हिंदी गद्य की विधाओं में उपन्यास के बाद सबसे व्यापक और सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली विधा कहानी है। हिंदी उपन्यास की विकास-यात्रा में हमने देखा था कि भाग्यवती से गोदान तक पहुँचते-पहुँचते हिंदी गद्य ने यथार्थ को कैसे साधा। कहानी की यात्रा उससे अलग है। वह छोटी है, तेज़ है, और हर नए साहित्यिक आंदोलन का पहला प्रयोग-क्षेत्र रही है। बीसवीं सदी में हिंदी साहित्य में जितने भी आंदोलन उठे, उनमें से अधिकांश ने अपना पहला बयान कहानी के माध्यम से ही दिया।
एक नज़र में
आधुनिक हिंदी कहानी का व्यवस्थित विकास बीसवीं सदी के आरंभ में हुआ, यद्यपि कथा-रचनाएँ उससे पहले भी मिलती हैं। प्रथम कहानी कौन-सी है, इस पर विद्वानों में आज तक सहमति नहीं है। प्रेमचंद ने इसे सामाजिक यथार्थ की विधा बनाया, जयशंकर प्रसाद ने भावात्मक ऊँचाई दी, और गुलेरी ने 'उसने कहा था' से शिल्प की कसावट का आदर्श स्थापित किया। स्वातंत्र्योत्तर काल में 'नई कहानी' ने अनुभूति की प्रामाणिकता को केंद्र में रखा, जिसके बाद अकहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी, सक्रिय कहानी और जनवादी कहानी जैसे आंदोलनों की शृंखला चली। समकालीन कहानी में स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श ने विधा का दायरा सबसे अधिक विस्तृत किया।
कहानी विधा का स्वरूप
कहानी को उपन्यास का छोटा रूप मान लेना भूल है। दोनों का अंतर आकार का नहीं, संरचना का है। उपन्यास जीवन को विस्तार में खोलता है, जबकि कहानी जीवन के किसी एक क्षण, एक स्थिति या एक मनोदशा को पकड़कर उसी में पूरा अर्थ भर देती है।
- एकल प्रभाव: कहानी का लक्ष्य पाठक पर एक ही गहरा प्रभाव छोड़ना होता है, अनेक प्रभावों का संचय नहीं।
- सीमित पात्र और सीमित समय: उपन्यास पीढ़ियाँ समेट सकता है, कहानी प्रायः कुछ घंटों या कुछ दिनों की परिधि में चलती है।
- चरम बिंदु की केंद्रीयता: कहानी की पूरी संरचना एक निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ती है, और अक्सर वहीं समाप्त हो जाती है।
- कथानक, पात्र, देशकाल, संवाद, भाषा-शैली और उद्देश्य: पारंपरिक आलोचना में कहानी के यही छह तत्व माने जाते हैं, यद्यपि आधुनिक कहानी ने इनमें से कई को जानबूझकर तोड़ा है।
हिंदी की पहली कहानी: एक अनसुलझा प्रश्न
यह हिंदी कहानी के इतिहास का सबसे विवादित प्रश्न है, और प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछा जाने वाला भी। समस्या यह नहीं कि प्रमाण कम हैं, समस्या यह है कि "कहानी" की परिभाषा ही विद्वानों के बीच एक नहीं रही। जो रचना एक विद्वान के मानदंड पर खरी उतरती है, वह दूसरे के मानदंड पर किस्सा या आख्यान ठहरा दी जाती है।
- रानी केतकी की कहानी (लगभग 1803) — इंशा अल्ला खाँ: कालक्रम की दृष्टि से सबसे पहले आती है। इसके पक्ष में तर्क यह है कि यह ठेठ हिंदी में लिखी गई सुगठित कथा-रचना है। विपक्ष में सबसे मज़बूत तर्क यह है कि इसके बाद लगभग सौ वर्षों तक इस प्रकार की कोई रचना सामने नहीं आई, अर्थात इससे कोई परंपरा नहीं बनी। परंपराहीन रचना को विधा का आरंभ मानने में कठिनाई है।
- राजा भोज का सपना — राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद': उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध की रचना, किंतु अधिकांश आलोचक इसमें आधुनिक कहानी-कला के तत्वों का अभाव पाते हैं।
