संधि दो वर्णों के मिलने पर होती है। उच्चारण को सरल, मधुर एवं प्रवाहपूर्ण बनाने के लिए ध्वनि या वर्ण में जो परिवर्तन होता है, तो उस परिवर्तन को संधि कहते हैं।
संधि का शाब्दिक अर्थ
संधि शब्द का शाब्दिक अर्थ 'मेल', 'जोड़' अथवा 'मिलन' है। व्याकरण में दो वर्णों के मिलने से जो ध्वन्यात्मक परिवर्तन होता है, उसे संधि कहा जाता है।
संधि की परिभाषा
दो वर्णों के मेल से उत्पन्न होने वाले ध्वन्यात्मक परिवर्तन को संधि कहते हैं।
जब दो वर्ण परस्पर मिलते हैं, तो कई बार उनका उच्चारण पहले जैसा नहीं रहता। उच्चारण को अधिक सरल, मधुर और सहज बनाने के लिए उनके रूप में जो सहज परिवर्तन होता है, वही संधि कहलाता है।
उदाहरण:
विद्या + आलय = विद्यालय
हिम + आलय = हिमालय
संधि क्यों होती है?
संधि उच्चारण की सुविधा के लिए होती है। संधि का उद्देश्य भाषा को अधिक सरल, मधुर, प्रवाहपूर्ण तथा उच्चारण में सहज बनाना है। यदि प्रत्येक शब्द का उच्चारण अलग-अलग किया जाए, तो भाषा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। संधि के कारण शब्दों का उच्चारण स्वाभाविक हो जाता है और भाषा अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है।
संधि की पहचान कैसे करें
- दो वर्णों के मिलने पर ध्वनि या वर्ण में परिवर्तन दिखाई देता है।
- परिवर्तन का उद्देश्य उच्चारण को सरल, सहज एवं मधुर बनाना होता है।
- संधि-विच्छेद करने पर मूल शब्द पुनः प्राप्त हो जाते हैं।
संधि के भेद
हिंदी व्याकरण में संधि के मुख्यतः तीन भेद माने जाते हैं—
स्वर संधि
दो स्वरों के मेल से उनके रूप में जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। हिंदी तथा संस्कृत व्याकरण में स्वर संधि का व्यापक प्रयोग होता है।
दो स्वरों के परस्पर मिलने पर उत्पन्न होने वाले ध्वन्यात्मक परिवर्तन को स्वर संधि कहते हैं।
यदि किसी शब्द का अंतिम वर्ण स्वर हो और उसके बाद आने वाले शब्द का पहला वर्ण भी स्वर हो, तो दोनों स्वरों के मिलने से नया स्वर या नया रूप बन सकता है। इस परिवर्तन को स्वर संधि कहेंगे।
उदाहरण:
विद्या + आलय = विद्यालय
गिरि + ईश = गिरीश
स्वर संधि के भेद
स्वर संधि के मुख्य पाँच भेद माने जाते हैं—
दीर्घ संधि
जब समान स्वरों के परस्पर मिलने पर वे दीर्घ स्वर में बदल जाते हैं, तब वहाँ दीर्घ संधि होती है।
समान स्वरों के मेल से उनके स्थान पर दीर्घ स्वर हो जाने को दीर्घ संधि कहते हैं।
यदि दो समान स्वर आपस में मिलते हैं, तो वे अलग-अलग न रहकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं। उदाहरण के लिए अ + अ = आ तथा इ + इ = ई।
दीर्घ संधि के नियम
| स्वरों का मेल | परिणाम |
|---|---|
| अ + अ | आ |
| आ + आ | आ |
| इ + इ | ई |
| ई + ई | ई |
| उ + उ | ऊ |
| ऊ + ऊ | ऊ |
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| विद्यालय | विद्या + आलय |
| हिमालय | हिम + आलय |
| धर्मात्मा | धर्म + आत्मा |
यदि दो समान स्वर मिलकर दीर्घ स्वर बन जाएँ, तो वहाँ सामान्यतः दीर्घ संधि होती है।
गुण संधि
दीर्घ संधि के बाद आइए अब समझते हैं गुण संधि। जब अ अथवा आ के बाद इ, ई, उ, ऊ या ऋ आए, तो उनके मेल से क्रमशः ए, ओ तथा अर् हो जाता है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को गुण संधि कहते हैं।
अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ अथवा ऋ आने पर उनके स्थान पर क्रमशः ए, ओ तथा अर् हो जाने को गुण संधि कहते हैं।
गुण संधि में दो स्वर मिलकर नया स्वर बनाते हैं। इसे याद रखने के लिए यह नियम ध्यान रखें—
अ/आ + इ/ई = ए
अ/आ + उ/ऊ = ओ
अ/आ + ऋ = अर्
गुण संधि के नियम
| स्वरों का मेल | परिणाम |
|---|---|
| अ/आ + इ/ई | ए |
| अ/आ + उ/ऊ | ओ |
| अ/आ + ऋ | अर् |
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| देवेन्द्र | देव + इन्द्र |
| महोत्सव | महा + उत्सव |
| राजर्षि | राज + ऋषि |
यदि अ या आ के बाद इ, ई, उ, ऊ अथवा ऋ आए और उनके मेल से क्रमशः ए, ओ या अर् बने, तो वहाँ गुण संधि होती है।
गुण संधि के बाद अब वृद्धि संधि को समझते हैं। वृद्धि संधि के नियम गुण संधि से मिलते-जुलते हैं, इसलिए विद्यार्थी अक्सर दोनों में भ्रमित हो जाते हैं। यदि नियम को ध्यान से समझ लिया जाए, तो दोनों में अंतर करना आसान हो जाता है।
वृद्धि संधि
जब अ अथवा आ के बाद ए, ऐ, ओ अथवा औ आए, तो उनके मेल से क्रमशः ऐ तथा औ हो जाता है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को वृद्धि संधि कहते हैं।
अ या आ के बाद ए, ऐ, ओ अथवा औ आने पर उनके स्थान पर क्रमशः ऐ तथा औ हो जाते हैं तो वहाँ वृद्धि संधि होती है।
वृद्धि संधि में अ/आ के साथ ए/ऐ मिलकर ऐ बनता है तथा अ/आ के साथ ओ/औ मिलकर औ बनता है।
याद रखें:
अ/आ + ए/ऐ = ऐ
अ/आ + ओ/औ = औ
वृद्धि संधि के नियम
| स्वरों का मेल | परिणाम |
|---|---|
| अ/आ + ए/ऐ | ऐ |
| अ/आ + ओ/औ | औ |
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| सदैव | सदा + एव |
| मतैक्य | मत + ऐक्य |
| महोषधि | महा + ओषधि |
गुण संधि और वृद्धि संधि में सबसे अधिक भ्रम होता है। यदि अ/आ + इ/ई = ए या अ/आ + उ/ऊ = ओ बने, तो वह गुण संधि है; जबकि अ/आ + ए/ऐ = ऐ तथा अ/आ + ओ/औ = औ बने, तो वह वृद्धि संधि होती है।
अब यण संधि को समझते हैं। यण संधि स्वर संधि का एक महत्वपूर्ण भेद है। इसमें दो स्वरों के मेल से नया स्वर नहीं बनता, बल्कि कुछ स्वरों के स्थान पर क्रमशः य्, व् अथवा र् का आदेश हो जाता है। यहाँ आदेश का अर्थ है- परिवर्तन।
यण संधि
जब इ, ई, उ, ऊ अथवा ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आता है, तो क्रमशः इ/ई के स्थान पर य्, उ/ऊ के स्थान पर व् तथा ऋ के स्थान पर र् हो जाता है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को यण संधि कहते हैं।
इ, ई, उ, ऊ अथवा ऋ के बाद असमान स्वर आने पर उनके स्थान पर क्रमशः य्, व् तथा र् हो जाने को यण संधि कहते हैं।
यण संधि में नया स्वर नहीं बनता, बल्कि इ/ई बदलकर य्, उ/ऊ बदलकर व् तथा ऋ बदलकर र् हो जाता है।
याद रखने का सूत्र
इ / ई → य्
उ / ऊ → व्
ऋ → र्
यण संधि के नियम
| मूल स्वर | आदेश | उदाहरण |
|---|---|---|
| इ / ई | य् | अत्यन्त, अत्यधिक, यद्यपि, इत्यादि |
| उ / ऊ | व् | अन्वय, अन्वेषण, स्वागत |
| ऋ | र् | पित्राज्ञा |
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| अत्यन्त | अति + अन्त |
