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तत्सम, तद्भव और अर्धतत्सम शब्द: परिभाषा, पहचान, अंतर व उदाहरण

हिंदी भाषा का शब्द-भंडार मुख्यतः चार स्रोतों से समृद्ध हुआ है — संस्कृत से बिना परिवर्तन के, संस्कृत से क्रमिक परिवर्तन के साथ, स्थानीय लोकभाषाओं से, तथा विदेशी भाषाओं से। इन्हीं स्रोतों के आधार पर हिंदी शब्दों को तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी (आगत) — चार वर्गों में बाँटा जाता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण और परीक्षाओं में सर्वाधिक पूछे जाने वाले दो भेद हैं — तत्सम शब्द और तद्भव शब्द

संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के लिए गए शब्द तत्सम शब्द कहलाते हैं, जबकि संस्कृत के शब्दों में ध्वनि और रूप परिवर्तन के बाद प्रचलित हुए शब्द तद्भव शब्द कहलाते हैं।

तत्सम और तद्भव शब्द हिंदी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। विद्यालयी शिक्षा से लेकर CTET, UPTET, TGT, PGT, LT Grade, UGC NET, SSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे नियमित प्रश्न पूछे जाते हैं।

इस लेख में आप तत्सम और तद्भव शब्दों की परिभाषा, अर्धतत्सम शब्द, देशज व विदेशी शब्दों से इनका अंतर, ध्वनि-परिवर्तन के नियम, पहचान करने की ट्रिक, 100+ उदाहरण तथा परीक्षोपयोगी प्रश्नों का विस्तृत एवं प्रामाणिक अध्ययन करेंगे।

तत्सम शब्द किसे कहते हैं?

संस्कृत भाषा से बिना किसी ध्वन्यात्मक या रूपात्मक परिवर्तन के सीधे हिंदी में ग्रहण किए गए शब्द तत्सम शब्द कहलाते हैं। 'तत्सम' दो शब्दों से मिलकर बना है — तत् + सम, जिसका अर्थ है 'उसके समान' अर्थात् जो शब्द अपने मूल संस्कृत रूप में ही प्रयुक्त हों। संस्कृत और हिंदी में अंतर केवल इतना है कि संस्कृत में इन शब्दों के साथ विभक्ति-चिह्न या प्रत्यय लगे रहते हैं, जबकि हिंदी में ये उनसे रहित होकर प्रयुक्त होते हैं — जैसे संस्कृत का 'फलम्' हिंदी में 'फल' हो जाता है।

उदाहरण

  • अग्नि
  • जल
  • सूर्य
  • वायु
  • पुष्प
  • ग्राम
  • मुख
  • नेत्र
  • हस्त
  • निद्रा

तद्भव शब्द किसे कहते हैं?

संस्कृत के शब्दों में समय के साथ ध्वनि, उच्चारण अथवा रूप में परिवर्तन होकर, प्रायः पालि-प्राकृत-अपभ्रंश की एक लंबी यात्रा तय करके, जो शब्द हिंदी में प्रचलित हुए, उन्हें तद्भव शब्द कहा जाता है। 'तद्भव' का अर्थ है — 'उससे उत्पन्न' अर्थात् संस्कृत शब्द से विकसित रूप।

उदाहरण

  • अग्नि → आग
  • दन्त → दाँत
  • कर्ण → कान
  • मुख → मुँह
  • निद्रा → नींद
  • हस्त → हाथ
  • ग्राम → गाँव
  • अक्षि → आँख
  • दुग्ध → दूध
  • सूर्य → सूरज

अर्धतत्सम शब्द — तत्सम और तद्भव के बीच की कड़ी

तत्सम और तद्भव के अतिरिक्त एक तीसरा, कम चर्चित किंतु परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण वर्ग है — अर्धतत्सम शब्द। ये वे शब्द हैं जो संस्कृत से हिंदी तक की यात्रा में आधे रास्ते पर हैं — न तो पूरी तरह मूल संस्कृत रूप में हैं (तत्सम), न ही पूरी तरह बदल चुके हैं (तद्भव)। इनमें हल्का-सा ध्वनि-परिवर्तन हुआ है, पर मूल शब्द अब भी पहचाना जा सकता है।