- इंदुमती (1900) — किशोरीलाल गोस्वामी: 'सरस्वती' में प्रकाशित। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे ही हिंदी की प्रथम कहानी माना, और परीक्षाओं में प्रायः यही उत्तर अपेक्षित रहता है। इसके विरुद्ध यह आपत्ति उठाई जाती है कि इस पर शेक्सपियर के 'टेम्पेस्ट' की छाया है, अतः यह पूर्णतः मौलिक नहीं।
- एक टोकरी भर मिट्टी (1901) — माधवराव सप्रे: 'छत्तीसगढ़ मित्र' में प्रकाशित। जो विद्वान मौलिकता और यथार्थवादी दृष्टि को निर्णायक मानते हैं, वे इसे प्रथम कहानी कहते हैं। कथावस्तु, संक्षिप्तता और सामाजिक चेतना — तीनों दृष्टियों से यह आधुनिक कहानी के निकट है।
- ग्यारह वर्ष का समय (1903) — आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 'सरस्वती' में प्रकाशित। रोचक विडंबना यह है कि शुक्ल जी ने स्वयं इंदुमती को प्रथम माना, जबकि कुछ परवर्ती आलोचक उन्हीं की इस रचना को यह श्रेय देते हैं।
- दुलाईवाली (1907) — बंग महिला (राजेंद्रबाला घोष): भाषा की सहजता और घरेलू यथार्थ के कारण इसे भी दावेदारों में गिना जाता है।
परीक्षा की दृष्टि से सुरक्षित स्थिति यह है: कालक्रम में सबसे पहले रानी केतकी की कहानी, शुक्ल जी के मत से प्रथम इंदुमती, और पहली मौलिक यथार्थवादी कहानी के रूप में एक टोकरी भर मिट्टी। प्रश्न किस आधार पर पूछा गया है, उत्तर उसी के अनुसार बदलेगा।
प्रेमचंद-पूर्व और द्विवेदी युग की कहानी
1900 से 1915 तक का काल हिंदी कहानी का शैशव है। इस दौर की कहानियाँ मुख्यतः 'सरस्वती' के माध्यम से सामने आईं, और उन पर उपदेशात्मकता, ऐतिहासिक-पौराणिक कथानक तथा तिलस्मी-जासूसी रुचि का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। किशोरीलाल गोस्वामी, बंग महिला, गिरिजादत्त वाजपेयी और वृंदावनलाल वर्मा इस दौर के प्रमुख नाम हैं।
इस काल की निर्णायक उपलब्धि है चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की उसने कहा था (1915)। यह कहानी इस अर्थ में युगांतरकारी है कि इसमें पहली बार शिल्प सचेत रूप से बरता गया — पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) का प्रयोग, संवादों की सजीवता, पंजाबी बोली का पुट, और अंत की वह मार्मिकता जो उपदेश दिए बिना पाठक तक पहुँचती है। गुलेरी ने कुल तीन ही कहानियाँ लिखीं — उसने कहा था, बुद्धू का काँटा और सुखमय जीवन — और तीनों के बल पर वे हिंदी कहानी के इतिहास में स्थायी हो गए।
प्रेमचंद युग: कहानी का यथार्थ से साक्षात्कार
प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को भारतीय गाँव, किसान और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन के यथार्थ से उस गहराई तक जोड़ा जहाँ वह पहले नहीं पहुँची थी। उनसे पहले की अधिकांश कहानियाँ दरबारों, ऐतिहासिक-पौराणिक कथानकों और तिलस्मी रुचि के इर्द-गिर्द घूम रही थीं। प्रेमचंद उन्हें खेत, कचहरी, महाजन की बही और घर की दहलीज़ तक ले आए।
उनका पहला कहानी-संग्रह सोज़े-वतन (1908) उर्दू में 'नवाबराय' नाम से प्रकाशित हुआ और अंग्रेज़ी सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया। हिंदी में उनकी कहानियाँ 1915 के आसपास 'सरस्वती' से आनी शुरू हुईं। उनकी लगभग तीन सौ कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं।
- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद: पंच परमेश्वर और बड़े घर की बेटी जैसी कहानियों में यथार्थ का चित्रण है, पर अंत में एक नैतिक समाधान भी है।
- कठोर यथार्थ की ओर मोड़: पूस की रात और कफ़न (1936) में वह समाधान गायब हो जाता है। कफ़न को प्रायः उनकी अंतिम और सबसे निर्मम कहानी माना जाता है, जहाँ व्यवस्था की क्रूरता किसी आदर्श से नहीं ढकी जाती।
- अन्य प्रमुख कहानियाँ: नमक का दारोगा, शतरंज के खिलाड़ी, ईदगाह, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा।
इसी दौर में जयशंकर प्रसाद ने कहानी को बिल्कुल भिन्न दिशा दी। उनका पहला संग्रह छाया (1912) था, और आगे प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी तथा इंद्रजाल आए। आकाशदीप, पुरस्कार, ममता, गुंडा और छोटा जादूगर उनकी सर्वाधिक चर्चित कहानियाँ हैं। प्रेमचंद जहाँ सामाजिक यथार्थ पर टिके, प्रसाद वहाँ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, भावात्मक तीव्रता और काव्यात्मक भाषा की ओर गए। हिंदी कहानी में यथार्थ और भावबोध की यह दोहरी धारा यहीं से शुरू होती है।
इनके साथ विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' (रक्षाबंधन, ताई) और सुदर्शन (हार की जीत, सालगिरह) ने आदर्शवादी-सुधारवादी धारा को आगे बढ़ाया।
प्रेमचंदोत्तर कहानी: मनोविज्ञान का प्रवेश
1936 के बाद कहानी का केंद्र समाज से खिसककर व्यक्ति के भीतर चला गया। फ्रायड और एडलर के मनोविश्लेषण, तथा पश्चिम की चेतना-प्रवाह शैली का प्रभाव इस मोड़ के पीछे है।
- मनोवैज्ञानिक धारा: जैनेंद्र कुमार इस धारा के केंद्र में हैं — फाँसी, पाजेब, अपना-अपना भाग्य, स्पर्धा। उनके साथ इलाचंद्र जोशी ने कहानी में दमित इच्छाओं और आत्मसंघर्ष को उकेरा।
- प्रयोगधर्मी धारा: अज्ञेय ने शिल्प और संवेदना दोनों स्तरों पर नए रास्ते खोजे — विपथगा, रोज़ (गैंग्रीन), शरणदाता, कोठरी की बात।
- प्रगतिशील-यथार्थवादी धारा: यशपाल ने मार्क्सवादी दृष्टि से सामाजिक विषमता पर लिखा — परदा, ज्ञानदान, फूलो का कुर्ता। इसी धारा में राहुल सांकृत्यायन और रांगेय राघव भी आते हैं।
- व्यंग्य-प्रधान धारा: भगवतीचरण वर्मा की दो बाँके और इंस्टालमेंट इसके प्रतिनिधि उदाहरण हैं।
नई कहानी आंदोलन
स्वतंत्रता के बाद का मोहभंग, विभाजन की स्मृति, महानगरों की ओर पलायन और संयुक्त परिवार का टूटना — इन्हीं अनुभवों से 1950 के दशक में 'नई कहानी' का जन्म हुआ। इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घोषणा थी अनुभूति की प्रामाणिकता, यानी लेखक वही लिखे जो उसने स्वयं भोगा हो।
आंदोलन के तीन प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं — राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर। नामवर सिंह ने शिवप्रसाद सिंह की दादी माँ को हिंदी की पहली नई कहानी कहा, और निर्मल वर्मा के संग्रह परिंदे (रचना 1956, प्रकाशन 1960) को नई कहानी की पहली कृति माना। परिंदे पर यह मत सर्वाधिक प्रचलित है, और परीक्षाओं में यही पूछा जाता है।
- राजेंद्र यादव: जहाँ लक्ष्मी कैद है, टूटना, एक कमज़ोर लड़की की कहानी।
- मोहन राकेश: मलबे का मालिक, मिस पाल, परमात्मा का कुत्ता, आर्द्रा।
- कमलेश्वर: राजा निरबंसिया, खोई हुई दिशाएँ, माँस का दरिया।
- निर्मल वर्मा: परिंदे, माया दर्पण, लवर्स — अकेलेपन और अजनबीपन के सबसे सूक्ष्म चित्रकार।
- भीष्म साहनी: चीफ़ की दावत, अमृतसर आ गया है — विभाजन और मध्यवर्गीय पाखंड पर।
- फणीश्वरनाथ रेणु: मारे गए गुलफ़ाम (तीसरी कसम), लाल पान की बेगम, पंचलाइट — आंचलिकता को कहानी में लाने वाले।
- अमरकांत: डिप्टी कलक्टरी, ज़िंदगी और जोंक।
- शेखर जोशी: कोसी का घटवार। मार्कण्डेय: गुलरा के बाबा।
- उषा प्रियंवदा: वापसी, ज़िंदगी और गुलाब के फूल। मन्नू भंडारी: यही सच है, तीन निगाहों की एक तस्वीर।
साठोत्तरी कहानी आंदोलन
1960 तक आते-आते नई कहानी स्वयं एक रूढ़ि बन गई। उसकी मध्यवर्गीय संवेदना और दोहराए जाते शिल्प के विरुद्ध प्रतिक्रिया में आंदोलनों की एक पूरी शृंखला खड़ी हुई। इन्हें सामूहिक रूप से साठोत्तरी कहानी कहा जाता है।
- अकहानी (लगभग 1960 के बाद): मूल स्वर विरोध और निषेध का। इसने कथानक और मूल्य दोनों को अस्वीकार किया, और संत्रास, ऊब, अकेलापन तथा अजनबीपन को केंद्र में रखा। गंगाप्रसाद विमल और रवींद्र कालिया इसके प्रमुख प्रवक्ता रहे; जगदीश चतुर्वेदी और दूधनाथ सिंह भी इससे जुड़े। ध्यान रहे कि इस आंदोलन का कोई एक निर्विवाद प्रवर्तक नहीं माना जाता — विभिन्न स्रोत भिन्न नाम देते हैं। चर्चित रचनाएँ: दूधनाथ सिंह की रक्तपात, ज्ञानरंजन की पिता, गंगाप्रसाद विमल की शीर्षकहीन, रवींद्र कालिया की एक डरी हुई औरत।
- सचेतन कहानी (1964): पुरोधा महीप सिंह, 'आधार' पत्रिका के माध्यम से। इसने अकहानी की निषेधवादी दृष्टि के विरुद्ध मनुष्य की सचेत जिजीविषा और मूल्यबोध की पुनर्स्थापना पर बल दिया।
- समांतर कहानी (1970 का दशक): इसके प्रमुख प्रवर्तक कमलेश्वर रहे और 'सारिका' इसका मुख्य मंच बनी। आंदोलन के आरंभ-वर्ष पर स्रोत एकमत नहीं हैं — कुछ इसे 1972 से कमलेश्वर के प्रयासों से जोड़ते हैं, जबकि व्यापक पहचान इसे अक्टूबर 1974 से 'सारिका' में प्रकाशित समांतर कहानी विशेषांकों से मिली। इसका आग्रह था कि कहानी आम आदमी की हो और उसकी संपूर्ण लड़ाई को दिशा दे। यह आंदोलन हिंदी से आगे बढ़कर मराठी, तेलुगु, उड़िया और असमिया तक फैला। जुड़े नाम: कामतानाथ, मधुकर सिंह, जितेंद्र भाटिया।
- सक्रिय कहानी: राकेश वत्स और चित्रा मुद्गल इससे जुड़े रहे; इसने लेखक की सामाजिक भूमिका को अधिक सक्रिय रूप में देखा।
- जनवादी कहानी (1980 के दशक): मार्क्सवादी वर्गदृष्टि से जुड़ी धारा, जिसने श्रमिक-किसान जीवन और वर्ग-संघर्ष को कहानी का केंद्र बनाया।
परीक्षा की दृष्टि से इन आंदोलनों में नाम-वर्ष का युग्म ही सबसे अधिक पूछा जाता है — सचेतन के साथ महीप सिंह, समांतर के साथ कमलेश्वर, और अकहानी के साथ गंगाप्रसाद विमल।
कहानी-पत्रिकाएँ और कहानी-आलोचना
हिंदी कहानी का इतिहास पत्रिकाओं के इतिहास से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। हिंदी कहानी के अनेक आंदोलनों को व्यापक पहचान दिलाने में पत्रिकाओं और उनके संपादकों की निर्णायक भूमिका रही।
- सरस्वती (1900): महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में। हिंदी कहानी के आरंभिक दौर की लगभग हर महत्वपूर्ण रचना यहीं छपी — इंदुमती, ग्यारह वर्ष का समय, दुलाईवाली, उसने कहा था।
- हंस (1930): प्रेमचंद द्वारा आरंभ। राजेंद्र यादव के संपादन में इसके पुनर्प्रकाशन ने इसे समकालीन कहानी, विशेषतः स्त्री और दलित विमर्श के सबसे महत्वपूर्ण मंचों में शामिल कर दिया।
- कहानी: श्रीपत राय और भैरवप्रसाद गुप्त से जुड़ी पत्रिका, नई कहानी के उभार में केंद्रीय।
- नई कहानियाँ: भैरवप्रसाद गुप्त के बाद कमलेश्वर ने इसका संपादन संभाला और आंदोलन को दिशा दी।
- सारिका: कमलेश्वर के संपादन में समांतर कहानी आंदोलन का मुख्य मंच।
- धर्मयुग: धर्मवीर भारती के संपादन में, व्यापक पाठक-वर्ग तक कहानी पहुँचाने वाला।
- पहल, कथादेश, कथन, वसुधा, ज्ञानोदय: परवर्ती दौर की महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ, जिनमें पहल का संपादन ज्ञानरंजन ने किया।
कहानी-आलोचना की परंपरा भी उतनी ही निर्णायक रही। नामवर सिंह की कहानी: नई कहानी इस क्षेत्र की सर्वाधिक चर्चित पुस्तकों में से एक है, जिसने नई कहानी को सैद्धांतिक आधार दिया। देवीशंकर अवस्थी की नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति, राजेंद्र यादव की कहानी: स्वरूप और संवेदना, गोपाल राय का हिंदी कहानी का इतिहास और मधुरेश का हिंदी कहानी का विकास इस परंपरा की अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं।
समकालीन कहानी
1980 के बाद की कहानी को किसी एक आंदोलन में नहीं बाँधा जा सकता। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब वे स्वर कहानी में आए जो पहले या तो अनुपस्थित थे या किसी और की दृष्टि से चित्रित होते थे।
- स्त्री विमर्श: कृष्णा सोबती (सिक्का बदल गया), मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा और गीतांजलिश्री ने स्त्री को विषय से हटाकर दृष्टि के केंद्र में रखा।
- दलित विमर्श: ओमप्रकाश वाल्मीकि (सलाम), मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम और सूरजपाल चौहान। यहाँ भोगे हुए यथार्थ की माँग वैसी ही केंद्रीय है जैसी कभी नई कहानी में थी, पर अनुभव का धरातल बिल्कुल भिन्न है।
- आदिवासी विमर्श: रणेंद्र और वंदना टेटे जैसे नामों के साथ विस्थापन, जंगल और अस्मिता के प्रश्न कहानी में आए।
- व्यापक समकालीन धारा: उदय प्रकाश (तिरिछ, पीली छतरी वाली लड़की, मोहनदास), स्वयं प्रकाश (पार्टीशन, नीलकांत का सफ़र), शिवमूर्ति (कसाईबाड़ा, तिरिया चरित्तर), संजीव और अखिलेश ने भूमंडलीकरण, सांप्रदायिकता और गाँव के बदलते चेहरे को दर्ज किया।
समकालीन कहानी को एक बंद कालखंड मानना उचित नहीं। यह अब भी चल रही है, और इसकी प्रवृत्तियों का अंतिम आकलन शेष है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इंदुमती (किशोरीलाल गोस्वामी, 1900) को हिंदी की प्रथम कहानी माना।
- एक टोकरी भर मिट्टी (माधवराव सप्रे, 1901) 'छत्तीसगढ़ मित्र' में प्रकाशित हुई और इसे पहली मौलिक यथार्थवादी कहानी कहा जाता है।
- रानी केतकी की कहानी (इंशा अल्ला खाँ, लगभग 1803) कालक्रम में सबसे पहले है, पर इससे कोई परंपरा नहीं बनी।
- प्रेमचंद का पहला कहानी-संग्रह सोज़े-वतन (1908) उर्दू में 'नवाबराय' नाम से छपा और ज़ब्त हुआ।
- प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं; कफ़न (1936) उनकी अंतिम प्रमुख कहानी मानी जाती है।