| अत्यधिक | अति + अधिक |
| यद्यपि | यदि + अपि |
| इत्यादि | इति + आदि |
| अन्वय | अनु + अय |
| अन्वेषण | अनु + एषण |
| स्वागत | सु + आगत |
| पित्राज्ञा | पितृ + आज्ञा |
यदि किसी शब्द में य्, व् अथवा र् का आगमन दिखाई दे, तो पहले यह जाँचें कि कहीं वह इ/ई, उ/ऊ या ऋ के स्थान पर तो नहीं आया है। यदि ऐसा है, तो वहाँ यण संधि होने की संभावना होती है।
अब अयादि संधि को समझते हैं। यह स्वर संधि का अंतिम भेद है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अपेक्षाकृत कम पूछे जाते हैं, लेकिन इसे अन्य स्वर संधियों से अलग पहचानना आवश्यक है।
अयादि संधि
जब ए, ऐ, ओ अथवा औ के बाद कोई स्वर आता है, तो क्रमशः अय्, आय्, अव् तथा आव् का आदेश (परिवर्त्तन) हो जाता है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को अयादि संधि कहते हैं।
ए, ऐ, ओ अथवा औ के बाद स्वर आने पर उनके स्थान पर क्रमशः अय्, आय्, अव् तथा आव् हो जाने को अयादि संधि कहते हैं।
अयादि संधि में ए, ऐ, ओ और औ अपने मूल रूप में नहीं रहते। स्वर आने पर वे क्रमशः अय्, आय्, अव् और आव् में बदल जाते हैं।
याद रखने का सूत्र
ए → अय्
ऐ → आय्
ओ → अव्
औ → आव्
अयादि संधि के नियम
| मूल स्वर | आदेश |
|---|---|
| ए | अय् |
| ऐ | आय् |
| ओ | अव् |
| औ | आव् |
उदाहरण
यदि ए, ऐ, ओ या औ के बाद स्वर आने पर क्रमशः अय्, आय्, अव् या आव् का आदेश हो, तो वहाँ अयादि संधि होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रायः इसका नियम पूछा जाता है।
व्यंजन संधि
स्वर संधि के बाद अब व्यंजन संधि का अध्ययन करते हैं। स्वर संधि में परिवर्तन स्वरों में होता है, जबकि व्यंजन संधि में परिवर्तन किसी व्यंजन के रूप में होता है। इसलिए दोनों के नियम और पहचान अलग-अलग हैं।
व्यंजन संधि
जब दो वर्णों के मेल से किसी व्यंजन में ध्वन्यात्मक परिवर्तन होता है, तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं। यह परिवर्तन उच्चारण को अधिक सरल, स्पष्ट और स्वाभाविक बनाने के लिए होता है।
दो वर्णों अथवा दो शब्दों के मेल से किसी व्यंजन में होने वाले ध्वन्यात्मक परिवर्तन को व्यंजन संधि कहते हैं।
सत् + जन = सज्जन
यहाँ त् बदलकर ज्ज हो गया है।
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
यहाँ त् बदलकर न्न हो गया है।
दोनों उदाहरणों में परिवर्तन व्यंजन में हुआ है, इसलिए यहाँ व्यंजन संधि है।
व्यंजन संधि की पहचान
- दो वर्णों या दो शब्दों के मिलने पर किसी व्यंजन का रूप बदल जाता है।
- परिवर्तन का उद्देश्य उच्चारण को सरल एवं स्वाभाविक बनाना होता है।
- संधि-विच्छेद करने पर मूल शब्द प्राप्त हो जाते हैं।
यदि परिवर्तन स्वर में हो, तो वह स्वर संधि होगी। यदि परिवर्तन व्यंजन में हो, तो वहाँ व्यंजन संधि होगी। प्रश्न हल करते समय सबसे पहले यही पहचान करें।
व्यंजन संधि के नियम
व्यंजन संधि के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—
▸ त् का परिवर्तन
▸ म् का अनुस्वार (ं) में परिवर्तन
▸ न् का ण् में परिवर्तन
▸ अन्य महत्वपूर्ण नियम
वर्ग के प्रथम व्यंजन का परिवर्तन
