिमानव ने सबसे पहले विचारों का आदान-प्रदान किस प्रकार प्रारम्भ किया और धीरे-धीरे भाषा का विकास कैसे हुआ।


भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत

1. दैवी सिद्धांत (Divine Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार भाषा मनुष्य की बनाई हुई नहीं है, बल्कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त है। प्राचीन काल में अनेक धर्मों एवं सभ्यताओं में यह विश्वास था कि मनुष्य को भाषा ईश्वर से प्राप्त हुई।

यद्यपि आधुनिक भाषाविज्ञान इस सिद्धांत को वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में स्वीकार नहीं करता, फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है।


2. अनुकरण सिद्धांत (Bow-wow Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार आदिमानव ने प्रकृति तथा पशु-पक्षियों की ध्वनियों का अनुकरण करके भाषा का निर्माण किया।

उदाहरण के लिए कोयल की "कू-कू", कौए की "काँव-काँव", जल की "कल-कल" अथवा हवा की "सर-सर" जैसी ध्वनियों की नकल करते हुए प्रारम्भिक शब्दों का निर्माण हुआ होगा।

यद्यपि यह सिद्धांत कुछ शब्दों की उत्पत्ति को समझा सकता है, परंतु संपूर्ण भाषा की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं कर पाता।


3. आवेग सिद्धांत (Pooh-pooh Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य के मन में उत्पन्न होने वाली तीव्र भावनाओं के कारण उसके मुख से स्वतः निकली ध्वनियाँ ही भाषा का प्रारम्भिक आधार बनीं।

भय, आश्चर्य, प्रसन्नता, पीड़ा या दुःख जैसी अवस्थाओं में निकलने वाली ध्वनियाँ धीरे-धीरे सार्थक शब्दों में परिवर्तित हो गईं।

उदाहरण: अरे!, आह!, ओह!, उफ़!, वाह! आदि।


4. संकेत सिद्धांत (Gesture Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार प्रारम्भिक मानव पहले अपने विचारों को हाथों, आँखों तथा शरीर के संकेतों से व्यक्त करता था। बाद में संकेतों के साथ ध्वनियों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ और धीरे-धीरे भाषा का विकास हुआ।

आज भी मूक-बधिर व्यक्तियों की सांकेतिक भाषा इस सिद्धांत की उपयोगिता को दर्शाती है।


5. संपर्क सिद्धांत (Contact Theory)

जब मनुष्य समूहों में रहने लगा, तब उसे सहयोग, सुरक्षा, शिकार, खेती तथा सामाजिक जीवन के लिए विचारों का आदान-प्रदान करना आवश्यक हो गया। इसी सामाजिक आवश्यकता के कारण भाषा का क्रमिक विकास हुआ।

आधुनिक भाषाविज्ञान इस विचार को अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक मानता है, क्योंकि भाषा मूलतः एक सामाजिक व्यवस्था है।


6. श्रम सिद्धांत (Yo-he-ho Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार सामूहिक श्रम करते समय मनुष्य द्वारा निकाली जाने वाली लयबद्ध ध्वनियाँ धीरे-धीरे सार्थक शब्दों और भाषा में परिवर्तित हो गईं।

उदाहरण: नाव चलाते समय, भारी पत्थर उठाते समय अथवा सामूहिक श्रम करते समय निकाली जाने वाली लयबद्ध ध्वनियाँ।

महत्वपूर्ण तथ्य: भाषा की उत्पत्ति का कोई एक सिद्धांत सर्वमान्य नहीं है। आधुनिक भाषाविज्ञान भाषा के विकास को सामाजिक, जैविक तथा मनोवैज्ञानिक कारकों का संयुक्त परिणाम मानता है।

मानवीय भाषा का विकास

मानवीय भाषा का विकास एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि यह लाखों वर्षों तक चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम है। प्रारंभिक मानव केवल संकेतों, हाव-भाव तथा अस्पष्ट ध्वनियों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करता था। समय के साथ उसके मस्तिष्क, स्वर-यंत्र तथा सामाजिक जीवन का विकास हुआ, जिससे भाषा भी क्रमशः विकसित होती गई।

भाषा के विकास की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है—

1. संकेतों का प्रयोग

आदिमानव प्रारम्भ में हाथ, आँख, चेहरे तथा शरीर के अन्य अंगों के संकेतों द्वारा अपनी बात व्यक्त करता था। यह भाषा का सबसे प्रारम्भिक रूप माना जाता है।

2. ध्वनियों का प्रयोग

धीरे-धीरे मनुष्य ने विभिन्न ध्वनियों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करना प्रारम्भ किया। प्रारंभ में ये ध्वनियाँ अस्पष्ट थीं, परंतु समय के साथ इनमें निश्चित अर्थ जुड़ते गए।

3. शब्दों का निर्माण

जब विशिष्ट ध्वनियों का संबंध निश्चित वस्तुओं, व्यक्तियों या क्रियाओं से स्थापित होने लगा, तब शब्दों का निर्माण हुआ। इससे संप्रेषण अधिक स्पष्ट और प्रभावी बन गया।

4. वाक्य निर्माण

शब्दों के विकास के बाद मनुष्य ने उन्हें व्यवस्थित क्रम में जोड़कर वाक्य बनाना प्रारम्भ किया। इससे जटिल विचारों और भावों की अभिव्यक्ति संभव हुई।

5. लिपि का विकास

मौखिक भाषा के लंबे समय बाद मनुष्य ने अपने विचारों को स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए लिपि का विकास किया। लिपि के आविष्कार ने ज्ञान, साहित्य, इतिहास तथा संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


भाषा का महत्व

मानव जीवन में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भाषा के बिना सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा वैज्ञानिक विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

भाषा का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है—

  • विचारों एवं भावों के आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम।
  • समाज को एक सूत्र में बाँधने का साधन।
  • ज्ञान, विज्ञान तथा शिक्षा का आधार।
  • साहित्य, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण का माध्यम।
  • राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाली शक्ति।
  • व्यक्तित्व विकास का प्रमुख साधन।
  • मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला।

भाषा और बोली में अंतर

अनेक विद्यार्थी भाषा और बोली को एक ही मान लेते हैं, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है।

भाषा बोली
विस्तृत क्षेत्र में बोली जाती है। सीमित क्षेत्र में बोली जाती है।
इसका व्याकरण अपेक्षाकृत निश्चित होता है। व्याकरण का कठोर पालन आवश्यक नहीं होता।
इसका साहित्य विकसित होता है। साहित्य अपेक्षाकृत कम विकसित होता है।
प्रशासन एवं शिक्षा में प्रयोग हो सकता है। मुख्यतः स्थानीय व्यवहार में प्रयुक्त होती है।
उदाहरण— हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत उदाहरण— अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी

भाषा और लिपि में अंतर

भाषा और लिपि का संबंध अत्यंत निकट है, किंतु दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं।

भाषा लिपि
भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। लिपि भाषा को लिखने की प्रणाली है।
भाषा बोली और सुनी जाती है। लिपि लिखी और पढ़ी जाती है।
भाषा ध्वनि पर आधारित होती है। लिपि चिह्नों एवं अक्षरों पर आधारित होती है।
उदाहरण— हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी उदाहरण— देवनागरी, रोमन, गुरुमुखी

परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

  • 'भाषा' शब्द 'भाष्' धातु से बना है।
  • भाषा का सबसे प्राचीन रूप मौखिक भाषा है।
  • लिखित भाषा के लिए लिपि का ज्ञान आवश्यक है।
  • भाषा जन्मजात नहीं, बल्कि अर्जित संपत्ति है।
  • भाषा निरंतर परिवर्तनशील होती है।
  • भारतीय संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है।
  • संघ की राजभाषा हिंदी (देवनागरी लिपि) है।
  • आधुनिक मानक हिंदी का आधार खड़ी बोली है।

एक नज़र में भाषा

विषय मुख्य तथ्य
शाब्दिक अर्थ 'भाष्' धातु से बना, अर्थ— बोलना
मुख्य रूप मौखिक, लिखित, सांकेतिक
मुख्य प्रकार मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, मानक भाषा, अंतरराष्ट्रीय भाषा
सबसे प्राचीन रूप मौखिक भाषा
लिखित भाषा का आधार लिपि
संघ की राजभाषा हिंदी (देवनागरी लिपि)

भाषा का संकल्पना-चित्र (Concept Diagram)

भाषा स्वरूप मौखिक लिखित सांकेतिक प्रकार मातृभाषा राजभाषा राष्ट्रभाषा संपर्क भाषा मानक भाषा अंतरराष्ट्रीय भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत दैवी सिद्धांत अनुकरण सिद्धांत आवेग सिद्धांत संकेत सिद्धांत संपर्क सिद्धांत श्रम सिद्धांत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भाषा किसे कहते हैं?

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों, इच्छाओं तथा अनुभवों का आदान-प्रदान करता है।

भाषा शब्द किस धातु से बना है?

भाषा शब्द संस्कृत की 'भाष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'बोलना' अथवा 'कहना'।

भाषा के कितने रूप होते हैं?

अभिव्यक्ति के आधार पर भाषा के तीन रूप होते हैं — मौखिक भाषा, लिखित भाषा तथा सांकेतिक भाषा।

भाषा के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं?

भाषा के प्रमुख प्रकार हैं — मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, मानक भाषा तथा अंतरराष्ट्रीय भाषा।

भारत की राजभाषा कौन-सी है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिंदी (देवनागरी लिपि) है।

क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है?

नहीं। भारतीय संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है, हिंदी केवल राजभाषा है।

भाषा और बोली में क्या अंतर है?

भाषा विस्तृत क्षेत्र में बोली जाती है और इसका व्याकरण व साहित्य विकसित होता है, जबकि बोली सीमित क्षेत्र में प्रयुक्त होती है और इसमें व्याकरण का कठोर पालन आवश्यक नहीं होता।

भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत कौन-से हैं?

