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रस किसे कहते हैं? परिभाषा, अंग, नवरस, स्थायी भाव और 32 अभ्यास प्रश्न

रस किसे कहते हैं? काव्य, नाटक या साहित्य के आस्वादन से सहृदय पाठक अथवा दर्शक के हृदय में उत्पन्न होने वाली सौंदर्यपूर्ण आनंदानुभूति को रस कहते हैं। भरतमुनि ने मूलतः आठ रस माने थे, बाद में शांत रस जुड़ने पर नवरस की अवधारणा प्रचलित हुई। रस के चार अंग हैं — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव।

भारतीय काव्यशास्त्र में अलंकार और छंद की भाँति रस का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा कहा है, क्योंकि रस के बिना साहित्य केवल शब्दों का समूह बनकर रह जाता है। किसी भी कविता, नाटक, महाकाव्य या कहानी की वास्तविक प्रभावशीलता उसके रस पर ही निर्भर करती है।

इस लेख में रस की परिभाषा, आचार्यों के मत, रस के चारों अंग, नवरस का विस्तृत विवेचन, वात्सल्य एवं भक्ति रस, रस की पहचान के नियम, रस और भाव का अंतर तथा 32 अभ्यास प्रश्न — सब कुछ क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत है।

रस की परिभाषा

रस वह अलौकिक आनंद है, जो काव्य, नाटक अथवा साहित्य में व्यक्त भावों के आस्वादन से सहृदय पाठक या दर्शक के मन में उत्पन्न होता है। भारतीय काव्यशास्त्र में रस को काव्य की आत्मा माना गया है।

संस्कृत के 'रस' शब्द का सामान्य अर्थ स्वाद, सार, आनंद अथवा आस्वादन होता है। काव्यशास्त्र में इसका अर्थ उस सौंदर्यपूर्ण अनुभूति से है, जो साहित्य के माध्यम से पाठक के हृदय में उत्पन्न होती है।

उदाहरण के लिए, किसी वीर सैनिक के अदम्य साहस का वर्णन पढ़कर यदि पाठक के मन में उत्साह और पराक्रम का भाव जागृत हो, तो वहाँ वीर रस की अनुभूति होती है। इसी प्रकार किसी मार्मिक घटना को पढ़कर हृदय द्रवित हो जाए, तो करुण रस प्रकट होता है।

आचार्यों के अनुसार रस

भरतमुनि

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रस सिद्धांत का सर्वप्रथम व्यवस्थित प्रतिपादन किया। उन्होंने प्रसिद्ध सूत्र दिया —

"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।"

अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। यही सूत्र भारतीय रस सिद्धांत का आधार माना जाता है।

आचार्य अभिनवगुप्त

आचार्य अभिनवगुप्त ने रस को सामान्य भाव नहीं, बल्कि अलौकिक आनंद (ब्रह्मानंद-सहोदर) माना है। उनके अनुसार सहृदय व्यक्ति काव्य का आस्वादन करते समय व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठकर विशुद्ध सौंदर्य-आनंद का अनुभव करता है। शांत रस को नवाँ रस स्वीकार करने में इनकी प्रमुख भूमिका रही।

आचार्य मम्मट

आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में रस को काव्य का प्रधान तत्त्व स्वीकार किया है। उनके अनुसार रस की उपस्थिति ही किसी काव्य को प्रभावशाली और हृदयग्राही बनाती है।

आचार्य विश्वनाथ

आचार्य विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में स्पष्ट कहा है — "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।" अर्थात् जिस काव्य में रस की अनुभूति हो, वही वास्तविक काव्य कहलाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रस को मानव हृदय की भावात्मक अनुभूति से जोड़ते हुए माना कि श्रेष्ठ साहित्य वही है, जो पाठक के मन में गहन भावानुभूति उत्पन्न करे।

ध्यान दें: प्रतियोगी परीक्षाओं में "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः", "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" तथा रस सिद्धांत के प्रवर्तक से संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।

रस के अंग

रस की निष्पत्ति अचानक नहीं होती, बल्कि अनेक भावात्मक तत्त्वों के परस्पर संयोग से होती है। भरतमुनि ने स्पष्ट किया है कि विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से स्थायी भाव परिपक्व होकर रस का रूप ग्रहण करता है।

रस के चार प्रमुख अंग माने जाते हैं — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी (व्यभिचारी) भाव।

1. स्थायी भाव

स्थायी भाव वह मूल भाव है, जो मनुष्य के हृदय में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहता है। यही भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से परिपक्व होकर रस का रूप धारण करता है। प्रत्येक रस का अपना एक स्थायी भाव होता है।

उदाहरण: रति से शृंगार रस, शोक से करुण रस, उत्साह से वीर रस तथा क्रोध से रौद्र रस की उत्पत्ति होती है।

2. विभाव

विभाव वे कारण या परिस्थितियाँ हैं, जिनसे किसी स्थायी भाव का उदय होता है। इसके दो भेद हैं —

आलंबन विभावउद्दीपन विभाव
आलंबन: वह व्यक्ति, वस्तु या पात्र जिसके कारण भाव उत्पन्न होउद्दीपन: वे बाहरी परिस्थितियाँ जो भाव को तीव्र बनाएँ
आलंबन: श्रीराम के प्रति सीता का प्रेम — यहाँ श्रीराम आलंबन हैंउद्दीपन: चाँदनी रात, वसंत ऋतु, पुष्पों की सुगंध, वन की शोभा

3. अनुभाव

अनुभाव वे बाहरी चेष्टाएँ या शारीरिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जिनके माध्यम से मन के भाव प्रकट होते हैं। इन्हें देखकर पाठक या दर्शक पात्र की मनःस्थिति का अनुमान लगा सकता है।

उदाहरण: आँसू बहना, मुस्कराना, रोमांच होना, सिर झुकाना, भौंहें चढ़ाना, काँपना, हँसना।

4. संचारी (व्यभिचारी) भाव

संचारी भाव वे अस्थायी भाव हैं जो कुछ समय के लिए स्थायी भाव की सहायता करते हैं और बाद में समाप्त हो जाते हैं। ये स्थायी भाव को पुष्ट बनाकर रस की निष्पत्ति में सहायक होते हैं। परंपरा में इनकी संख्या 33 मानी गई है।

निर्वेद, ग्लानि, शंका, उत्सुकता, चिंता, लज्जा, स्मृति, हर्ष, विषाद, मोह, दैन्य, आवेग, जड़ता, गर्व आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

चारों अंगों को एक उदाहरण से समझें

मान लीजिए कोई सैनिक देश की रक्षा करते हुए युद्धभूमि में शत्रु का सामना कर रहा है।

अंगइस प्रसंग में
स्थायी भावप्रसंग: उत्साह
आलंबन विभावप्रसंग: सैनिक और शत्रु
उद्दीपन विभावप्रसंग: रणभूमि, शंखनाद, तिरंगा, युद्ध का वातावरण
अनुभावप्रसंग: निर्भीक मुद्रा, तेजस्वी वाणी, शस्त्र चलाना
संचारी भावप्रसंग: धैर्य, गर्व, आवेग, स्मृति

इन सभी के संयुक्त प्रभाव से सहृदय पाठक के मन में वीर रस की अनुभूति होती है।

परीक्षा टिप: यदि पूछा जाए कि "रस की निष्पत्ति किन तत्त्वों से होती है?" तो उत्तर होगा — विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से स्थायी भाव रस में परिणत होता है।

रस के प्रकार — आठ, नौ या ग्यारह?

यह वह बिंदु है जहाँ सर्वाधिक भ्रम होता है। सच यह है कि रसों की संख्या समय के साथ बढ़ती रही है —

संख्याआधार
8 रसआधार: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में — शांत रस सम्मिलित नहीं था
9 रस (नवरस)आधार: अभिनवगुप्त एवं मम्मट द्वारा शांत रस जोड़े जाने पर — यही सर्वाधिक प्रचलित मत है
11 रसआधार: परवर्ती आचार्यों द्वारा वात्सल्य एवं भक्ति जोड़े जाने पर
परीक्षा की दृष्टि से: यदि प्रश्न में आधार न बताया गया हो, तो मानक उत्तर 9 (नवरस) है। यदि विशेष रूप से भरतमुनि के अनुसार पूछा जाए, तो उत्तर 8 होगा।

नवरस निम्नलिखित हैं —

  1. शृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस
  4. रौद्र रस
  5. वीर रस
  6. भयानक रस
  7. बीभत्स रस
  8. अद्भुत रस
  9. शांत रस

1. शृंगार रस

रति स्थायी भाव के परिपक्व होने पर शृंगार रस की निष्पत्ति होती है। इसे रसराज अर्थात् रसों का राजा कहा जाता है। प्रेम, सौंदर्य, अनुराग, मिलन और विरह से संबंधित भाव इसके अंतर्गत आते हैं।

शृंगार के दो भेद हैं — संयोग शृंगार (नायक-नायिका के मिलन का वर्णन) तथा वियोग या विप्रलंभ शृंगार (विरह का वर्णन)।

उदाहरण:

बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करैं भौंहनु हँसैं, दैन कहैं नटि जाय॥

स्पष्टीकरण: यहाँ नायिका ने श्रीकृष्ण की मुरली छिपा दी है और बातों के रस के लालच में उसे लौटाने से मुकर रही है। नायक-नायिका की इस प्रेम-क्रीड़ा के कारण यहाँ संयोग शृंगार है। स्थायी भाव रति है।

2. हास्य रस

हास स्थायी भाव के विकसित होने पर हास्य रस उत्पन्न होता है। विनोदपूर्ण व्यवहार, विचित्र वेशभूषा, हास-परिहास तथा चुटीली अभिव्यक्तियाँ इसका आधार होती हैं।

उदाहरण:

बिन्ध्य के बासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृन्द सुखारे॥

स्पष्टीकरण: अहल्या के उद्धार की कथा सुनकर विंध्य के तपस्वी मुनि प्रसन्न हो उठते हैं कि अब उनकी पत्थर हो चुकी पत्नियों का भी उद्धार संभव है। यहाँ विनोद का भाव है, अतः हास्य रस है।

3. करुण रस

शोक स्थायी भाव के परिपक्व होने पर करुण रस की उत्पत्ति होती है। वियोग, मृत्यु, दुःख, असहायता और पीड़ा से जुड़े प्रसंग इस रस को उत्पन्न करते हैं।

उदाहरण:

अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ।
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले थे चुंबन शून्य कपोल॥

स्पष्टीकरण: नवविवाहित पति की असमय मृत्यु पर विधवा का विलाप — यहाँ स्थायी भाव शोक है, अतः करुण रस है।

ध्यान दें: करुण रस और वियोग शृंगार में अंतर यह है कि वियोग शृंगार में पुनर्मिलन की आशा बनी रहती है, जबकि करुण रस में वह आशा समाप्त हो चुकी होती है।

4. रौद्र रस

क्रोध स्थायी भाव के विकसित होने पर रौद्र रस की निष्पत्ति होती है। अन्याय, अत्याचार और अपमान के विरुद्ध उत्पन्न तीव्र आक्रोश इसका आधार होता है।

उदाहरण:

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे॥

स्पष्टीकरण: अर्जुन का क्रोध से जलना और हाथ मलना — स्थायी भाव क्रोध, अतः रौद्र रस।

5. वीर रस

उत्साह स्थायी भाव के परिपक्व होने पर वीर रस की निष्पत्ति होती है। यह रस साहस, पराक्रम, धैर्य, त्याग और कर्तव्यपरायणता का भाव उत्पन्न करता है।

उदाहरण:

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

स्पष्टीकरण: रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम का वर्णन — स्थायी भाव उत्साह, अतः वीर रस।

6. भयानक रस

भय स्थायी भाव के विकसित होने पर भयानक रस उत्पन्न होता है। अंधकार, हिंसक दृश्य, भूत-प्रेत अथवा किसी अनिष्ट की आशंका से यह रस प्रकट होता है।

उदाहरण:

एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही, पर्यो मूरछा खाय॥

स्पष्टीकरण: एक ओर अजगर, दूसरी ओर सिंह देखकर पथिक का मूर्छित हो जाना — स्थायी भाव भय, अतः भयानक रस।

7. बीभत्स रस

जुगुप्सा (घृणा) स्थायी भाव के परिपक्व होने पर बीभत्स रस की उत्पत्ति होती है। गंदगी, सड़ी-गली वस्तुओं अथवा घृणित दृश्यों के वर्णन से यह रस उत्पन्न होता है। इसे कहीं-कहीं वीभत्स भी लिखा जाता है, किंतु शुद्ध रूप बीभत्स है।

उदाहरण:

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥

स्पष्टीकरण: शव पर कौवे का आँखें निकालना और सियार का जीभ खींचना — घृणा उत्पन्न करने वाला दृश्य, अतः बीभत्स रस।

8. अद्भुत रस

विस्मय स्थायी भाव के विकसित होने पर अद्भुत रस उत्पन्न होता है। किसी आश्चर्यजनक घटना, वस्तु या दृश्य को देखकर यह रस प्रकट होता है।

उदाहरण:

अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥

स्पष्टीकरण: श्रीकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्मांड देखकर यशोदा का चकित रह जाना — स्थायी भाव विस्मय, अतः अद्भुत रस।

9. शांत रस

निर्वेद (वैराग्य) स्थायी भाव के परिपक्व होने पर शांत रस की निष्पत्ति होती है। सांसारिक मोह से विरक्ति, आत्मज्ञान तथा मन की शांति इसका आधार है।

उदाहरण:

मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥

स्पष्टीकरण: शरीर की नश्वरता का बोध और सांसारिक गर्व की व्यर्थता — स्थायी भाव निर्वेद, अतः शांत रस।

रसस्थायी भाव, देवता एवं रंग
शृंगारविवरण: रति · विष्णु · श्याम
हास्यविवरण: हास · प्रमथ · श्वेत
करुणविवरण: शोक · यम · कपोत (धूसर)
रौद्रविवरण: क्रोध · रुद्र · रक्त (लाल)
वीरविवरण: उत्साह · इन्द्र · गौर (स्वर्णाभ)
भयानकविवरण: भय · काल · कृष्ण (काला)
बीभत्सविवरण: जुगुप्सा · महाकाल · नील
अद्भुतविवरण: विस्मय · ब्रह्मा · पीत
शांतविवरण: निर्वेद · नारायण · धवल (श्वेत)

वात्सल्य एवं भक्ति रस

नवरस के अतिरिक्त परवर्ती आचार्यों ने दो और रस स्वीकार किए हैं, जो हिंदी साहित्य में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

वात्सल्य रस

वात्सल्य (संतान-प्रेम) स्थायी भाव के परिपक्व होने पर वात्सल्य रस की निष्पत्ति होती है। माता-पिता का अपनी संतान के प्रति स्नेह इसका आधार है। हिंदी साहित्य में सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है।

उदाहरण:

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलरावै जोइ सोइ कछु गावै॥

स्पष्टीकरण: यशोदा का बालकृष्ण को पालने में झुलाना और लाड़ करना — स्थायी भाव वात्सल्य।

भक्ति रस

देव-रति (ईश्वर के प्रति अनुराग) स्थायी भाव के परिपक्व होने पर भक्ति रस की उत्पत्ति होती है। भक्तिकालीन कवियों — तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, कबीर — की रचनाओं में यह रस प्रधान रूप से मिलता है।

उदाहरण:

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव-नीर-निधि, नाम निज नाव रे॥

स्पष्टीकरण: ईश्वर-नाम के प्रति अनन्य अनुराग — स्थायी भाव देव-रति, अतः भक्ति रस।

यहाँ तक आपने सीखा
  • रस की परिभाषा तथा प्रमुख आचार्यों के मत
  • रस के चारों अंग — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
  • नवरस का विस्तृत विवेचन उदाहरण सहित
  • वात्सल्य एवं भक्ति रस

अब आगे — रस की पहचान के नियम, रस और भाव का अंतर, परीक्षोपयोगी तथ्य तथा 32 अभ्यास प्रश्न।

रस की पहचान कैसे करें?

किसी काव्यांश में रस की पहचान करने के लिए सबसे पहले उसमें निहित मुख्य भाव (स्थायी भाव) को समझना आवश्यक है। इसके बाद यह देखना चाहिए कि उस भाव को उत्पन्न करने वाले विभाव, अनुभाव और संचारी भाव कौन-से हैं।

पहचान के सरल चरण

  • काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें।
  • उसमें व्यक्त प्रमुख भाव की पहचान करें।
  • उस भाव का स्थायी भाव निर्धारित करें।
  • विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों का विश्लेषण करें।
  • स्थायी भाव के आधार पर संबंधित रस का निर्णय करें।

स्थायी भाव से रस — पहचान तालिका

स्थायी भावरस
रतिरस: शृंगार
हासरस: हास्य
शोकरस: करुण
क्रोधरस: रौद्र
उत्साहरस: वीर
भयरस: भयानक
जुगुप्सारस: बीभत्स
विस्मयरस: अद्भुत
निर्वेदरस: शांत
वात्सल्यरस: वात्सल्य
देव-रतिरस: भक्ति

रस और भाव में अंतर

भाव मन की वह मूल अवस्था है जो प्रत्येक मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। जब यही भाव विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के संयोग से परिपक्व होकर सहृदय पाठक के हृदय में सौंदर्यपूर्ण आनंद के रूप में अनुभव होता है, तब वह रस कहलाता है।

रसभाव
रस: सौंदर्यपूर्ण आनंदानुभूतिभाव: मन की स्वाभाविक अवस्था
रस: विभाव, अनुभाव व संचारी भाव के संयोग से निष्पन्नभाव: स्वतः विद्यमान
रस: पाठक/दर्शक के हृदय में उत्पन्न होता हैभाव: पात्र के हृदय में विद्यमान रहता है
रस: उदाहरण — शृंगार रस, वीर रसभाव: उदाहरण — रति, उत्साह, शोक

परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

  • रस सिद्धांत के प्रवर्तक — भरतमुनि
  • रस सिद्धांत का मूल ग्रंथ — नाट्यशास्त्र
  • भरतमुनि के अनुसार रसों की संख्या — 8
  • शांत रस जोड़ने के बाद — 9 (नवरस)
  • वात्सल्य एवं भक्ति सहित — 11
  • रस का मूल सूत्र — "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"
  • "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" — आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण)
  • रसराज कहा जाता है — शृंगार रस को
  • रस के अंग — 4 (स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव)
  • संचारी भावों की संख्या — 33
  • विभाव के भेद — 2 (आलंबन, उद्दीपन)
  • वात्सल्य रस का सम्राट — सूरदास
  • रस को ब्रह्मानंद-सहोदर कहा — आचार्य अभिनवगुप्त ने

रस : अभ्यास प्रश्न

नीचे दिए गए प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से तैयार किए गए हैं। उत्तर देखने से पहले स्वयं हल करने का प्रयास कीजिए।

1. रस सिद्धांत के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
(क) मम्मट (ख) भरतमुनि (ग) विश्वनाथ (घ) अभिनवगुप्त

2. रस सिद्धांत का प्रतिपादन किस ग्रंथ में हुआ है?
(क) काव्यप्रकाश (ख) साहित्यदर्पण (ग) नाट्यशास्त्र (घ) ध्वन्यालोक

3. भरतमुनि ने कितने रस माने थे?
(क) 8 (ख) 9 (ग) 10 (घ) 11

4. शांत रस को नवाँ रस किसने स्वीकार किया?
(क) भरतमुनि (ख) अभिनवगुप्त (ग) दंडी (घ) भामह

5. "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" किसका कथन है?
(क) मम्मट (ख) भरतमुनि (ग) विश्वनाथ (घ) रामचंद्र शुक्ल

6. रस को 'ब्रह्मानंद-सहोदर' किसने कहा?
(क) विश्वनाथ (ख) अभिनवगुप्त (ग) मम्मट (घ) भरतमुनि

7. रस के कुल कितने अंग होते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच

8. विभाव के कितने भेद होते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच

9. जिस व्यक्ति या वस्तु के कारण भाव उत्पन्न हो, उसे क्या कहते हैं?
(क) उद्दीपन विभाव (ख) आलंबन विभाव (ग) अनुभाव (घ) संचारी भाव

10. चाँदनी रात, वसंत ऋतु आदि किसके उदाहरण हैं?
(क) आलंबन विभाव (ख) उद्दीपन विभाव (ग) अनुभाव (घ) स्थायी भाव

11. आँसू बहना, रोमांच होना, काँपना — ये क्या हैं?
(क) विभाव (ख) अनुभाव (ग) स्थायी भाव (घ) संचारी भाव

12. संचारी भावों की संख्या कितनी मानी गई है?
(क) 8 (ख) 9 (ग) 33 (घ) 11

13. संचारी भाव को और किस नाम से जाना जाता है?
(क) स्थायी भाव (ख) व्यभिचारी भाव (ग) आलंबन (घ) उद्दीपन

14. शृंगार रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) हास (ख) रति (ग) उत्साह (घ) शोक

15. किस रस को 'रसराज' कहा जाता है?
(क) वीर (ख) करुण (ग) शृंगार (घ) शांत

16. शृंगार रस के कितने भेद होते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच

17. करुण रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) क्रोध (ख) भय (ग) शोक (घ) निर्वेद

18. वीर रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) उत्साह (ख) क्रोध (ग) विस्मय (घ) रति

19. रौद्र रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) भय (ख) क्रोध (ग) हास (घ) जुगुप्सा

20. जुगुप्सा किस रस का स्थायी भाव है?
(क) भयानक (ख) बीभत्स (ग) अद्भुत (घ) शांत

21. विस्मय किस रस का स्थायी भाव है?
(क) अद्भुत (ख) भयानक (ग) हास्य (घ) वीर

22. शांत रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) रति (ख) निर्वेद (ग) शोक (घ) हास

23. वात्सल्य रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) देव-रति (ख) वात्सल्य (ग) रति (घ) स्नेह

24. भक्ति रस का स्थायी भाव क्या है?
(क) रति (ख) निर्वेद (ग) देव-रति (घ) वात्सल्य

25. हिंदी साहित्य में वात्सल्य रस का सम्राट किसे कहा जाता है?
(क) तुलसीदास (ख) सूरदास (ग) कबीर (घ) मीराबाई

26. "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" — इसमें कौन-सा रस है?
(क) रौद्र (ख) वीर (ग) करुण (घ) अद्भुत

27. "जसोदा हरि पालनैं झुलावै" — इसमें कौन-सा रस है?
(क) शृंगार (ख) वात्सल्य (ग) भक्ति (घ) हास्य

28. वियोग शृंगार और करुण रस में मुख्य अंतर क्या है?
(क) स्थायी भाव का (ख) पुनर्मिलन की आशा का (ग) पात्रों का (घ) छंद का

29. शृंगार रस का अधिष्ठाता देवता कौन है?
(क) इन्द्र (ख) विष्णु (ग) रुद्र (घ) यम

30. वीर रस का अधिष्ठाता देवता कौन है?
(क) इन्द्र (ख) ब्रह्मा (ग) नारायण (घ) महाकाल

31. करुण रस का रंग क्या माना गया है?
(क) लाल (ख) श्वेत (ग) कपोत (धूसर) (घ) पीत

32. वात्सल्य एवं भक्ति सहित रसों की कुल संख्या कितनी हो जाती है?
(क) 9 (ख) 10 (ग) 11 (घ) 12

उत्तरमाला देखें

1. (ख)    2. (ग)    3. (क)    4. (ख)    5. (ग)    6. (ख)    7. (ग)    8. (क)    9. (ख)    10. (ख)    11. (ख)

12. (ग)    13. (ख)    14. (ख)    15. (ग)    16. (क)    17. (ग)    18. (क)    19. (ख)    20. (ख)    21. (क)    22. (ख)

23. (ख)    24. (ग)    25. (ख)    26. (ख)    27. (ख)    28. (ख)    29. (ख)    30. (क)    31. (ग)    32. (ग)

रस से संबंधित प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

रस किसे कहते हैं?

काव्य, नाटक या साहित्य के आस्वादन से सहृदय पाठक अथवा दर्शक के मन में उत्पन्न होने वाली सौंदर्यपूर्ण आनंदानुभूति को रस कहते हैं।

रस के कितने प्रकार होते हैं?

भरतमुनि ने मूलतः आठ रस माने थे। बाद में शांत रस जुड़ने पर नौ रस (नवरस) प्रचलित हुए — शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत तथा शांत। वात्सल्य एवं भक्ति को जोड़ने पर यह संख्या ग्यारह हो जाती है।

रस के प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं?

रस के चार प्रमुख अंग हैं — स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी (व्यभिचारी) भाव।

रस सिद्धांत के प्रवर्तक कौन हैं?

रस सिद्धांत के प्रवर्तक भरतमुनि हैं। उन्होंने नाट्यशास्त्र में इसका व्यवस्थित प्रतिपादन किया।

रस और भाव में क्या अंतर है?

भाव मन की स्वाभाविक अवस्था है, जो पात्र के हृदय में विद्यमान रहती है; जबकि रस वह आनंदानुभूति है, जो विभाव-अनुभाव-संचारी भाव के संयोग से पाठक के हृदय में उत्पन्न होती है।

किस रस को रसराज कहा जाता है?

शृंगार रस को रसराज अर्थात् रसों का राजा कहा जाता है, क्योंकि इसका क्षेत्र सबसे व्यापक है और यह अन्य रसों की अपेक्षा अधिक काव्य में प्रयुक्त होता है।

करुण रस और वियोग शृंगार में क्या अंतर है?

वियोग शृंगार में नायक-नायिका के पुनर्मिलन की आशा बनी रहती है, जबकि करुण रस में वह आशा समाप्त हो चुकी होती है। दोनों में वियोग का वर्णन होते हुए भी यही मूल अंतर है।

वात्सल्य रस किसे कहते हैं?

माता-पिता के अपनी संतान के प्रति स्नेह (वात्सल्य स्थायी भाव) के परिपक्व होने पर जो रस निष्पन्न होता है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं। सूरदास को इसका सम्राट कहा जाता है।

निष्कर्ष

रस भारतीय काव्यशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। यह केवल साहित्यिक सिद्धांत नहीं, बल्कि काव्य के सौंदर्य, प्रभाव और भावानुभूति का मूल आधार है। किसी भी रचना का वास्तविक आनंद तभी प्राप्त होता है, जब पाठक उसके रस का अनुभव कर सके।

रस को रटने के स्थान पर उसके स्थायी भाव को पहचानना सीख लेना अधिक उपयोगी है — क्योंकि परीक्षा में दिए गए काव्यांश का रस निर्धारित करने की कुंजी यही है। नवरस के स्थायी भाव कंठस्थ कर लीजिए, शेष अभ्यास से स्वयं सध जाएगा।

लेखक परिचय
बालकृष्ण द्विवेदी

शिक्षक, भाषाविद् एवं लेखक। हिंदी भाषा, व्याकरण और साहित्य के अध्येता तथा हिंदीजन के संस्थापक। उद्देश्य — हिंदी की प्रामाणिक अध्ययन सामग्री विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों तक सरल भाषा में पहुँचाना।

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