जब किसी वर्ग का प्रथम व्यंजन (क्, च्, ट्, त्, प्) अपने ही वर्ग के तृतीय या चतुर्थ व्यंजन अथवा किसी स्वर के संपर्क में आता है, तो वह प्रायः अपने वर्ग के तृतीय व्यंजन (ग्, ज्, ड्, द्, ब्) में परिवर्तित हो जाता है। इसे वर्ग के प्रथम व्यंजन का परिवर्तन कहते हैं।
यदि क्, च्, ट्, त् या प् के बाद स्वर अथवा अपने वर्ग का तृतीय या चतुर्थ व्यंजन आए, तो पहला व्यंजन प्रायः अपने वर्ग के तृतीय व्यंजन में बदल जाता है।
क् → ग्
च् → ज्
ट् → ड्
त् → द्
प् → ब्
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद | परिवर्तन |
|---|---|---|
| दिग्गज | दिक् + गज | क् → ग् |
| वाग्दान | वाक् + दान | क् → ग् |
| सद्गुण | सत् + गुण | त् → द् |
| सद्भाव | सत् + भाव | त् → द् |
यदि क्, च्, ट्, त् या प् अपने वर्ग के तृतीय या चतुर्थ व्यंजन अथवा स्वर के प्रभाव से बदलकर क्रमशः ग्, ज्, ड्, द् या ब् बन जाएँ, तो वहाँ इस नियम के अनुसार व्यंजन संधि होती है।
त् का परिवर्तन
व्यंजन संधि में त् अपने बाद आने वाले वर्ण के प्रभाव से अनेक रूप धारण कर लेता है। कभी यह च् बन जाता है, कभी ज्, कभी ल्, तो कभी न् में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए त् का परिवर्तन सदैव उसके बाद आने वाले वर्ण पर निर्भर करता है।
यदि किसी शब्द में त् के बाद आने वाले व्यंजन के कारण त् का रूप बदल जाए, तो वहाँ सामान्यतः त् का परिवर्तन होता है।
1. त् + च / छ → च्च
जब त् के बाद च या छ आता है, तो त् बदलकर च् हो जाता है।
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| सच्चरित्र | सत् + चरित्र |
2. त् + ज → ज्ज
जब त् के बाद ज आता है, तो त् बदलकर ज् हो जाता है।
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| सज्जन | सत् + जन |
3. त् + ल → ल्ल
जब त् के बाद ल आता है, तो त् बदलकर ल् हो जाता है।
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| उल्लास | उत् + लास |
4. त् + न → न्न
जब त् के बाद न आता है, तो त् बदलकर न् हो जाता है।
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| जगन्नाथ | जगत् + नाथ |
त् + च / छ → च्च
त् + ज → ज्ज
त् + ल → ल्ल
त् + न → न्न
सच्चरित्र, सज्जन, उल्लास तथा जगन्नाथ जैसे शब्द प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इनके संधि-विच्छेद और परिवर्तन के नियम अवश्य याद रखें।
म् का अनुस्वार (ं) में परिवर्तन
जब म् के बाद कोई व्यंजन आता है, तो उच्चारण को सरल और सुगम बनाने के लिए अनेक स्थितियों में म् के स्थान पर अनुस्वार (ं) हो जाता है। व्यंजन संधि का यह महत्वपूर्ण नियम म् का अनुस्वार (ं) में परिवर्तन कहलाता है।
यदि म् के बाद कोई व्यंजन आए, तो उच्चारण की सुविधा के लिए अनेक स्थानों पर म् के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग हो जाता है।
सम् + कल्प = संकल्प
यहाँ म् के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग हुआ है, इसलिए यह व्यंजन संधि का उदाहरण है।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| संकल्प | सम् + कल्प |
| संकेत | सम् + केत |
| संपर्क | सम् + पर्क |
| संभव | सम् + भव |
| संबंध | सम् + बंध |
| संपत्ति | सम् + पत्ति |
म् + व्यंजन → ं + व्यंजन
संकल्प, संकेत, संपर्क, संभव, संबंध तथा संपत्ति जैसे शब्द प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इनका संधि-विच्छेद अवश्य याद रखें।
न् का ण् में परिवर्तन
जब न् से पहले र, ऋ अथवा ष का प्रभाव होता है, तो अनेक स्थितियों में न् का रूप बदलकर ण् हो जाता है। व्यंजन संधि का यह एक महत्वपूर्ण नियम है।
यदि न् पर र, ऋ अथवा ष का प्रभाव पड़े, तो अनेक स्थितियों में न् बदलकर ण् हो जाता है।
परि + नाम = परिणाम
यहाँ र के प्रभाव से न् का ण् हो गया है।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| परिणाम | परि + नाम |
| प्रणाम | प्र + नाम |
| परिणति | परि + नति |
र / ऋ / ष के प्रभाव से न् → ण्
प्रत्येक ण वाले शब्द में व्यंजन संधि नहीं होती। परीक्षा में केवल उन्हीं शब्दों को व्यंजन संधि का उदाहरण मानें, जिनमें न् वास्तव में र, ऋ अथवा ष के प्रभाव से ण् में परिवर्तित हुआ हो।
अन्य महत्वपूर्ण नियम
विसर्ग संधि
स्वर संधि और व्यंजन संधि का अध्ययन करने के बाद अब विसर्ग संधि को समझते हैं। विसर्ग संधि में परिवर्तन विसर्ग (ः) के कारण होता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके नियम, उदाहरण तथा संधि-विच्छेद से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
अन्य संधियों की भाँति विसर्ग संधि का भी उद्देश्य उच्चारण को अधिक सरल, मधुर एवं प्रवाहपूर्ण बनाना है। जब किसी शब्द के अंत में विसर्ग (ः) हो और उसके बाद कोई अन्य वर्ण आए, तो उसके प्रभाव से विसर्ग के रूप में परिवर्तन हो सकता है। इसी परिवर्तन को विसर्ग संधि कहते हैं।
जब विसर्ग (ः) के बाद आने वाले वर्ण के प्रभाव से विसर्ग के रूप में परिवर्तन होता है, तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
दुः + जन = दुर्जन
यहाँ विसर्ग अगले वर्ण के अनुसार अपने रूप में बना रहता है। जबकि अन्य शब्दों में यही विसर्ग बदल भी सकता है। इसलिए विसर्ग संधि के नियमों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
विसर्ग संधि के नियम
विसर्ग संधि के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—
▸ विसर्ग का ष् में परिवर्तन
▸ विसर्ग का स् में परिवर्तन
▸ विसर्ग का र् में परिवर्तन
▸ अन्य महत्वपूर्ण नियम
विसर्ग का श् में परिवर्तन
विसर्ग संधि का पहला महत्वपूर्ण नियम यह है कि कुछ विशेष व्यंजनों के आने पर विसर्ग (ः) का रूप बदलकर श् हो जाता है। यह नियम सरल है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके उदाहरण बार-बार पूछे जाते हैं।
जब विसर्ग (ः) के बाद च या छ आता है, तो सामान्यतः विसर्ग (ः) का श् में परिवर्तन हो जाता है।
यदि विसर्ग (ः) के बाद च अथवा छ आए, तो विसर्ग का श् में परिवर्तन हो जाता है।
निः + चल = निश्चल
यहाँ विसर्ग (ः) बदलकर श् हो गया है, इसलिए निश्चल शब्द बना।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| निश्चल | निः + चल |
| निश्चय | निः + चय |
| दुश्चरित्र | दुः + चरित्र |
ः + च / छ → श्
यदि किसी शब्द में च या छ से पहले श् दिखाई दे, तो उसका संधि-विच्छेद करते समय पहले यह जाँचें कि कहीं वहाँ मूल रूप में विसर्ग (ः) तो नहीं था। प्रतियोगी परीक्षाओं में ऐसे प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
विसर्ग का ष् में परिवर्तन
अब विसर्ग संधि के दूसरे महत्वपूर्ण नियम "विसर्ग का ष् में परिवर्तन" को समझते हैं। यह नियम तब लागू होता है, जब विसर्ग के बाद ट या ठ आता है।
जब विसर्ग (ः) के बाद ट अथवा ठ आता है, तो सामान्यतः विसर्ग (ः) का ष् में परिवर्तन हो जाता है।
यदि विसर्ग (ः) के बाद ट अथवा ठ आए, तो विसर्ग का ष् में परिवर्तन हो जाता है।
निः + ठुर = निष्ठुर
यहाँ विसर्ग (ः) बदलकर ष् हो गया है, इसलिए निष्ठुर शब्द बना।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| निष्ठुर | निः + ठुर |
| धनुष्टंकार | धनुः + टंकार |
ः + ट / ठ → ष्
यदि किसी शब्द में ट या ठ से पहले ष् दिखाई दे, तो उसका संधि-विच्छेद करते समय यह जाँचें कि कहीं वहाँ मूल रूप में विसर्ग (ः) तो नहीं था। निष्ठुर तथा धनुष्टंकार इस नियम के मानक उदाहरण हैं।
विसर्ग का स् में परिवर्तन
जब विसर्ग (ः) के बाद त अथवा थ आता है, तो सामान्यतः विसर्ग (ः) का स् में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार होने वाले परिवर्तन को विसर्ग संधि का यह नियम कहते हैं।
यदि विसर्ग (ः) के बाद त अथवा थ आए, तो विसर्ग का स् में परिवर्तन हो जाता है।
निः + तेज = निस्तेज
यहाँ विसर्ग (ः) बदलकर स् हो गया है, इसलिए निस्तेज शब्द बना।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| निस्तेज | निः + तेज |
| निस्तारण | निः + तारण |
| मनस्ताप | मनः + ताप |
ः + त / थ → स्
निस्तेज, निस्तारण तथा मनस्ताप जैसे शब्द इस नियम के प्रमुख उदाहरण हैं। संधि-विच्छेद करते समय यह अवश्य देखें कि मूल शब्द में विसर्ग (ः) था।
विसर्ग का र् में परिवर्तन
जब विसर्ग (ः) के पहले अ हो तथा उसके बाद कोई स्वर अथवा वर्ग का तृतीय, चतुर्थ या पंचम व्यंजन अथवा य, र, ल, व, ह आए, तो सामान्यतः विसर्ग (ः) का र् में परिवर्तन हो जाता है।
यदि विसर्ग से पहले अ हो और उसके बाद स्वर, वर्ग का तृतीय, चतुर्थ या पंचम व्यंजन अथवा य, र, ल, व, ह आए, तो विसर्ग का र् में परिवर्तन हो जाता है।
पुनः + आगमन = पुनरागमन
यहाँ विसर्ग (ः) बदलकर र् हो गया है, इसलिए पुनरागमन शब्द बना।
उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| पुनरागमन | पुनः + आगमन |
| पुनर्जन्म | पुनः + जन्म |
| दुर्गति | दुः + गति |
| निर्विकार | निः + विकार |
अः + स्वर / वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पंचम व्यंजन / य, र, ल, व, ह → अर्
पुनरागमन, पुनर्जन्म, दुर्गति तथा निर्विकार जैसे शब्द इस नियम के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इनके संधि-विच्छेद से संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
अन्य महत्वपूर्ण नियम
अब तक आपने विसर्ग संधि के प्रमुख नियमों का अध्ययन किया। इनके अतिरिक्त कुछ विशेष परिस्थितियों में भी विसर्ग में परिवर्तन होता है। यद्यपि ऐसे नियम प्रतियोगी परीक्षाओं में अपेक्षाकृत कम पूछे जाते हैं, फिर भी उनका सामान्य ज्ञान होना उपयोगी रहता है।
विसर्ग संधि में सभी स्थानों पर विसर्ग का रूप नहीं बदलता। कई शब्दों में विसर्ग यथावत भी बना रहता है। इसलिए संधि का निर्णय सदैव नियम के आधार पर करना चाहिए, केवल शब्द के रूप को देखकर नहीं।
दुः + ख = दुःख
यहाँ विसर्ग के बाद ख है, इसलिए विसर्ग अपने मूल रूप में बना रहता है और उसका कोई परिवर्तन नहीं होता।
कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण
| शब्द | संधि-विच्छेद |
|---|---|
| दुःख | दुः + ख |
| अन्तःकरण | अन्तः + करण |
| प्रातःकाल | प्रातः + काल |
हर विसर्ग में परिवर्तन नहीं होता। कुछ शब्दों में विसर्ग अपने मूल रूप में भी बना रहता है।
विसर्ग संधि के प्रश्न हल करते समय सबसे पहले यह पहचानें कि विसर्ग के बाद कौन-सा वर्ण है। उसी के आधार पर यह निर्धारित करें कि विसर्ग का श्, ष्, स्, र् में परिवर्तन होगा या वह अपने मूल रूप में बना रहेगा।
संधि से संबंधित अभ्यास प्रश्न
किसी भी विषय को अच्छी तरह समझने के लिए अभ्यास करना आवश्यक होता है। नीचे दिए गए प्रश्नों की सहायता से आप संधि के विभिन्न नियमों की पुनरावृत्ति कर सकते हैं तथा अपनी तैयारी का मूल्यांकन भी कर सकते हैं।
संधि से संबंधित अभ्यास प्रश्न
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- संधि किसे कहते हैं?
(A) शब्दों का विग्रह
(B) वर्णों के मेल से होने वाला ध्वन्यात्मक परिवर्तन
(C) शब्दों का समूह
(D) उपसर्ग का प्रयोग - संधि के मुख्य कितने प्रकार हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच - 'सदैव' किस संधि का उदाहरण है?
(A) दीर्घ संधि
(B) गुण संधि
(C) वृद्धि संधि
(D) यण संधि - 'सज्जन' किस संधि का उदाहरण है?
(A) स्वर संधि
(B) व्यंजन संधि
(C) विसर्ग संधि
(D) इनमें से कोई नहीं - 'निश्चय' किस संधि का उदाहरण है?
(A) स्वर संधि
(B) व्यंजन संधि
(C) विसर्ग संधि
(D) समास
संधि-विच्छेद कीजिए
- सदैव
- अत्यन्त
- सज्जन
- निश्चल
- पुनरागमन
संधि कीजिए
- विद्या + आलय
- सत् + जन
- निः + चल
- सम् + कल्प
- पुनः + आगमन
पहले सभी प्रश्नों को स्वयं हल करने का प्रयास करें। इसके बाद अपने उत्तरों का मिलान इस लेख में दिए गए नियमों और उदाहरणों से करें। नियमित अभ्यास से संधि से संबंधित प्रश्नों को हल करना बहुत आसान हो जाता है।
संधि से संबंधित सामान्य प्रश्न (FAQ)
संधि से संबंधित कुछ प्रश्न विद्यार्थियों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों द्वारा अक्सर पूछे जाते हैं। नीचे ऐसे ही महत्वपूर्ण प्रश्नों के संक्षिप्त और सरल उत्तर दिए गए हैं।
संधि से संबंधित सामान्य प्रश्न (FAQ)
1. संधि किसे कहते हैं?
दो वर्णों अथवा दो शब्दों के मेल से होने वाले ध्वन्यात्मक परिवर्तन को संधि कहते हैं।
2. संधि कितने प्रकार की होती है?
संधि के तीन मुख्य प्रकार हैं— स्वर संधि, व्यंजन संधि तथा विसर्ग संधि।
3. स्वर संधि किसे कहते हैं?
जब दो स्वरों के मेल से किसी स्वर में परिवर्तन होता है, तो उसे स्वर संधि कहते हैं।
4. व्यंजन संधि किसे कहते हैं?
जब दो वर्णों अथवा दो शब्दों के मेल से किसी व्यंजन में परिवर्तन होता है, तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
5. विसर्ग संधि किसे कहते हैं?
जब विसर्ग (ः) के बाद आने वाले वर्ण के प्रभाव से विसर्ग के रूप में परिवर्तन होता है, तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
6. संधि और समास में क्या अंतर है?
संधि में वर्णों के मेल से ध्वन्यात्मक परिवर्तन होता है, जबकि समास में दो या दो से अधिक शब्द मिलकर एक नया सार्थक शब्द बनाते हैं।
7. प्रतियोगी परीक्षाओं में संधि से किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं?
प्रतियोगी परीक्षाओं में संधि की परिभाषा, प्रकार, नियम, उदाहरण, संधि-विच्छेद, संधि कीजिए तथा वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न पूछे जाते हैं।
8. संधि को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
संधि के प्रत्येक नियम को उसके सूत्र और उदाहरणों के साथ समझें तथा नियमित रूप से संधि-विच्छेद और संधि बनाने का अभ्यास करें। इससे नियम लंबे समय तक याद रहते हैं।
अभ्यास प्रश्नों की उत्तरमाला
यदि आपने अभ्यास प्रश्नों को स्वयं हल करने का प्रयास किया है, तो अब अपने उत्तरों का मिलान नीचे दी गई उत्तरमाला से करें। जिन प्रश्नों में त्रुटि हुई हो, उनसे संबंधित नियम को एक बार पुनः अवश्य पढ़ें।
अभ्यास प्रश्नों की उत्तरमाला
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
| प्रश्न | सही उत्तर |
|---|---|
| 1 | (B) |
| 2 | (B) |
| 3 | (C) |
| 4 | (B) |
| 5 | (C) |
संधि-विच्छेद
- सदैव = सदा + एव
- अत्यन्त = अति + अन्त
- सज्जन = सत् + जन
- निश्चल = निः + चल
- पुनरागमन = पुनः + आगमन
संधि कीजिए
- विद्या + आलय = विद्यालय
- सत् + जन = सज्जन
- निः + चल = निश्चल
- सम् + कल्प = संकल्प
- पुनः + आगमन = पुनरागमन
यदि आपके अधिकांश उत्तर सही हैं, तो आपने संधि के मूल नियमों को अच्छी तरह समझ लिया है। यदि कुछ प्रश्नों में त्रुटि हुई है, तो संबंधित संधि के नियम और उदाहरणों का पुनः अभ्यास करें।
निष्कर्ष
अब तक आपने संधि के सभी प्रमुख प्रकारों—स्वर संधि, व्यंजन संधि तथा विसर्ग संधि—का विस्तार से अध्ययन किया। साथ ही प्रत्येक संधि के नियम, उदाहरण, संधि-विच्छेद, अभ्यास प्रश्न तथा उत्तरमाला के माध्यम से इस विषय को सरल रूप में समझा।
संधि हिंदी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। विद्यालयी परीक्षाओं से लेकर SSC, UPSSSC, UPPSC, CTET, UPTET, सुपर TET, रेलवे, बैंक तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में संधि से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। यदि आप संधि के प्रत्येक नियम को उसके उदाहरणों के साथ समझकर नियमित अभ्यास करेंगे, तो इस विषय से जुड़े अधिकांश प्रश्न आसानी से हल कर सकेंगे।
यदि आपने संधि का अध्ययन पूरा कर लिया है, तो हिंदी व्याकरण के अन्य महत्वपूर्ण विषयों का अध्ययन भी अवश्य करें।
संधि के नियमों को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक नियम के उदाहरणों का संधि-विच्छेद करें, स्वयं नए शब्द बनाकर अभ्यास करें तथा समय-समय पर पूरे अध्याय का पुनरावर्तन अवश्य करें। नियमित अभ्यास से यह विषय सरल और स्थायी रूप से याद हो जाता है।
यदि इस लेख से आपको संधि समझने में सहायता मिली हो या आप किसी नियम, उदाहरण अथवा प्रश्न के बारे में सुझाव देना चाहते हों, तो नीचे टिप्पणी (Comment) करके हमें अवश्य बताएँ। आपके सुझाव इस लेख को और अधिक उपयोगी बनाने में हमारी सहायता करेंगे।

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