भाषा की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत हैं — दैवी सिद्धांत, अनुकरण सिद्धांत, आवेग सिद्धांत, संकेत सिद्धांत, संपर्क सिद्धांत तथा श्रम सिद्धांत।

भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या है?

भाषा एक सामाजिक, अर्जित तथा परिवर्तनशील व्यवस्था है, जो विचारों एवं भावों के आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम है।

भाषा और लिपि में क्या अंतर है?

भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है जो बोली और सुनी जाती है, जबकि लिपि भाषा को लिखने की प्रणाली है जो लिखी और पढ़ी जाती है।

संबंधित विषय


निष्कर्ष

भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और साहित्य की आधारशिला भी है। मनुष्य ने भाषा के माध्यम से ही अपने अनुभवों को सुरक्षित रखा, ज्ञान का विस्तार किया और सामाजिक जीवन को संगठित बनाया। यही कारण है कि भाषा को मानव की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भाषा का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संबंधित प्रश्न हिंदी व्याकरण, भाषाविज्ञान तथा शिक्षण अभिरुचि से जुड़े अनेक प्रश्नपत्रों में पूछे जाते हैं। इसलिए भाषा की परिभाषा, प्रकार, रूप, विशेषताएँ तथा उत्पत्ति के सिद्धांतों का सम्यक् अध्ययन प्रत्येक विद्यार्थी के लिए आवश्यक है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग)और अठारह पुराण – परिचय, वर्गीकरण एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

भारतीय ज्ञान-परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा की नींव वेदों पर टिकी है, और इसी नींव पर उपनिषद, वेदांग, दर्शन-शास्त्र तथा पुराण जैसे अनेक ग्रंथों का विशाल भवन खड़ा हुआ है। प्रायः विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के मन में चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग) तथा अठारह पुराणों को लेकर कई भ्रम रहते हैं — जैसे "छह शास्त्र" वास्तव में कौन-से हैं, अठारहवां पुराण वायु है या शिव, कौन-सा उपनिषद किस वेद से जुड़ा है, अथवा कल्पसूत्र क्या होते हैं। अधिकांश लेख इस विषय पर केवल नामों की सूची तक सीमित रह जाते हैं। इस लेख में हम इससे आगे बढ़कर प्रत्येक ग्रंथ-समूह की प्रकृति, आंतरिक संरचना, संबंधित ब्राह्मण-आरण्यक ग्रंथों, तथा हर भ्रम के पीछे के वास्तविक कारण को भी विस्तार से, प्रामाणिक ढंग से समझेंगे। वैदिक साहित्य की संरचना भारतीय शास्त्र-परंपरा को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जाता है — श्रुति और स्मृति । श्रुति का अर्थ है वह ज्ञान जो ऋषियों ने साधना और श्रवण द्वारा प्राप्त किया — इसके अंतर्गत चारों वेद और उनसे जुड़े संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उ...

हिंदी भाषा की विशेषताएँ – उत्पत्ति, इतिहास, महत्व एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

एक नज़र में हिंदी भारत की राजभाषा है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी का विकास संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → आधुनिक हिंदी के रूप में हुआ। हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है तथा विश्वभर में करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। "हिन्दी भारतीय संस्कृति की आत्मा है" — कमलापति त्रिपाठी का यह कथन हिंदी के महत्व को बहुत सटीक ढंग से व्यक्त करता है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि भारत की पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। इस लेख में हम हिंदी की उत्पत्ति, उसकी भाषिक विशेषताओं तथा वर्तमान वैश्विक स्थिति को विस्तार से, तथ्यों सहित समझेंगे — हिंदी भाषा का परिचय हिंदी भारत की राजभाषा है तथा विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में गिनी जाती है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं — नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना जैसे कई देशों में भी हिंदी बोली और समझी जाती है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशाल जनसमूह की भाषा होते हुए भी अपनी सरलता और वैज्ञानिकता के लिए जानी जाती है। हिंदी की उत्पत्ति और विकास हिंदी का उद्भव संस्कृत से हु...

देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, मराठी, मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ (जैसे नेपाली) भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह लिपि भारत की अनेक अन्य लिपियों के सन्निकट भी है। इस आलेख में हम देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसके नामकरण, विशेषताओं, वैज्ञानिकता, गुण-दोष तथा अन्य लिपियों से इसकी तुलना — इन सभी पक्षों को विस्तार एवं प्रामाणिकता के साथ जानेंगे। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति संसार की सभी भाषाओं को लिखने के लिए किसी न किसी लिपि का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार देवनागरी भी एक लिपि है जिसका प्रयोग मूलतः हिंदी भाषा को लिखने के लिए किया जाता है। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। प्राचीन समय में आर्यों द्वारा प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त समस्त भारतीय लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। ...

रामचरितमानस (तुलसी रामायण) के सात कांड || 7 Kand of Ramcharitmans (Tulsidas_Ramayan)

रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण (Ramayan) के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'। रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को यदि "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" जाय तो अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है। माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल...