सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वाच्य किसे कहते हैं? परिभाषा, भेद, उदाहरण एवं परिवर्तन के नियम | हिंदी व्याकरण

हिंदी की एक विशेषता यह भी है कि एक ही घटना को तीन बिल्कुल अलग तरीकों से बताया जा सकता है। जैसे — "सीता पत्र लिखती है।" में प्रधानता कर्ता की है। "मोहन से किताब पढ़ी जाती है।" में प्रधानता कर्म की हो जाती है, कर्ता पीछे हट जाता है और "मुझसे अब चला नहीं जाता।" में न कर्ता प्रधान है, न कर्म — सिर्फ़ भाव। यही तय करता है वाच्य। जिसे वाच्य की सही समझ है, वह न सिर्फ़ परीक्षा में वाच्य-परिवर्तन के प्रश्न आसानी से हल कर लेता है, बल्कि लिखते समय भी यह तुरंत पहचान लेता है कि किस वाक्य में कर्ता को आगे रखना है और किसमें कर्म को।

वाच्य किसे कहते हैं? (परिभाषा)

क्रिया के जिस रूप से यह पता चलता है कि वाक्य में क्रिया का संबंध कर्ता, कर्म अथवा भाव — इनमें से किसके अनुसार है, उसे वाच्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में — वाच्य ही तय करता है कि वाक्य में प्रधानता किसे दी जा रही है, और उसी के अनुसार क्रिया का लिंग, वचन तथा पुरुष निर्धारित होता है। हिंदी में वाच्य के तीन भेद माने जाते हैं — कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य एवं भाववाच्य।

वाच्य के तीन भेद

1. कर्तृवाच्य (Active Voice)

यहाँ कर्ता ही केंद्र में है — क्रिया सीधे बताती है कि कर्ता ने क्या किया।

  • जिस वाक्य में कर्ता की प्रधानता हो और क्रिया का लिंग, वचन तथा पुरुष कर्ता के अनुसार हो, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं।
  • यह सकर्मक (जिसका कर्म हो) और अकर्मक (जिसका कर्म न हो) — दोनों प्रकार की क्रियाओं से बनता है।
  • उदाहरण: सीता पत्र लिखती है। (कर्ता सीता के अनुसार "लिखती है")
  • उदाहरण: बच्चे स्कूल जा रहे हैं। (कर्ता "बच्चे" — बहुवचन — के अनुसार "जा रहे हैं")

2. कर्मवाच्य (Passive Voice)

यहाँ कर्ता पीछे हट जाता है, कर्म सामने आ जाता है — क्रिया अब कर्म की भाषा बोलती है।

  • जिस वाक्य में कर्म की प्रधानता हो, कर्ता गौण हो जाता है, और क्रिया का लिंग-वचन कर्म के अनुसार हो, उसे कर्मवाच्य कहते हैं।
  • कर्ता के साथ "से" या "के द्वारा" — दोनों में से कोई भी लग सकता है।
  • यह केवल सकर्मक क्रिया से बनता है — अकर्मक क्रिया का कर्मवाच्य नहीं बनता, क्योंकि उसका कोई कर्म ही नहीं होता जिसे प्रधान बनाया जाए।
  • उदाहरण: मोहन से किताब पढ़ी जाती है। (कर्म "किताब" स्त्रीलिंग है, इसलिए "पढ़ी जाती है")
  • उदाहरण: सीता से पत्र लिखा जाता है। (कर्म "पत्र" पुल्लिंग है, इसलिए "लिखा जाता है")

3. भाववाच्य (Impersonal Voice)

यहाँ न कर्ता प्रधान है, न कर्म — प्रधान है सिर्फ़ क्रिया का भाव, इसीलिए क्रिया हमेशा एक ही रूप में रहती है, चाहे कर्ता कोई भी हो।

