आदिकाल हिंदी साहित्य का सबसे पहला कालखंड है — वह समय जब अपभ्रंश धीरे-धीरे प्रारंभिक हिंदी में बदल रही थी, और साहित्य कई अलग-अलग धाराओं (सिद्ध, नाथ, जैन, रासो, तथा फुटकल कवियों) में एक साथ लिखा जा रहा था। हमारे पिछले लेख "हिंदी साहित्य का काल-विभाजन एवं नामकरण" में हमने देखा था कि इस काल को लेकर विद्वानों में कितने नामकरण-विवाद हैं — इस लेख में हम उस पृष्ठभूमि को दोहराए बिना सीधे आदिकाल की भाषा, प्रमुख काव्यधाराओं, कवियों और उनकी रचनाओं पर विस्तार से बात करेंगे।
संक्षेप में: आदिकाल (लगभग सं. 1050–1375, यानी 993–1318 ई.) हिंदी साहित्य का प्रारंभिक कालखंड है, जिसमें मुख्यतः पाँच काव्यधाराएँ मिलती हैं — सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य, रासो/चारण साहित्य, तथा विद्यापति व अमीर खुसरो जैसे फुटकल कवियों की रचनाएँ। भाषा की दृष्टि से यह अपभ्रंश से प्रारंभिक हिंदी में संक्रमण का काल है।
आदिकाल क्या है? (परिचय एवं काल-सीमा)
आदिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का वह प्रारंभिक कालखंड है जो लगभग सं. 1050 से सं. 1375 (993–1318 ई.) तक फैला माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे "वीरगाथा काल" कहा था, जबकि हजारीप्रसाद द्विवेदी के दिए नाम "आदिकाल" को आज सबसे अधिक स्वीकृति प्राप्त है — इसी वजह से हम भी इस शृंखला में इसे "आदिकाल" कहकर पुकार रहे हैं। इस काल के नामकरण, काल-सीमा तथा विद्वानों के मतभेदों पर हमने "हिंदी साहित्य का काल-विभाजन एवं नामकरण" पोस्ट में विस्तार से चर्चा की है — यदि वह पूरी बहस समझनी हो तो वहाँ ज़रूर पढ़ें।
आदिकाल की भाषा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आदिकाल भाषिक दृष्टि से एक संक्रमण-काल है — इसी दौरान प्राकृत की अंतिम अवस्था अपभ्रंश धीरे-धीरे अपने अंतिम रूप अवहट्ट से होते हुए प्रारंभिक हिंदी में बदल रही थी। इसी काल में मैथिली, ब्रज, अवधी, राजस्थानी जैसी हिंदी की विभाषाएँ भी अपना स्वतंत्र रूप लेने लगी थीं — यही कारण है कि आदिकाल का साहित्य एक भाषा में नहीं, बल्कि अपभ्रंश, अवहट्ट, मैथिली, राजस्थानी-मिश्रित डिंगल तथा फ़ारसी-मिश्रित खड़ी बोली — कई भाषा-रूपों में मिलता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह राजपूत रजवाड़ों के आपसी संघर्ष तथा उत्तर भारत में मुस्लिम सत्ता की स्थापना का काल था। यही सामंती-युद्धरत वातावरण आगे चलकर वीर रस-प्रधान रासो-काव्य को जन्म देता है, जबकि इसी काल में बौद्ध व नाथ योगियों की धार्मिक-साधनात्मक परंपरा तथा जैन साधुओं का शिक्षाप्रद कथा-साहित्य भी समानांतर रूप से फल-फूल रहा था।
सिद्ध साहित्य
सिद्ध साहित्य का संबंध बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा से है। सातवीं-आठवीं शताब्दी में उभरे इन सिद्ध साधक-कवियों की संख्या परंपरा के अनुसार चौरासी (84) मानी जाती है, जिन्हें पाल वंश के शासकों का आश्रय प्राप्त था। राहुल सांकृत्यायन ने इनमें से दस सिद्धों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना है, जिनमें सरहपा सबसे प्रमुख हैं।
प्रमुख सिद्ध कवि इस प्रकार हैं:
- सरहपा (लगभग 769 ई.) — इन्हें "सरोजवज्र" भी कहा जाता है और सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि माना जाता है। इनकी प्रसिद्ध रचना "दोहाकोश" है।
- लुइपा (लगभग 773 ई.) — चौरासी सिद्धों में इनका स्थान सबसे ऊँचा माना जाता है; रचना "लुइपादगीतिका"।
- शबरपा (लगभग 780 ई.) — सरहपा के शिष्य; प्रसिद्ध रचना "चर्यापद" तथा "महामुद्रावज्रगीति"।
- कण्हपा (लगभग 820 ई.) — राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में "पांडित्य और कवित्व में बेजोड़"; रचना "चर्याचर्यविनिश्चय"।
- डोम्भिपा (लगभग 840 ई.) — रचना "डोम्बिगीतिका"।
सिद्धों की रचनाएँ मुख्यतः दो काव्य-रूपों — दोहा और चर्यापद — में मिलती हैं। इनकी भाषा को विद्वानों ने "संधा भाषा" या "संध्याभाषा" नाम दिया है, जिसका अर्थ है ऐसी भाषा जिसमें संध्या के समान प्रकाश और अंधकार दोनों मिश्रित हों — अर्थात ऊपरी तौर पर सामान्य लगने वाले शब्दों के भीतर गूढ़ साधनात्मक अर्थ छिपा होता है। सिद्धों ने अपनी रचनाओं में वेद, उपनिषद तथा यज्ञ जैसी रूढ़ धार्मिक परंपराओं का खुला विरोध किया, और अपभ्रंश के स्थान पर आम बोलचाल की देशभाषा को अपनाया। इनकी यह "उलट-बांसी" शैली आगे चलकर भक्तिकाल में कबीर जैसे संत कवियों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
नाथ साहित्य
नाथ साहित्य का मूल भी सिद्ध साहित्य की तरह बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा से जुड़ा माना जाता है, किंतु यह आगे चलकर एक स्वतंत्र योग-साधना परंपरा — नाथ संप्रदाय — के रूप में विकसित हुआ। इस संप्रदाय में नौ प्रमुख नाथों ("नवनाथ") की मान्यता है, जिनमें मत्स्येंद्रनाथ को आदि गुरु और गोरखनाथ को इस साहित्य-परंपरा का सबसे प्रतिष्ठित प्रवर्तक माना जाता है। गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य थे।
गोरखनाथ ने हठयोग का उपदेश दिया — जिसमें "ह" का अर्थ सूर्य और "ठ" का अर्थ चंद्रमा बताया जाता है, और जिसका लक्ष्य शरीर व मन की शुद्धि के माध्यम से आंतरिक चेतना को जाग्रत करना था। उनकी रचनाओं का संकलन "गोरखबानी" नाम से हुआ है, तथा गोरख-शतक, सिद्ध सिद्धांत पद्धति, विवेक मार्तंड जैसी अन्य रचनाएँ भी उनसे जुड़ी मानी जाती हैं। इन रचनाओं में गुरु-महिमा, इंद्रिय-निग्रह, प्राण-साधना, वैराग्य तथा कुंडलिनी-जागरण जैसे विषयों का वर्णन मिलता है। नाथों की साधुक्कड़ी भाषा-शैली तथा उनकी सुधार-प्रधान, जाति-भेद-विरोधी शिक्षाएँ आगे चलकर भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी (निर्गुण संत) काव्यधारा को गहराई से प्रभावित करती हैं।
जैन साहित्य
आदिकालीन जैन साहित्य साहित्यिक दृष्टि से सबसे प्रामाणिक तथा सर्वाधिक मात्रा में उपलब्ध साहित्य माना जाता है, क्योंकि जैन मुनि परंपरागत रूप से लेखन एवं ग्रंथ-सुरक्षा के प्रति बहुत सजग रहे हैं। इसकी रचना-शैली को "रास" कहा गया — ऐसी रचनाएँ जिनमें गीत और नृत्य दोनों साथ-साथ प्रस्तुत किए जा सकें; आगे चलकर यही शैली "रासो" काव्य का आधार भी बनी।
प्रमुख जैन कवि इस प्रकार हैं:
- स्वयंभू — जैन परंपरा के प्रथम व सर्वश्रेष्ठ कवि, जिन्हें "अपभ्रंश का वाल्मीकि" कहा जाता है। इनकी प्रमुख रचना "पउमचरिउ" रामकथा पर आधारित है; अन्य रचनाएँ — "रिट्ठणेमि चरिउ", "स्वयंभूच्छंद", "हरिवंश पुराण"।
- पुष्पदंत — स्वयंभू के बाद जैन साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित कवि; प्रमुख रचना "महापुराण", साथ ही "नागकुमार चरित" व "यशोधरा चरित"।
- अन्य प्रमुख कवि — आचार्य हेमचंद्र ("सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन"), शालिभद्र सूरि ("भरतेश्वर बाहुबली रास"), धनपाल ("भविसयत्त कहा")।
जैन काव्य विषय-वस्तु में मुख्यतः धार्मिक तथा शिक्षाप्रद है, किंतु इसमें सामाजिक, ऐतिहासिक तथा लोक-आख्यानक तत्व भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। शैली की दृष्टि से यह गीत-प्रधान है, और छंदों में लय व गेयता का विशेष ध्यान रखा गया है।
रासो / चारण साहित्य
रासो काव्य वीर रस-प्रधान काव्य-परंपरा है, जो राजपूत राजाओं के दरबारी चारण कवियों द्वारा रची गई। इसकी सबसे प्रसिद्ध तथा सबसे विवादित रचना "पृथ्वीराज रासो" है, जिसके रचयिता पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदबरदाई माने जाते हैं। यह ग्रंथ 69 अध्यायों ("समय") का विशाल काव्य है, जो दोहा, तोमर, त्रोटक तथा रोला जैसे आर्य-छंदों में रचा गया है।
इस ग्रंथ की प्रामाणिकता को लेकर हिंदी के विद्वानों में लंबे समय से गहरा मतभेद रहा है:
- अप्रामाणिकता के पक्ष में तर्क (गौरीशंकर हीरानंद ओझा, डॉ. वूलर, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि) — रासो में वर्णित घटनाएँ व नाम इतिहास से मेल नहीं खाते; पृथ्वीराज की माता का नाम रासो में "कमला" बताया गया है जबकि वास्तविक नाम "कर्पूरी देवी" था; पृथ्वीराज के चौदह विवाहों का वर्णन तथा गोरी व सोमेश्वर के वध का प्रसंग भी इतिहास-सम्मत नहीं है; जयानक कवि रचित "पृथ्वीराज विजय" (एक समकालीन संस्कृत ग्रंथ) से इसका मेल नहीं बैठता।
- प्रामाणिकता के पक्ष में तर्क (डॉ. दशरथ शर्मा आदि) — कर्नल टॉड ने रासो के काव्य-सौंदर्य से प्रभावित होकर इसके लगभग तीस हज़ार छंदों का अंग्रेज़ी अनुवाद किया था; आरंभ में गार्सा द तासी सहित कई विद्वान इसकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं करते थे।
आज सामान्यतः इसे "अर्ध-प्रामाणिक" रचना माना जाता है — अर्थात मूल ग्रंथ में परवर्ती काल में काफ़ी प्रक्षेप (बाद में जोड़ी गई सामग्री) हुआ है।
रासो-परंपरा की अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं — बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह द्वारा रचित; यह वस्तुतः वीरगाथा न होकर एक विरह-प्रधान गीति-रचना है) तथा परमाल रासो (जगनिक द्वारा रचित, जिसे लोक-परंपरा में "आल्हाखंड" के नाम से भी जाना जाता है)।
विद्यापति एवं अमीर खुसरो
विद्यापति (लगभग 1360–1448 ई.) मिथिला नरेश कीर्तिसिंह के दरबारी कवि थे, जिन्हें "मैथिल-कोकिल" कहा जाता है। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट तथा मैथिली — तीनों भाषाओं में रचनाएँ कीं। "कीर्तिलता" व "कीर्तिपताका" उनकी अवहट्ट रचनाएँ हैं, जिनमें उनके आश्रयदाता राजा कीर्तिसिंह की वीरता का वर्णन है; जबकि "पदावली" उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है, जिसमें राधा-कृष्ण की लीला के माध्यम से शृंगार व प्रेम-भाव का सुंदर चित्रण मिलता है। यद्यपि विद्यापति का जन्म आदिकाल की समय-सीमा में ही होता है, उनकी पदावली में भक्तिकालीन लक्षण भी स्पष्ट झलकते हैं — इसीलिए कुछ विद्वान उन्हें दोनों कालों के संधि-बिंदु पर रखते हैं।
अमीर खुसरो (1253–1325 ई.) दिल्ली सल्तनत से जुड़े एक प्रमुख कवि, संगीतकार तथा सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। उन्हें खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाता है, तथा वे पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने हिंदवी और फ़ारसी — दोनों भाषाओं में एक साथ रचना की। उन्होंने स्वयं को "तूती-ए-हिंद" (हिंदुस्तान की मैना) कहा था। उनकी प्रमुख हिंदवी रचनाओं में पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो-सुखने तथा "खालिकबारी" (तुर्की-अरबी-फ़ारसी-हिंदी का पर्यायवाची शब्दकोश) शामिल हैं। खुसरो की भाषा-शैली में लोकभाषा की सरलता तथा सूफी विचारधारा का सुंदर मेल मिलता है।
आदिकाल की प्रमुख विशेषताएँ (सारांश)
- भाषा की दृष्टि से यह अपभ्रंश से प्रारंभिक हिंदी में संक्रमण का काल है, जिसमें अवहट्ट, मैथिली, राजस्थानी-डिंगल तथा फ़ारसी-मिश्रित खड़ी बोली — कई भाषा-रूप एक साथ मिलते हैं।
- साहित्य किसी एक धर्म या विचारधारा तक सीमित नहीं — बौद्ध (सिद्ध), शैव-योगी (नाथ), जैन तथा दरबारी-चारण परंपराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं।
- रासो-काव्य में वीर रस तथा शृंगार रस, दोनों की प्रधानता मिलती है।
- सिद्ध व नाथ साहित्य की सुधारवादी, रूढ़ि-विरोधी तथा साधनात्मक प्रवृत्तियाँ आगे चलकर भक्तिकाल के निर्गुण संत काव्य की नींव बनती हैं।
- अधिकांश रचनाओं की प्रामाणिकता व रचनाकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद है — पृथ्वीराज रासो इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है।
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा की दृष्टि से)
- सिद्धों की कुल संख्या परंपरा के अनुसार चौरासी (84) मानी जाती है।
- सरहपा को सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि माना जाता है; रचना — "दोहाकोश"।
- सिद्धों की भाषा-शैली को "संधा भाषा"/"संध्याभाषा" कहा जाता है।
- गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे; गोरखनाथ को हठयोग का प्रवर्तक माना जाता है।
- स्वयंभू को "अपभ्रंश का वाल्मीकि" कहा जाता है; रचना — "पउमचरिउ"।
- पृथ्वीराज रासो के रचयिता चंदबरदाई माने जाते हैं; इसकी प्रामाणिकता विवादित है।
- बीसलदेव रासो के रचयिता नरपति नाल्ह हैं; यह वीरगाथा नहीं, गीति-रचना है।
- परमाल रासो को लोक-परंपरा में "आल्हाखंड" भी कहा जाता है; रचयिता जगनिक हैं।
- विद्यापति को "मैथिल-कोकिल" कहा जाता है; प्रसिद्ध रचनाएँ — कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पदावली।
- अमीर खुसरो को खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाता है; उन्होंने स्वयं को "तूती-ए-हिंद" कहा था।
अभ्यास प्रश्न
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
(उत्तर लेख के अंत में दिए गए हैं)
- सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि किसे माना जाता है?
- (क) लुइपा
- (ख) सरहपा
- (ग) कण्हपा
- (घ) शबरपा
- सिद्धों की भाषा-शैली को क्या कहा जाता है?
- (क) साधुक्कड़ी
- (ख) डिंगल
- (ग) संधा/संध्याभाषा
- (घ) अवहट्ट
- गोरखनाथ के गुरु कौन थे?
- (क) कण्हपा
- (ख) मत्स्येंद्रनाथ
- (ग) सरहपा
- (घ) चर्पटनाथ
- "पउमचरिउ" के रचयिता कौन हैं?
- (क) पुष्पदंत
- (ख) स्वयंभू
- (ग) हेमचंद्र
- (घ) शालिभद्र सूरि
- "अपभ्रंश का वाल्मीकि" किसे कहा जाता है?
- (क) पुष्पदंत
- (ख) स्वयंभू
- (ग) धनपाल
- (घ) आचार्य हेमचंद्र
- पृथ्वीराज रासो के रचयिता कौन माने जाते हैं?
- (क) जगनिक
- (ख) नरपति नाल्ह
- (ग) चंदबरदाई
- (घ) जयानक
- बीसलदेव रासो के रचयिता कौन हैं?
- (क) चंदबरदाई
- (ख) नरपति नाल्ह
- (ग) जगनिक
- (घ) विद्यापति
- परमाल रासो को लोक-परंपरा में और किस नाम से जाना जाता है?
- (क) पद्मावत
- (ख) आल्हाखंड
- (ग) खालिकबारी
- (घ) दोहाकोश
- विद्यापति को किस उपाधि से जाना जाता है?
- (क) तूती-ए-हिंद
- (ख) मैथिल-कोकिल
- (ग) अपभ्रंश का वाल्मीकि
- (घ) सरोजवज्र
- अमीर खुसरो को किस भाषा का प्रथम कवि माना जाता है?
- (क) ब्रजभाषा
- (ख) अवधी
- (ग) खड़ी बोली
- (घ) मैथिली
- अमीर खुसरो ने स्वयं को क्या कहा था?
- (क) मैथिल-कोकिल
- (ख) तूती-ए-हिंद
- (ग) सरोजवज्र
- (घ) अपभ्रंश का वाल्मीकि
- "खालिकबारी" किसकी रचना है?
- (क) विद्यापति
- (ख) अमीर खुसरो
- (ग) चंदबरदाई
- (घ) स्वयंभू
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. आदिकाल किसे कहते हैं?
आदिकाल हिंदी साहित्य का प्रारंभिक कालखंड है, जो लगभग सं. 1050 से सं. 1375 (993–1318 ई.) तक फैला माना जाता है। इस काल में सिद्ध, नाथ, जैन, रासो/चारण साहित्य तथा विद्यापति व अमीर खुसरो जैसे फुटकल कवियों की रचनाएँ मिलती हैं।
2. आदिकाल की प्रमुख काव्यधाराएँ कौन-सी हैं?
मुख्यतः पाँच — सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य, रासो/चारण साहित्य, तथा विद्यापति एवं अमीर खुसरो की फुटकल रचनाएँ।
3. सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि कौन माना जाता है?
सरहपा को सिद्ध साहित्य का प्रथम कवि माना जाता है, जिनकी प्रसिद्ध रचना "दोहाकोश" है।
4. नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक कौन थे?
गोरखनाथ को नाथ साहित्य-परंपरा का प्रवर्तक माना जाता है, जबकि मत्स्येंद्रनाथ को इस परंपरा का आदि गुरु माना जाता है।
5. जैन साहित्य में "रास" शैली क्या है?
"रास" वह रचना-शैली है जिसमें गीत और नृत्य दोनों साथ प्रस्तुत किए जा सकें। जैन कवियों द्वारा विकसित यही शैली आगे चलकर रासो-काव्य परंपरा का आधार भी बनी।
6. पृथ्वीराज रासो प्रामाणिक है या अप्रामाणिक?
इस पर विद्वानों में गहरा मतभेद है। आचार्य शुक्ल सहित कई विद्वान इसे अप्रामाणिक या भारी प्रक्षेप-युक्त मानते हैं, जबकि डॉ. दशरथ शर्मा जैसे विद्वान इसकी प्रामाणिकता का समर्थन करते हैं। आज सामान्यतः इसे "अर्ध-प्रामाणिक" रचना माना जाता है।
7. बीसलदेव रासो को वीरगाथा क्यों नहीं माना जाता?
क्योंकि यह वस्तुतः एक विरह-प्रधान गीति-रचना है, वीरगाथा नहीं — यही कारण है कि हजारीप्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल जी के "वीरगाथा काल" नामकरण को चुनौती देते हुए इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया था — इस पूरी बहस को काल-विभाजन एवं नामकरण वाली पोस्ट में विस्तार से पढ़ें।
8. विद्यापति को भक्तिकाल का कवि क्यों नहीं माना जाता, जबकि उनकी पदावली में भक्ति-भाव मिलता है?
विद्यापति का जन्मकाल आदिकाल की समय-सीमा में आता है, इसलिए इतिहास-लेखन की दृष्टि से उन्हें आदिकाल का कवि माना जाता है, भले ही उनकी पदावली में भक्तिकालीन लक्षण भी स्पष्ट झलकते हों।
9. अमीर खुसरो को खड़ी बोली का प्रथम कवि क्यों माना जाता है?
क्योंकि उन्होंने अपनी पहेलियों, मुकरियों तथा दो-सुखनों में खड़ी बोली का प्रयोग किया, और वे पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने हिंदवी व फ़ारसी — दोनों भाषाओं में एक साथ रचना की।
10. आदिकाल के साहित्य में इतनी अलग-अलग काव्यधाराएँ एक साथ क्यों मिलती हैं?
क्योंकि यह काल भाषिक व सामाजिक दृष्टि से एक संक्रमण-काल था — बौद्ध, नाथ, जैन तथा दरबारी-चारण परंपराएँ अलग-अलग क्षेत्रों व समुदायों में समानांतर रूप से विकसित हो रही थीं, और अभी तक कोई एक भाषा या प्रवृत्ति संपूर्ण उत्तर भारत में प्रभावी नहीं हो पाई थी।
उत्तर कुंजी (MCQ)
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संदर्भ
- हिंदी साहित्य का इतिहास — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- हिंदी साहित्य का आदिकाल — हजारीप्रसाद द्विवेदी
- हिंदी काव्यधारा — राहुल सांकृत्यायन
- हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास — डॉ. बच्चन सिंह
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