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हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग-'भक्तिकाल': पूर्ण परिचय, प्रमुख कवि, काव्यधाराएँ एवं संपूर्ण अध्ययन

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का वह कालखंड है जिसे स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने "स्वर्ण युग" कहा है — वह समय जब निर्गुण संत कवियों से लेकर सगुण राम व कृष्ण भक्त कवियों तक, हिंदी साहित्य ने अपनी सर्वाधिक समृद्ध एवं विविधतापूर्ण काव्य-परंपरा रची। हमारे पिछले लेख "हिंदी साहित्य का आदिकाल" में हमने आदिकाल की सिद्ध, नाथ, जैन एवं रासो परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की थी — इस लेख में हम उसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए भक्तिकाल की चार प्रमुख काव्यधाराओं, उनके कवियों और रचनाओं पर विस्तृत रूप से बात करेंगे।

संक्षेप में: भक्तिकाल (लगभग सं. 1375–1700, यानी 1318–1643 ई.) हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है, जिसे मुख्यतः चार शाखाओं में बाँटा जाता है — निर्गुण भक्ति (ज्ञानाश्रयी संत काव्य व प्रेमाश्रयी सूफी काव्य) तथा सगुण भक्ति (रामाश्रयी व कृष्णाश्रयी काव्यधाराएँ)। कबीर, जायसी, तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई इस काल के सर्वाधिक प्रतिनिधि कवि हैं।

भक्तिकाल क्या है? (परिचय एवं काल-सीमा)

भक्तिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का वह कालखंड है जो लगभग सं. 1375 से सं. 1700 (1318–1643 ई.) तक फैला माना जाता है — अर्थात हमारे पिछले लेख में चर्चा किए गए आदिकाल के तुरंत बाद का समय। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल को "स्वर्ण युग" कहा। बाद के अनेक इतिहासकारों ने भी इस मूल्यांकन को स्वीकार किया है, यद्यपि साहित्य-इतिहास की कुछ व्याख्याओं में भिन्न दृष्टिकोण भी मिलते हैं — ठीक वैसे ही जैसे आदिकाल के नामकरण को लेकर भी विद्वानों में मतभेद रहे हैं (इस बहस के लिए "हिंदी साहित्य का काल-विभाजन एवं नामकरण" पोस्ट देखें)।

भक्तिकाल की चार काव्यधाराएँ (चित्र में)

भक्तिकाल निर्गुण भक्ति सगुण भक्ति ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य) कबीर • नानक • रैदास प्रेमाश्रयी शाखा (सूफ़ी काव्य) मलिक मुहम्मद जायसी रामाश्रयी शाखा (राम-भक्ति) तुलसीदास कृष्णाश्रयी शाखा (कृष्ण-भक्ति) सूरदास • रसखान • मीराबाई

चित्र से स्पष्ट है कि भक्तिकाल की संपूर्ण काव्यधारा दो प्रमुख प्रवृत्तियों—निर्गुण और सगुण—में विभाजित है। इन दोनों धाराओं की अपनी-अपनी शाखाएँ, प्रमुख कवि और साहित्यिक विशेषताएँ हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है।

भक्तिकाल की ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि

भक्ति आंदोलन का उद्गम मूलतः दक्षिण भारत में हुआ, जहाँ छठी से नौवीं शताब्दी के बीच आलवार (वैष्णव) व नयनार (शैव) संतों ने तमिल भाषा में भक्ति-काव्य की रचना की। यह आंदोलन आगे चलकर रामानुजाचार्य, रामानंद तथा वल्लभाचार्य जैसे आचार्यों के माध्यम से उत्तर भारत में फैला और हिंदी क्षेत्र में अपने चरम पर पहुँचा।

सामाजिक दृष्टि से यह काल इस्लामी सत्ता की स्थापना के बाद का है, जब हिंदू समाज जाति-भेद, धार्मिक कट्टरता तथा कर्मकांड की जटिलताओं से जूझ रहा था। भक्ति आंदोलन ने इन्हीं रूढ़ियों के विरुद्ध सरल, समतामूलक तथा प्रेम-प्रधान भक्ति-मार्ग प्रस्तुत किया। साथ ही, सूफी संतों की सहिष्णु, प्रेम-प्रधान परंपरा ने भी हिंदी काव्य को गहराई से प्रभावित किया — यही कारण है कि निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य) इसी काल में विकसित हुई। रामानंद को परंपरागत रूप से दोनों धाराओं — निर्गुण (कबीर के गुरु के रूप में) तथा सगुण रामाश्रयी — से जोड़कर देखा जाता है, जबकि वल्लभाचार्य ने कृष्णाश्रयी शाखा की नींव रखी।