  • जिस वाक्य में न कर्ता प्रधान हो, न कर्म, बल्कि स्वयं क्रिया का भाव प्रधान हो, उसे भाववाच्य कहते हैं।
  • क्रिया सदैव अन्य पुरुष, एकवचन, पुल्लिंग रूप में रहती है — चाहे कर्ता स्त्रीलिंग हो, पुल्लिंग हो, एकवचन हो या बहुवचन।
  • यह मुख्यतः अकर्मक क्रिया के साथ तथा असमर्थता/निषेध (न कर पाने) के भाव में प्रयोग होता है।
  • उदाहरण: मुझसे चला नहीं जाता। ("चला" — पुल्लिंग एकवचन — चाहे कहने वाला स्त्री हो या पुरुष)
  • उदाहरण: सीता से अब चला नहीं जाता।

सकर्मक-अकर्मक क्रिया और वाच्य का संबंध

वाच्य-परिवर्तन को समझने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि कौन-सी क्रिया किस वाच्य में ढल सकती है:

  • सकर्मक क्रिया (जिसका कर्म हो, जैसे पढ़ना, लिखना, खाना) से कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य — दोनों बनते हैं।
  • अकर्मक क्रिया (जिसका कर्म न हो, जैसे सोना, हँसना, चलना, रोना) से कर्मवाच्य नहीं बनता — इसका कर्तृवाच्य और भाववाच्य ही बनता है।

वाच्य की पहचान कैसे करें

किसी भी वाक्य को देखकर तुरंत पहचानने का सबसे आसान तरीका यह देखना है कि वाक्य में प्रधानता किसकी है:

  • कर्ता प्रधान → कर्तृवाच्य
  • कर्म प्रधान → कर्मवाच्य
  • क्रिया/भाव प्रधान → भाववाच्य

उदाहरण से समझें:

  • गीता आम खाती है। — कर्ता (गीता) प्रधान है → कर्तृवाच्य
  • गीता से आम खाया जाता है। — कर्म (आम) प्रधान है, क्रिया कर्म के अनुसार → कर्मवाच्य
  • गीता से चला नहीं जाता। — न कर्ता प्रधान, न कर्म; क्रिया सदैव एक ही रूप में → भाववाच्य

वाच्य-परिवर्तन के नियम

प्रतियोगी परीक्षाओं में वाच्य का सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला रूप है — एक वाच्य के वाक्य को दूसरे वाच्य में बदलना। नियम याद रखें तो यह उतना कठिन नहीं है।

कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य

  • कर्ता के साथ "से" या "के द्वारा" जोड़ें।
  • कर्म को वाक्य में प्रधान बनाएं और उससे "को" विभक्ति (यदि हो) हटा दें।
  • मुख्य क्रिया को उसके भूतकालिक कृदंत रूप में लाकर, उसके साथ "जाना" क्रिया का उपयुक्त कालानुरूप रूप जोड़ें (जाता है / गया / जाएगा आदि)।
  • अब क्रिया का लिंग-वचन कर्म के अनुसार होगा, जबकि काल (tense) कर्तृवाच्य वाली क्रिया जैसा ही बना रहेगा।
  • तीनों काल में उदाहरण: मोहन पत्र लिखता है।मोहन से पत्र लिखा जाता है। | मोहन ने पत्र लिखा।मोहन से पत्र लिखा गया। | मोहन पत्र लिखेगा।मोहन से पत्र लिखा जाएगा।

कर्तृवाच्य से भाववाच्य

  • यह परिवर्तन मुख्यतः अकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में, या असमर्थता/निषेध के भाव में किया जाता है।
  • कर्ता के साथ "से" जोड़ें।
  • क्रिया को सदैव अन्य पुरुष, एकवचन, पुल्लिंग रूप में रखें — कर्ता चाहे कोई भी हो।
  • उदाहरण: वह चल नहीं सकती।उससे चला नहीं जाता।