- जयशंकर प्रसाद का पहला कहानी-संग्रह छाया (1912) है।
- गुलेरी ने केवल तीन कहानियाँ लिखीं — उसने कहा था, बुद्धू का काँटा, सुखमय जीवन।
- नामवर सिंह ने दादी माँ (शिवप्रसाद सिंह) को पहली नई कहानी और परिंदे (निर्मल वर्मा) को नई कहानी की पहली कृति माना।
- परिंदे की रचना 1956 में और प्रकाशन 1960 में हुआ; यह 'एक दुनिया समानांतर' में संकलित है।
- नई कहानी की केंद्रीय घोषणा अनुभूति की प्रामाणिकता या 'भोगा हुआ यथार्थ' थी।
- सचेतन कहानी (1964) के पुरोधा महीप सिंह हैं, जिसका मंच 'आधार' पत्रिका बनी।
- समांतर कहानी के प्रमुख प्रवर्तक कमलेश्वर हैं और इसका मंच 'सारिका' रही; आरंभ-वर्ष के रूप में 1972 और 1974 दोनों संदर्भ मिलते हैं।
- नामवर सिंह की कहानी: नई कहानी हिंदी कहानी-आलोचना की सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में से एक है।
अभ्यास प्रश्न
पहले सभी प्रश्नों को स्वयं हल कीजिए, फिर नीचे दी गई उत्तरमाला पर क्लिक करके अपने उत्तर मिलाइए।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी की प्रथम कहानी किसे माना है?
(क) एक टोकरी भर मिट्टी (ख) इंदुमती (ग) दुलाईवाली (घ) उसने कहा था - 'एक टोकरी भर मिट्टी' के रचनाकार कौन हैं?
(क) किशोरीलाल गोस्वामी (ख) बंग महिला (ग) माधवराव सप्रे (घ) शिवप्रसाद सितारे हिंद - 'रानी केतकी की कहानी' के लेखक हैं:
(क) इंशा अल्ला खाँ (ख) लल्लूलाल (ग) सदल मिश्र (घ) सदासुखलाल - 'उसने कहा था' कहानी किस वर्ष प्रकाशित हुई?
(क) 1900 (ख) 1907 (ग) 1915 (घ) 1920 - 'ग्यारह वर्ष का समय' कहानी के रचयिता हैं:
(क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल (ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी (ग) जयशंकर प्रसाद (घ) प्रेमचंद - प्रेमचंद का पहला कहानी-संग्रह कौन-सा है?
(क) मानसरोवर (ख) सोज़े-वतन (ग) प्रेम पचीसी (घ) नवनिधि - जयशंकर प्रसाद का प्रथम कहानी-संग्रह है:
(क) आकाशदीप (ख) प्रतिध्वनि (ग) छाया (घ) इंद्रजाल - 'दुलाईवाली' कहानी की लेखिका 'बंग महिला' का वास्तविक नाम था:
(क) महादेवी वर्मा (ख) राजेंद्रबाला घोष (ग) सुभद्राकुमारी चौहान (घ) उषा देवी मित्रा - नामवर सिंह ने नई कहानी की पहली कृति किसे माना है?
(क) दादी माँ (ख) परिंदे (ग) राजा निरबंसिया (घ) मलबे का मालिक - 'परिंदे' कहानी के रचनाकार हैं:
(क) कमलेश्वर (ख) मोहन राकेश (ग) निर्मल वर्मा (घ) राजेंद्र यादव - 'सचेतन कहानी' के पुरोधा माने जाते हैं:
(क) कमलेश्वर (ख) महीप सिंह (ग) गंगाप्रसाद विमल (घ) राजेंद्र यादव - 'समांतर कहानी' आंदोलन किससे संबंधित है?
(क) कमलेश्वर (ख) मोहन राकेश (ग) दूधनाथ सिंह (घ) ज्ञानरंजन - 'राजा निरबंसिया' कहानी के लेखक हैं:
(क) अमरकांत (ख) कमलेश्वर (ग) भीष्म साहनी (घ) शेखर जोशी - 'कोसी का घटवार' किसकी कहानी है?
(क) मार्कण्डेय (ख) शेखर जोशी (ग) अमरकांत (घ) रेणु - जिस कहानी पर 'तीसरी कसम' फ़िल्म बनी, उस 'मारे गए गुलफ़ाम' के रचनाकार हैं:
(क) फणीश्वरनाथ रेणु (ख) नागार्जुन (ग) शिवप्रसाद सिंह (घ) मार्कण्डेय - 'चीफ़ की दावत' कहानी के रचनाकार हैं:
(क) यशपाल (ख) भीष्म साहनी (ग) उदय प्रकाश (घ) अमरकांत - 'कहानी: नई कहानी' आलोचना-कृति के लेखक कौन हैं?
(क) देवीशंकर अवस्थी (ख) नामवर सिंह (ग) गोपाल राय (घ) मधुरेश - 'सलाम' कहानी-संग्रह किस दलित रचनाकार का है?
(क) मोहनदास नैमिशराय (ख) ओमप्रकाश वाल्मीकि (ग) जयप्रकाश कर्दम (घ) सूरजपाल चौहान
उत्तरमाला देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
1. (ख) | 2. (ग) | 3. (क) | 4. (ग) | 5. (क) | 6. (ख) | 7. (ग) | 8. (ख) | 9. (ख) | 10. (ग) | 11. (ख) | 12. (क) | 13. (ख) | 14. (ख) | 15. (क) | 16. (ख) | 17. (ख) | 18. (ख)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है?
इस पर विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इंदुमती (1900) को प्रथम कहानी माना, जबकि कुछ आलोचक एक टोकरी भर मिट्टी (1901) को पहली मौलिक यथार्थवादी कहानी मानते हैं। कालक्रम की दृष्टि से रानी केतकी की कहानी (लगभग 1803) सबसे पहले आती है, पर उससे कोई परंपरा न बनने के कारण उसे विधा का आरंभ मानने में कठिनाई है।
कहानी और उपन्यास में मूल अंतर क्या है?
अंतर केवल आकार का नहीं है। उपन्यास जीवन को विस्तार में खोलता है और अनेक प्रभाव छोड़ता है, जबकि कहानी किसी एक क्षण या स्थिति पर केंद्रित रहकर एक ही गहरा प्रभाव छोड़ने का लक्ष्य रखती है।
नई कहानी आंदोलन की केंद्रीय मान्यता क्या थी?
अनुभूति की प्रामाणिकता, अर्थात लेखक वही लिखे जो उसने स्वयं भोगा हो। इसी कारण इस दौर की कहानियों में महानगरीय अकेलापन, टूटते संबंध और मध्यवर्गीय संघर्ष प्रमुखता से आए।
नई कहानी आंदोलन के प्रमुख कहानीकार कौन हैं?
राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर इसके प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं। निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत, शेखर जोशी, मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा भी इस आंदोलन के अत्यंत महत्वपूर्ण कहानीकार हैं।
अकहानी आंदोलन नई कहानी से किस प्रकार भिन्न था?
नई कहानी अनुभव की प्रामाणिकता पर टिकी थी, जबकि अकहानी ने कथानक और मूल्य दोनों को ही अस्वीकार कर दिया। इसका मूल स्वर विरोध और निषेध का रहा, और इसमें संत्रास, ऊब तथा अजनबीपन केंद्र में आए।
प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी कौन-सी मानी जाती है?
कफ़न (1936) को प्रायः उनकी सबसे सशक्त कहानी माना जाता है, क्योंकि इसमें वे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को छोड़कर पूरी तरह कठोर यथार्थ तक पहुँचते हैं। पंच परमेश्वर, पूस की रात, ईदगाह और नमक का दारोगा भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं।
यह भी पढ़ें
- हिंदी उपन्यास की विकास-यात्रा — भाग्यवती से गोदान तक
- हिंदी साहित्य के सभी प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ — आदिकाल से समकालीन साहित्य तक
- हिंदी साहित्य का आधुनिक काल: नामकरण, समय-सीमा और प्रमुख साहित्यकार
- भारतेंदु युग: काल-निर्धारण, प्रवृत्तियाँ और प्रमुख साहित्यकार
- समकालीन कविता: नामकरण, प्रवृत्तियाँ एवं प्रमुख कवि
संदर्भ
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल — हिंदी साहित्य का इतिहास
- नामवर सिंह — कहानी: नई कहानी
- देवीशंकर अवस्थी — नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति
- गोपाल राय — हिंदी कहानी का इतिहास
- मधुरेश — हिंदी कहानी का विकास
- डॉ. नगेंद्र (सं.) — हिंदी साहित्य का इतिहास
- बच्चन सिंह — हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास
टिप्पणियाँ