निर्गुण भक्ति धारा — ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य)

ज्ञानाश्रयी शाखा के संत कवि निर्गुण, निराकार ब्रह्म की उपासना करते थे। इनकी रचनाओं में गुरु की महिमा, जाति-पांति व मूर्तिपूजा जैसी बाह्याडंबरों का खंडन, तथा हिंदू-मुस्लिम — दोनों धर्मों की रूढ़ियों पर समान रूप से कड़ा प्रहार मिलता है। इनकी भाषा को "सधुक्कड़ी" या "पंचमेल खिचड़ी" भाषा कहा जाता है, क्योंकि इसमें विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के शब्द घुले-मिले हैं।

प्रमुख संत कवि इस प्रकार हैं:

  • कबीरदास (लगभग 1398–1518 ई., तिथियाँ विवादित) — निर्गुण संत काव्य के सर्वाधिक प्रतिनिधि कवि; परंपरा के अनुसार स्वामी रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। इनकी रचनाओं का संकलन "बीजक" कहलाता है, जो साखी, सबद व रमैनी — तीन भागों में विभक्त है। कबीर की "उलटबांसी" शैली (विरोधाभासी प्रतीकों से गूढ़ अर्थ प्रकट करना) सिद्ध साहित्य की परंपरा से प्रभावित मानी जाती है।
  • गुरु नानक देव (1469–1539 ई.) — सिख धर्म के संस्थापक; "एक ओंकार" के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उनकी वाणी "गुरु ग्रंथ साहिब" में संकलित है, जिसमें "जपुजी साहिब" सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है।
  • रैदास (रविदास) — कबीर के समकालीन माने जाते हैं; चर्मकार जाति से थे, और उनके भक्ति-पदों में जाति-भेद के विरुद्ध गहरा समता-भाव मिलता है।
  • दादू दयाल (1544–1603 ई.) — दादूपंथ के संस्थापक; रचना-संकलन "दादू वाणी" के नाम से जाना जाता है।
  • अन्य प्रमुख संत कवि — मलूकदास, सुंदरदास, धर्मदास।

निर्गुण भक्ति धारा — प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य)

प्रेमाश्रयी शाखा के कवि सूफी परंपरा से जुड़े मुस्लिम कवि थे, जिन्होंने फ़ारसी की मसनवी शैली से प्रभावित होकर अवधी भाषा में प्रेमाख्यानक (प्रेम-कथा प्रधान) महाकाव्यों की रचना की। इन काव्यों की विशेषता यह है कि लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से आध्यात्मिक/अलौकिक प्रेम का प्रतीकात्मक चित्रण किया जाता है — नायिका का सौंदर्य वस्तुतः ब्रह्म-सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है।

प्रमुख सूफी कवि इस प्रकार हैं:

  • मलिक मुहम्मद जायसी (लगभग 1492–1542 ई.) — इस शाखा के सर्वाधिक प्रतिनिधि कवि; उनकी कालजयी रचना "पद्मावत" 947 हिजरी (1540 ई.) में अवधी भाषा में, दोहा-चौपाई शैली में रची गई। इसमें चित्तौड़ के राजा रत्नसेन तथा सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेम-कथा है, जिसका अंत अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण के प्रसंग से होता है। जायसी की अन्य रचनाओं में "अखरावट" तथा "आखिरी कलाम" शामिल हैं।
  • कुतुबन — रचना "मृगावती" (लगभग 1503 ई.)।
  • मंझन — रचना "मधुमालती" (लगभग 1545 ई.)।
  • उसमान — रचना "चित्रावली" (लगभग 1613 ई.)।

सगुण भक्ति धारा — रामाश्रयी शाखा

रामाश्रयी शाखा के कवि सगुण ब्रह्म — अर्थात मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम — की उपासना करते थे, जिसमें दास्य भाव (स्वयं को ईश्वर का दास मानने का भाव) प्रधान है।

गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623 ई.) इस शाखा के सर्वोपरि तथा हिंदी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कवि माने जाते हैं। उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना "रामचरितमानस" अवधी भाषा में, दोहा-चौपाई शैली में तथा सात कांडों में विभक्त है। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल तथा हनुमान चालीसा शामिल हैं। रामाश्रयी शाखा के अन्य उल्लेखनीय कवियों में अग्रदास तथा नाभादास (जिनकी रचना "भक्तमाल" में अनेक भक्तों का जीवन-परिचय संकलित है) आते हैं।

सगुण भक्ति धारा — कृष्णाश्रयी शाखा

कृष्णाश्रयी शाखा के कवि सगुण ब्रह्म के कृष्ण-स्वरूप की उपासना करते थे, जिसमें वात्सल्य (कृष्ण की बाल-लीलाओं के प्रति स्नेह-भाव) तथा शृंगार (राधा-कृष्ण प्रेम) रस प्रधान हैं। इस शाखा की धार्मिक नींव वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग ने रखी, और उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने आठ प्रमुख कृष्णभक्त कवियों को मिलाकर "अष्टछाप" की स्थापना की।

प्रमुख कृष्णभक्त कवि इस प्रकार हैं:

  • सूरदास (लगभग 1478–1583 ई.) — अष्टछाप के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कवि; उनकी विशाल रचना "सूरसागर" कृष्ण की बाल-लीलाओं के वात्सल्य-चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। अन्य रचनाएँ — सूरसारावली, साहित्य-लहरी।
  • अष्टछाप के आठ कवि — सूरदास, कुम्भनदास, परमानंददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास तथा नंददास।
  • मीराबाई (लगभग 1498–1546 ई.) — राजस्थानी राजघराने की कृष्णभक्त कवयित्री; उनके पद राजस्थानी-ब्रज मिश्रित भाषा में हैं, और इनमें प्रेम-लक्षणा (माधुर्य) भक्ति-भाव प्रधान है, जिसमें वे स्वयं को कृष्ण की प्रेयसी के रूप में देखती हैं।
  • रसखान — एक मुस्लिम कृष्णभक्त कवि; रचनाएँ "सुजान रसखान" तथा "प्रेमवाटिका"।

भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएँ (सारांश)

  • निर्गुण व सगुण — दोनों प्रकार की भक्ति-काव्यधाराएँ समानांतर रूप से अपने चरम पर विकसित हुईं।
  • भाषा-प्रयोग विविधतापूर्ण रहा — संत काव्य की सधुक्कड़ी भाषा, सूफी काव्य की अवधी, रामाश्रयी की अवधी, तथा कृष्णाश्रयी की ब्रजभाषा।
  • भक्ति आंदोलन ने जाति-पांति, धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक भेदभाव पर गहरी चोट की।
  • सूफी काव्य के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय की भावना प्रबल हुई।
  • दोहा, चौपाई तथा पद जैसे गेय व लोक-प्रचलित छंदों का व्यापक प्रयोग हुआ।
  • आचार्य शुक्ल ने काव्य की गुणवत्ता व मात्रा — दोनों दृष्टि से इसे हिंदी साहित्य का "स्वर्ण युग" कहा।

महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)

  • भक्तिकाल का समय सं. 1375–1700 (1318–1643 ई.) माना जाता है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल को "स्वर्ण युग" कहा।
  • कबीर के गुरु परंपरा के अनुसार स्वामी रामानंद माने जाते हैं।
  • कबीर की रचना "बीजक" साखी, सबद व रमैनी — तीन भागों में विभक्त है।
  • गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक थे; प्रमुख रचना "जपुजी साहिब"।
  • जायसी की "पद्मावत" 1540 ई. में अवधी भाषा में रची गई।
  • तुलसीदास की "रामचरितमानस" अवधी भाषा में, सात कांडों में विभक्त है।
  • सूरदास अष्टछाप के प्रमुख कवि थे; प्रसिद्ध रचना "सूरसागर"।
  • अष्टछाप की स्थापना वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने की थी।
  • मीराबाई राजस्थानी राजघराने की कृष्णभक्त कवयित्री थीं।
  • रसखान एक मुस्लिम कृष्णभक्त कवि थे।

अभ्यास प्रश्न

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

(उत्तर लेख के अंत में दिए गए हैं)

  1. भक्तिकाल को "स्वर्ण युग" किसने कहा?
    (क) हजारीप्रसाद द्विवेदी (ख) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (ग) डॉ. नगेंद्र (घ) राहुल सांकृत्यायन
  2. कबीरदास के गुरु किसे माना जाता है?
    (क) गोरखनाथ (ख) रामानंद (ग) वल्लभाचार्य (घ) रामानुज
  3. "बीजक" किसकी रचना है?
    (क) रैदास (ख) कबीरदास (ग) दादू दयाल (घ) गुरु नानक
  4. "पद्मावत" के रचयिता कौन हैं?
    (क) कुतुबन (ख) मंझन (ग) मलिक मुहम्मद जायसी (घ) उसमान
  5. "पद्मावत" में किस राजा और राजकुमारी की प्रेम-कथा है?
    (क) रत्नसेन-पद्मावती (ख) पृथ्वीराज-संयोगिता (ग) दुष्यंत-शकुंतला (घ) उदल-रेशमा
  6. रामचरितमानस किस भाषा में रचित है?
    (क) ब्रजभाषा (ख) अवधी (ग) मैथिली (घ) राजस्थानी
  7. अष्टछाप की स्थापना किसने की?
    (क) वल्लभाचार्य (ख) विट्ठलनाथ (ग) सूरदास (घ) चैतन्य महाप्रभु
  8. "सूरसागर" किसकी रचना है?
    (क) तुलसीदास (ख) सूरदास (ग) नंददास (घ) रसखान
  9. मीराबाई किस भक्ति-भाव से जुड़ी हैं?
    (क) दास्य भाव (ख) प्रेम-लक्षणा (माधुर्य) भाव (ग) सख्य भाव (घ) शांत भाव
  10. रसखान किस धर्म से जुड़े कृष्णभक्त कवि थे?
    (क) हिंदू (ख) सिख (ग) मुस्लिम (घ) जैन
  11. "भक्तमाल" के रचयिता कौन हैं?
    (क) अग्रदास (ख) नाभादास (ग) तुलसीदास (घ) रैदास
  12. वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित भक्ति-मार्ग को क्या कहा जाता है?
    (क) संतमत (ख) पुष्टिमार्ग (ग) दादूपंथ (घ) निर्गुण मार्ग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भक्तिकाल किसे कहते हैं?

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का वह कालखंड है, जो लगभग सं. 1375 से सं. 1700 (1318–1643 ई.) तक फैला माना जाता है, तथा जिसमें निर्गुण व सगुण — दोनों प्रकार की भक्ति-काव्यधाराएँ अपने चरम पर रचित हुईं।

2. भक्तिकाल को "स्वर्ण युग" क्यों कहा जाता है?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल को इसकी काव्य-गुणवत्ता, विविधता तथा प्रचुरता के कारण "स्वर्ण युग" कहा, क्योंकि इस काल में हिंदी साहित्य के कुछ सर्वश्रेष्ठ कवि — कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, जायसी — एक साथ सक्रिय थे।

3. भक्तिकाल की चार प्रमुख काव्यधाराएँ कौन-सी हैं?

निर्गुण भक्ति की दो शाखाएँ — ज्ञानाश्रयी (संत काव्य) व प्रेमाश्रयी (सूफी काव्य) — तथा सगुण भक्ति की दो शाखाएँ — रामाश्रयी व कृष्णाश्रयी।

4. कबीरदास किस काव्यधारा से जुड़े हैं?

कबीरदास निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य) के प्रमुख कवि हैं।

5. रामचरितमानस के रचयिता कौन हैं, और यह किस भाषा में लिखी गई?

रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं, और यह अवधी भाषा में दोहा-चौपाई शैली में रचित है।

6. सूरदास किस भाव-प्रधान काव्य के लिए प्रसिद्ध हैं?

सूरदास मुख्यतः वात्सल्य रस (कृष्ण की बाल-लीलाओं) तथा शृंगार रस के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसका सर्वोत्तम उदाहरण उनकी रचना "सूरसागर" है।

7. सूफी प्रेमाख्यान काव्य की क्या विशेषता है?

सूफी प्रेमाख्यान काव्य में लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से आध्यात्मिक/अलौकिक प्रेम का प्रतीकात्मक चित्रण किया जाता है — जैसे जायसी के "पद्मावत" में पद्मावती का सौंदर्य वस्तुतः ब्रह्म-सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है।

8. मीराबाई की भक्ति किस प्रकार की मानी जाती है?

मीराबाई की भक्ति प्रेम-लक्षणा (माधुर्य) भाव की कृष्ण-भक्ति मानी जाती है, जिसमें वे स्वयं को कृष्ण की प्रेयसी के रूप में देखती हैं।

9. अष्टछाप क्या है?

अष्टछाप वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित आठ कृष्णभक्त कवियों का समूह है, जिसमें सूरदास सबसे प्रमुख कवि माने जाते हैं।

10. भक्ति आंदोलन का उद्गम कहाँ से माना जाता है?

भक्ति आंदोलन का उद्गम दक्षिण भारत में आलवार व नयनार संतों की परंपरा से माना जाता है, जो रामानुज व रामानंद जैसे आचार्यों के माध्यम से उत्तर भारत में फैला।

उत्तर कुंजी (MCQ)

1. (ख) 2. (ख) 3. (ख) 4. (ग) 5. (क) 6. (ख) 7. (ख) 8. (ख) 9. (ख) 10. (ग) 11. (ख) 12. (ख)

संबंधित लेख

संदर्भ

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  2. हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
  3. हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास — डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
  4. हिंदी साहित्य का इतिहास (सम्पादित) — डॉ. नगेंद्र

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