वे भूलें जो वाच्य में सबसे ज़्यादा होती हैं

  • अकर्मक क्रिया का कर्मवाच्य बनाने की कोशिश करना — जैसे "सोना" या "हँसना" का कर्मवाच्य बनाना गलत है, क्योंकि इनका कोई कर्म ही नहीं होता। इनका सिर्फ़ भाववाच्य बनता है।
  • कर्मवाच्य में क्रिया को कर्ता के अनुसार रख देना — कर्मवाच्य में क्रिया हमेशा कर्म के लिंग-वचन के अनुसार होनी चाहिए, कर्ता के अनुसार नहीं।
  • भाववाच्य में क्रिया को कर्ता के लिंग-वचन के अनुसार बदल देना — भाववाच्य में क्रिया हमेशा पुल्लिंग, एकवचन ही रहती है, चाहे कर्ता कोई भी हो; "मुझसे चली नहीं जाती" (स्त्रीलिंग कर्ता के हिसाब से) ग़लत है, सही है "मुझसे चला नहीं जाता"।
  • "से" और "के द्वारा" के प्रयोग में असावधानी — कर्मवाच्य में कर्ता के साथ "से" अथवा "के द्वारा" — दोनों में से कोई भी प्रयोग हो सकता है, पर भाववाच्य में सामान्यतः "से" ही स्वाभाविक लगता है, "के द्वारा" वहाँ बहुत कम प्रयोग होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

(उत्तर नीचे दिए गए हैं)

1. वाच्य के कितने भेद होते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच

2. "सीता पत्र लिखती है" — इस वाक्य में कौन-सा वाच्य है?
(क) कर्तृवाच्य (ख) कर्मवाच्य (ग) भाववाच्य (घ) इनमें से कोई नहीं

3. कर्मवाच्य में क्रिया का लिंग-वचन किसके अनुसार होता है?
(क) कर्ता के अनुसार (ख) कर्म के अनुसार (ग) सदैव पुल्लिंग एकवचन (घ) काल के अनुसार

4. भाववाच्य में क्रिया सदैव किस रूप में रहती है?
(क) कर्ता के लिंग-वचन के अनुसार (ख) कर्म के लिंग-वचन के अनुसार (ग) अन्य पुरुष, एकवचन, पुल्लिंग (घ) उत्तम पुरुष, बहुवचन

5. निम्न में से किस क्रिया का कर्मवाच्य नहीं बन सकता?
(क) पढ़ना (ख) लिखना (ग) सोना (घ) खाना

6. "मोहन से किताब पढ़ी जाती है" — इस वाक्य में कौन-सा वाच्य है?
(क) कर्तृवाच्य (ख) कर्मवाच्य (ग) भाववाच्य (घ) इनमें से कोई नहीं

7. कर्तृवाच्य को कर्मवाच्य में बदलते समय कर्ता के साथ क्या जोड़ा जाता है?
(क) "को" (ख) "से" या "के द्वारा" (ग) "का" (घ) "में"

8. "मुझसे चला नहीं जाता" — इस वाक्य में कौन-सा वाच्य है?
(क) कर्तृवाच्य (ख) कर्मवाच्य (ग) भाववाच्य (घ) इनमें से कोई नहीं

9. भाववाच्य मुख्यतः किस प्रकार की क्रिया तथा किस भाव में प्रयोग होता है?
(क) सकर्मक क्रिया, आदेश के भाव में (ख) अकर्मक क्रिया, असमर्थता/निषेध के भाव में (ग) सकर्मक क्रिया, प्रश्न के भाव में (घ) अकर्मक क्रिया, संभावना के भाव में

10. "बच्चे स्कूल जा रहे हैं" — इस वाक्य में क्रिया किसके अनुसार है?
(क) कर्ता के अनुसार (ख) कर्म के अनुसार (ग) भाव के अनुसार (घ) काल के अनुसार

11. अकर्मक क्रिया से कौन-कौन से वाच्य बनते हैं?
(क) कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य (ख) कर्मवाच्य और भाववाच्य (ग) कर्तृवाच्य और भाववाच्य (घ) केवल भाववाच्य

12. "उससे चला नहीं जाता" वाक्य में क्रिया "चला" किस रूप में है, यह कर्ता स्त्रीलिंग होने पर भी नहीं बदलती — इसका क्या कारण है?
(क) यह कर्तृवाच्य है (ख) यह कर्मवाच्य है (ग) भाववाच्य में क्रिया सदैव पुल्लिंग-एकवचन रहती है (घ) यह व्याकरणिक भूल है

उत्तर: 1. (ख) | 2. (क) | 3. (ख) | 4. (ग) | 5. (ग) | 6. (ख) | 7. (ख) | 8. (ग) | 9. (ख) | 10. (क) | 11. (ग) | 12. (ग)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. वाच्य किसे कहते हैं?

क्रिया के जिस रूप से यह पता चलता है कि वाक्य में क्रिया का संबंध कर्ता, कर्म अथवा भाव में से किसके अनुसार है, उसे वाच्य कहते हैं।

2. वाच्य के कितने भेद होते हैं?

वाच्य के तीन भेद होते हैं — कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य।

3. कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य की पहचान कैसे करें?

यह देखकर कि वाक्य में प्रधानता किसकी है — कर्ता प्रधान हो तो कर्तृवाच्य, कर्म प्रधान हो और क्रिया कर्म के अनुसार बदले तो कर्मवाच्य, और अगर न कर्ता प्रधान हो न कर्म, बल्कि क्रिया सदैव एक ही (पुल्लिंग, एकवचन) रूप में रहे, तो भाववाच्य।

4. कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य में क्या अंतर है?

कर्तृवाच्य में कर्ता प्रधान होता है और क्रिया कर्ता के अनुसार होती है; कर्मवाच्य में कर्म प्रधान होता है, कर्ता के साथ "से/के द्वारा" लगता है, और क्रिया कर्म के लिंग-वचन के अनुसार होती है।

5. भाववाच्य में क्रिया का रूप कैसे तय होता है?

भाववाच्य में क्रिया सदैव अन्य पुरुष, एकवचन, पुल्लिंग रूप में रहती है, चाहे वाक्य का कर्ता स्त्रीलिंग हो, पुल्लिंग हो, एकवचन हो या बहुवचन।

6. क्या हर क्रिया का कर्मवाच्य बनाया जा सकता है?

नहीं। केवल सकर्मक क्रिया (जिसका कर्म हो) का कर्मवाच्य बनता है। अकर्मक क्रिया (जिसका कर्म न हो, जैसे सोना, हँसना) का कर्मवाच्य नहीं बनता — इसका केवल भाववाच्य बनता है।

7. वाच्य-परिवर्तन प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि यह विषय व्याकरण की समझ के साथ-साथ भाषा-प्रयोग की बारीकी भी परखता है — सही वाच्य-परिवर्तन के लिए कर्ता-कर्म की पहचान, क्रिया का सही रूप और लिंग-वचन तीनों की स्पष्ट समझ ज़रूरी होती है।

निष्कर्ष

वाच्य यह तय करता है कि किसी वाक्य में असली ज़ोर किस पर है — करने वाले पर, जिस पर काम हुआ उस पर, या फिर सिर्फ़ काम के भाव पर। याद रखने का सबसे आसान सूत्र है — कर्ता प्रधान → कर्तृवाच्य, कर्म प्रधान → कर्मवाच्य, भाव प्रधान → भाववाच्य। एक बार तीनों भेदों की पहचान और परिवर्तन के नियम स्पष्ट हो जाएं, तो न सिर्फ़ परीक्षा में वाच्य के प्रश्न आसान लगने लगते हैं, बल्कि अपने लेखन में भी सही वाच्य चुनना स्वाभाविक हो जाता है।

यह भी पढ़ें

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग)और अठारह पुराण – परिचय, वर्गीकरण एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