तत्समअर्धतत्समतद्भव
वत्सबच्छाबच्चा
अग्निअगिनआग
कार्यकारजकाज
धर्मधरम
कर्मकरम

ध्यान दें: कुछ ग्रंथों में अर्धतत्सम शब्दों को ही प्राकृत अथवा अपभ्रंश की अवस्था का शब्द माना गया है — यानी संस्कृत से तद्भव बनने के मध्यवर्ती पड़ाव के शब्द।

ध्वनि-परिवर्तन के प्रमुख नियम

तद्भव शब्द यूँ ही मनमाने ढंग से नहीं बनते — इनके पीछे कुछ निश्चित ध्वनि-परिवर्तन के नियम काम करते हैं। इन नियमों को समझ लेने पर किसी भी अपरिचित तत्सम-तद्भव युग्म को भी आसानी से पहचाना जा सकता है।

नियमपरिवर्तनउदाहरण
अनुनासिकता (चंद्रबिंदु) का जुड़नास्वर के बाद व्यंजन-लोप होकर नासिक्य ध्वनि आनाअक्षि → आँख, अश्रु → आँसू, दन्त → दाँत
संयुक्त व्यंजन का सरलीकरणजटिल संयुक्ताक्षर टूटकर सरल हो जानादुग्ध → दूध, सर्प → साँप, अष्ट → आठ
महाप्राण का अल्पप्राण में बदलनाध्वनि उच्चारण में सरलता आनामुख → मुँह, गृह → घर
स्वर-दीर्घीकरणह्रस्व स्वर का दीर्घ हो जानाअद्य → आज, कर्ण → कान
स्वरागम (स्वर जोड़ना)उच्चारण सुगम बनाने हेतु बीच में स्वर जुड़नाधर्म → धरम, कर्म → करम
ऊष्म/संयुक्त ध्वनि का लोपक्ष जैसी संयुक्त ध्वनि का सरलीकरणक्षेत्र → खेत, क्षीर → खीर

तत्सम और तद्भव शब्दों में अंतर

आधार तत्सम तद्भव
अर्थ संस्कृत से यथावत ग्रहण किए गए शब्द संस्कृत से विकसित होकर बदले हुए शब्द
रूप मूल रूप सुरक्षित रहता है ध्वनि एवं रूप में परिवर्तन होता है
उच्चारण संस्कृत के समान, अपेक्षाकृत कठिन सरल एवं बोलचाल के अनुरूप
यात्रा सीधे संस्कृत से हिंदी में संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → हिंदी
प्रयोग साहित्य, प्रशासन एवं औपचारिक भाषा सामान्य बोलचाल एवं लोकभाषा

तत्सम और तद्भव शब्दों की पहचान कैसे करें?

तत्सम और तद्भव शब्दों की पहचान करना प्रारंभ में कठिन लग सकता है, किंतु कुछ सामान्य नियमों को समझ लेने पर इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। ध्यान रखें कि ये नियम सभी शब्दों पर समान रूप से लागू नहीं होते, फिर भी अधिकांश शब्दों की पहचान में सहायक होते हैं।

1. संस्कृत का मूल रूप सुरक्षित हो तो तत्सम

यदि किसी शब्द का रूप संस्कृत के समान ही बना हुआ है, तो वह सामान्यतः तत्सम शब्द होता है। जैसे — अग्नि, कर्ण, दन्त, हस्त।

2. उच्चारण सरल हो जाए तो तद्भव

समय के साथ बोलचाल में कठिन ध्वनियाँ सरल हो जाती हैं। ऐसे परिवर्तित रूप प्रायः तद्भव शब्द होते हैं। जैसे — अक्षि → आँख, दुग्ध → दूध, मुख → मुँह, ग्राम → गाँव।

3. संयुक्त व्यंजन टूट जाएँ तो तद्भव बनने की संभावना

संस्कृत के संयुक्त व्यंजन बोलचाल में सरल होकर बदल जाते हैं — दुग्ध → दूध, अक्षि → आँख, सर्प → साँप।

4. सभी बदले हुए शब्द तद्भव नहीं होते

यह आवश्यक नहीं कि हर परिवर्तित शब्द तद्भव ही हो। हिंदी में विदेशी भाषाओं तथा देशज स्रोतों से आए अनेक शब्द भी प्रचलित हैं, जिनका संस्कृत से कोई संबंध नहीं। इसलिए किसी शब्द को तद्भव मानने से पहले उसके संस्कृत मूल का ज्ञान होना आवश्यक है — अगला भाग इसी अंतर को स्पष्ट करता है।

देशज और विदेशी (आगत) शब्दों से अंतर — एक सामान्य भ्रम

परीक्षाओं में अक्सर एक शब्द देकर पूछा जाता है कि वह तत्सम है, तद्भव है, या किसी अन्य वर्ग का — इसलिए तत्सम-तद्भव को इनके दो 'पड़ोसी' वर्गों से अलग पहचानना भी उतना ही ज़रूरी है।

देशज शब्द

वे शब्द जो न तो संस्कृत से आए हैं, न किसी विदेशी भाषा से — बल्कि स्थानीय बोलियों व लोकभाषा में स्वतः विकसित हुए हैं, देशज शब्द कहलाते हैं। जैसे — लोटा, खिड़की, ठेठ, पगड़ी, झाड़ू, डिबिया।

विदेशी (आगत) शब्द

अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पुर्तगाली, अंग्रेज़ी आदि विदेशी भाषाओं से हिंदी में आए शब्द विदेशी या आगत शब्द कहलाते हैं। जैसे — किताब, कुर्सी (अरबी-फ़ारसी), स्कूल, स्टेशन (अंग्रेज़ी), आलपिन, गिरजा (पुर्तगाली)।

याद रखने की तरकीब: यदि किसी शब्द का कोई प्रामाणिक संस्कृत मूल शब्द मिलता है, तो वह तत्सम/तद्भव/अर्धतत्सम के दायरे में आएगा। यदि संस्कृत मूल नहीं मिलता और शब्द किसी विदेशी भाषा से पहचाना जाए, तो वह विदेशी शब्द है। यदि न संस्कृत मूल मिले, न विदेशी भाषा से संबंध — तो वह देशज शब्द है।

तत्सम और तद्भव शब्दों के उदाहरण

तत्सम तद्भव
अग्निआग
अक्षिआँख
कर्णकान
दन्तदाँत
हस्तहाथ
मुखमुँह
दुग्धदूध
ग्रामगाँव
निद्रानींद
सर्पसाँप
जिह्वाजीभ
अश्रुआँसू
चर्मचाम
मातृमाँ
पितृबाप
भ्रातृभाई
भगिनीबहन
सूर्यसूरज
क्षेत्रखेत
कार्यकाज
ध्यान दें: किसी शब्द का तत्सम–तद्भव संबंध स्थापित करने के लिए मान्य हिंदी व्याकरण एवं व्युत्पत्ति (Etymology) के स्रोतों का अनुसरण करना चाहिए। केवल उच्चारण के आधार पर निर्णय करना हमेशा उचित नहीं होता।

तत्सम और तद्भव शब्दों की विशेषताएँ

तत्सम शब्दों की विशेषताएँ

  • संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में ग्रहण किए जाते हैं।
  • इनका रूप, वर्तनी और उच्चारण मूल संस्कृत के समान रहता है।
  • इनका प्रयोग साहित्य, प्रशासन, धार्मिक ग्रंथों तथा औपचारिक भाषा में अधिक होता है।
  • ये भाषा को गंभीर, शुद्ध और परिष्कृत स्वरूप प्रदान करते हैं।

तद्भव शब्दों की विशेषताएँ

  • संस्कृत शब्दों से ध्वनि एवं रूप परिवर्तन के बाद विकसित होते हैं।
  • इनका उच्चारण सरल और बोलचाल के अनुकूल होता है।
  • इनका प्रयोग दैनिक जीवन तथा सामान्य बातचीत में अधिक किया जाता है।
  • ये भाषा को सहज, स्वाभाविक और जनसामान्य के निकट बनाते हैं।

तत्सम और तद्भव शब्दों का महत्व

हिंदी भाषा के विकास को समझने में तत्सम और तद्भव शब्दों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके अध्ययन से न केवल शब्दों की उत्पत्ति का ज्ञान होता है, बल्कि भाषा की ऐतिहासिक यात्रा का भी परिचय मिलता है।

  • हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास को समझने में सहायता मिलती है।
  • शब्दों की शुद्ध पहचान करने की क्षमता विकसित होती है।
  • शुद्ध लेखन एवं सही शब्द-प्रयोग में सहायता मिलती है।
  • प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
  • शब्द-भंडार (Vocabulary) समृद्ध होता है।

तत्सम और तद्भव से जुड़े सामान्य भ्रम

  • प्रत्येक कठिन शब्द तत्सम नहीं होता।
  • प्रत्येक सरल शब्द तद्भव नहीं होता।
  • सभी संस्कृत शब्दों के तद्भव रूप प्रचलित नहीं हैं।
  • विदेशी भाषाओं से आए शब्द न तो तत्सम होते हैं और न ही तद्भव।
  • देशज शब्दों का संस्कृत से कोई सीधा संबंध नहीं होता, इसलिए इन्हें तद्भव मान लेना भूल है।

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. तत्सम शब्द किसे कहते हैं?
  2. तद्भव शब्द किसे कहते हैं?
  3. अर्धतत्सम शब्द किसे कहते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
  4. तत्सम और तद्भव में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  5. तत्सम, तद्भव, देशज तथा विदेशी शब्दों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  6. तत्सम एवं तद्भव शब्दों के दस-दस उदाहरण लिखिए।
  7. निम्नलिखित शब्दों के तद्भव रूप लिखिए — क्षेत्र, कार्य, धर्म, सूर्य।

निष्कर्ष

तत्सम और तद्भव शब्द हिंदी व्याकरण के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। तत्सम शब्द संस्कृत के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हैं, जबकि तद्भव शब्द समय के साथ ध्वनि एवं रूप परिवर्तन के परिणामस्वरूप विकसित होते हैं। इनके बीच अर्धतत्सम शब्द एक सेतु का काम करते हैं, और देशज-विदेशी शब्दों से इनका अंतर समझना पहचान को और पुख्ता बनाता है। विद्यालयी शिक्षा से लेकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं तक इस विषय का विशेष महत्व है, इसलिए इसकी परिभाषा, अंतर, पहचान के नियम तथा प्रमुख उदाहरणों का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

यह भी पढ़ें

तत्सम और तद्भव शब्दों की वर्णक्रमानुसार सूची

क्रमतत्समतद्भव
1अग्निआग
2अङ्गुष्ठअँगूठा
3अक्षिआँख
4अट्टालिकाअटारी
5अद्यआज
6अन्धअँधा
7अन्धकारअँधेरा
8अमृतअमिय
9अमूल्यअनमोल
10अर्धआधा
11अश्रुआँसू
12अष्टआठ
13आम्रआम
14आश्रयआसरा
15इक्षुईख
16उष्ट्रऊँट
17ओष्ठओंठ
18कंकणकंगन
19कज्जलकाजल
20कटुकड़वा
21कर्णकान
22कपोतकबूतर
23कार्तिककातिक
24काष्ठकाठ
25कुम्भकारकुम्हार
26क्षेत्रखेत
27क्षीरखीर
28गर्दभगधा
29ग्रामगाँव
30गृहघर
31घृतघी
32चतुर्थचौथा
33चर्मचाम
34जिह्वाजीभ
35ज्येष्ठजेठ
36दन्तदाँत
37दक्षिणदाहिना
38दुग्धदूध
39धर्मधरम
40धैर्यधीरज
41नखनाखून
42निद्रानींद
43पंक्तिपाँत
44पादपाँव
45पर्यङ्कपलंग
46मक्षिकामक्खी
47मुखमुँह
48रात्रिरात
49शतसौ
50शुष्कसूखा
51श्रेष्ठसेठ
52श्वाससाँस
53सप्तसात
54सर्पसाँप
55सूचिसुई
56सूर्यसूरज
57हस्तहाथ
58हृदयहिय
59कार्यकाज
60कर्मकरम

तत्सम और तद्भव शब्दों से संबंधित FAQs

तत्सम शब्द किसे कहते हैं?

जो शब्द संस्कृत से बिना किसी ध्वनि या रूप परिवर्तन के सीधे हिंदी में ग्रहण किए गए हैं, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं। जैसे— अग्नि, दन्त, कर्ण, ग्राम, हस्त आदि।

तद्भव शब्द किसे कहते हैं?

जो शब्द संस्कृत के मूल शब्दों से ध्वनि एवं रूप परिवर्तन के बाद हिंदी में विकसित हुए हैं, उन्हें तद्भव शब्द कहते हैं। जैसे— आग, दाँत, कान, गाँव, हाथ आदि।

अर्धतत्सम शब्द किसे कहते हैं?

वे शब्द जो तत्सम से तद्भव बनने की यात्रा के बीच के पड़ाव पर हैं — पूर्णतः तत्सम भी नहीं और पूर्णतः तद्भव भी नहीं — उन्हें अर्धतत्सम शब्द कहते हैं। जैसे— अग्नि → अगिन (अर्धतत्सम) → आग (तद्भव)।

तत्सम-तद्भव और देशज-विदेशी शब्दों में क्या अंतर है?

तत्सम-तद्भव का सीधा संबंध संस्कृत भाषा से होता है। देशज शब्दों का संस्कृत या किसी विदेशी भाषा से कोई संबंध नहीं होता, ये स्थानीय बोलियों में विकसित हुए हैं। विदेशी (आगत) शब्द अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं से हिंदी में आए हैं।

तत्सम और तद्भव में मुख्य अंतर क्या है?

तत्सम शब्द अपने मूल संस्कृत रूप में प्रयुक्त होते हैं, जबकि तद्भव शब्द समय के साथ ध्वनि एवं रूप परिवर्तन के कारण नए रूप में प्रचलित हो जाते हैं।

क्या प्रतियोगी परीक्षाओं में तत्सम और तद्भव शब्दों से प्रश्न पूछे जाते हैं?

हाँ। UGC NET, CTET, TGT, PGT, LT Grade, SSC, Railway तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इस विषय से नियमित प्रश्न पूछे जाते हैं, अक्सर देशज-विदेशी शब्दों के साथ इनका अंतर पूछकर भी।


संक्षेप में

  • तत्सम शब्द संस्कृत से बिना परिवर्तन के ग्रहण किए जाते हैं।
  • तद्भव शब्द संस्कृत से विकसित होकर परिवर्तित रूप में प्रचलित होते हैं।
  • अर्धतत्सम शब्द इन दोनों के बीच की अवस्था के शब्द हैं।
  • देशज और विदेशी शब्दों का संस्कृत से सीधा संबंध नहीं होता।
  • दोनों प्रकार के शब्द हिंदी भाषा को समृद्ध बनाते हैं।

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