भारतीय ज्ञान-परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परंपराओं में से एक है। इस परंपरा की नींव वेदों पर टिकी है, और इसी नींव पर उपनिषद, वेदांग, दर्शन-शास्त्र तथा पुराण जैसे अनेक ग्रंथों का विशाल भवन खड़ा हुआ है। प्रायः विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के मन में चार वेद, छह शास्त्र (वेदांग) तथा अठारह पुराणों को लेकर कई भ्रम रहते हैं — जैसे "छह शास्त्र" वास्तव में कौन-से हैं, अठारहवां पुराण वायु है या शिव, कौन-सा उपनिषद किस वेद से जुड़ा है, अथवा कल्पसूत्र क्या होते हैं। अधिकांश लेख इस विषय पर केवल नामों की सूची तक सीमित रह जाते हैं। इस लेख में हम इससे आगे बढ़कर प्रत्येक ग्रंथ-समूह की प्रकृति, आंतरिक संरचना, संबंधित ब्राह्मण-आरण्यक ग्रंथों, तथा हर भ्रम के पीछे के वास्तविक कारण को भी विस्तार से, प्रामाणिक ढंग से समझेंगे। वैदिक साहित्य की संरचना भारतीय शास्त्र-परंपरा को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जाता है — श्रुति और स्मृति । श्रुति का अर्थ है वह ज्ञान जो ऋषियों ने साधना और श्रवण द्वारा प्राप्त किया — इसके अंतर्गत चारों वेद और उनसे जुड़े संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उ...

हिंदी भाषा की विशेषताएँ – उत्पत्ति, इतिहास, महत्व एवं सम्पूर्ण प्रामाणिक जानकारी

एक नज़र में हिंदी भारत की राजभाषा है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी का विकास संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → आधुनिक हिंदी के रूप में हुआ। हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है तथा विश्वभर में करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। "हिन्दी भारतीय संस्कृति की आत्मा है" — कमलापति त्रिपाठी का यह कथन हिंदी के महत्व को बहुत सटीक ढंग से व्यक्त करता है। हिंदी केवल संवाद का माध्यम भर नहीं, बल्कि भारत की पहचान का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। इस लेख में हम हिंदी की उत्पत्ति, उसकी भाषिक विशेषताओं तथा वर्तमान वैश्विक स्थिति को विस्तार से, तथ्यों सहित समझेंगे — हिंदी भाषा का परिचय हिंदी भारत की राजभाषा है तथा विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में गिनी जाती है। यह केवल भारत तक सीमित नहीं — नेपाल, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, गुयाना जैसे कई देशों में भी हिंदी बोली और समझी जाती है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह विशाल जनसमूह की भाषा होते हुए भी अपनी सरलता और वैज्ञानिकता के लिए जानी जाती है। हिंदी की उत्पत्ति और विकास हिंदी का उद्भव संस्कृत से हु...

देवनागरी लिपि - उत्पत्ति, नामकरण व विशेषताएँ | Devanagari Lipi

देवनागरी लिपि वर्तमान समय में प्रचलित समस्त लिपियों में सर्वाधिक व्यवस्थित, समर्थ एवं वैज्ञानिक लिपि है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, मराठी, मैथिली, कोंकणी एवं कतिपय विदेशी भाषाएँ (जैसे नेपाली) भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह लिपि भारत की अनेक अन्य लिपियों के सन्निकट भी है। इस आलेख में हम देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, इसके नामकरण, विशेषताओं, वैज्ञानिकता, गुण-दोष तथा अन्य लिपियों से इसकी तुलना — इन सभी पक्षों को विस्तार एवं प्रामाणिकता के साथ जानेंगे। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति संसार की सभी भाषाओं को लिखने के लिए किसी न किसी लिपि का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार देवनागरी भी एक लिपि है जिसका प्रयोग मूलतः हिंदी भाषा को लिखने के लिए किया जाता है। देवनागरी लिपि की उत्पत्ति मूलतः ब्राह्मी लिपि से हुई है। प्राचीन समय में आर्यों द्वारा प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि संभवतः दुनिया की सर्वाधिक परिपूर्ण प्राचीन लिपि है। उर्दू और सिंधी के अतिरिक्त समस्त भारतीय लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। तीसरी-चौथी शताब्दी से ही भारतवर्ष में ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। ...

रामचरितमानस (तुलसी रामायण) के सात कांड || 7 Kand of Ramcharitmans (Tulsidas_Ramayan)

रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण (Ramayan) के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'। रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को यदि "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" जाय तो अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है। माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल...