अलंकार किसे कहते हैं? जो तत्त्व काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को सुंदर, प्रभावशाली तथा आकर्षक बनाता है, उसे अलंकार कहते हैं। अलंकार मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं — शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार। इनके अंतर्गत अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा सहित 25 से अधिक प्रमुख अलंकार आते हैं।
अलंकार शब्द का शाब्दिक अर्थ आभूषण है। जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा आकर्षक बनाते हैं। अलंकारों के प्रयोग से कविता में माधुर्य, चमत्कार, कलात्मकता और अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास होता है।
रस और छंद की भाँति अलंकार भी काव्यशास्त्र का एक अनिवार्य अंग है। यह केवल कविता की बाहरी सजावट नहीं है, बल्कि भावों को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी है। इस लेख में अलंकार की परिभाषा, व्युत्पत्ति, तीनों भेद, उनके उपभेद, प्रामाणिक उदाहरण, पहचान के सूत्र, मिलते-जुलते अलंकारों का अंतर तथा अभ्यास-प्रश्न — सब कुछ क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत है।
अलंकार किसे कहते हैं? (Alankar Kise Kahate Hain)
"अलंकरोति इति अलंकारः"
जो तत्त्व काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा आकर्षक बनाता है, उसे अलंकार कहते हैं। सरल शब्दों में, जो काव्य की शोभा बढ़ाए और उसकी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाए, वही अलंकार कहलाता है।
अलंकार की व्युत्पत्ति एवं शाब्दिक अर्थ
अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति अलम् + कृ + घञ् से मानी जाती है। यहाँ अलम् का अर्थ है – पर्याप्त, सुंदर अथवा शोभायुक्त तथा कृ का अर्थ है – करना। अर्थात् जो किसी वस्तु या काव्य को अलंकृत या सुशोभित करे, उसे अलंकार कहते हैं।
विद्वानों के अनुसार अलंकार
- आचार्य भामह – अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाला धर्म है।
- आचार्य दंडी – "काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते" अर्थात् काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म ही अलंकार कहे जाते हैं।
- आचार्य मम्मट – अलंकार काव्य की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।
- आचार्य विश्वनाथ – अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले अस्थिर धर्म हैं, जो अंगद आदि आभूषणों के समान हैं।
अलंकार के भेद
अलंकार मुख्यतः तीन प्रकार के माने जाते हैं। आचार्यों ने इनके अंतर्गत सौ से अधिक अलंकार गिनाए हैं, जिनमें से 25 प्रमुख अलंकारों का विस्तृत विवेचन आगे किया गया है—
- शब्दालंकार – जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों की विशेष व्यवस्था, पुनरावृत्ति अथवा ध्वनि के कारण उत्पन्न होता है।
- अर्थालंकार – जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के अर्थ, भाव, कल्पना अथवा विचार के कारण उत्पन्न होता है।
- उभयालंकार – जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्द और अर्थ दोनों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न होता है।
| भेद | सौंदर्य का आधार | प्रमुख अलंकार |
| शब्दालंकार (6 भेद) | शब्द एवं ध्वनि का चमत्कार | अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति-प्रकाश, वीप्सा |
| अर्थालंकार (17 भेद) | अर्थ, भाव एवं कल्पना | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, दृष्टांत, उदाहरण, संदेह, भ्रांतिमान, अन्योक्ति, व्यतिरेक, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिंग, विभावना, विशेषोक्ति, स्वभावोक्ति |
| उभयालंकार (2 भेद) | शब्द और अर्थ दोनों | संसृष्टि, संकर |
अलंकार की पहचान कैसे करें?
यदि किसी काव्य में शब्दों की विशेष पुनरावृत्ति, ध्वनि या शब्द-चमत्कार के कारण सौंदर्य उत्पन्न हो, तो वहाँ शब्दालंकार होता है। इसके विपरीत यदि सौंदर्य शब्दों के अर्थ, कल्पना, भाव या तुलना के कारण उत्पन्न हो, तो वहाँ अर्थालंकार होता है। और यदि दोनों प्रकार का चमत्कार एक साथ विद्यमान हो, तो वहाँ उभयालंकार होता है।
एक सरल कसौटी यह है – यदि उन्हीं शब्दों के स्थान पर उनके पर्यायवाची रख देने पर चमत्कार समाप्त हो जाए, तो वह शब्दालंकार है; और यदि पर्यायवाची रखने पर भी चमत्कार बना रहे, तो वह अर्थालंकार है।
1. शब्दालंकार
अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)
परिभाषा: जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की बार-बार आवृत्ति होकर काव्य में मधुरता उत्पन्न करे, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण:
चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल-थल में।
स्पष्टीकरण: यहाँ 'च' वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है, जिससे काव्य में मधुर ध्वनि उत्पन्न हुई है।
अनुप्रास अलंकार के भेद
अनुप्रास अलंकार के मुख्यतः पाँच भेद माने जाते हैं—
1. छेकानुप्रास – जहाँ अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक ही क्रम में केवल एक बार हो।
मुद मंगलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू॥
स्पष्टीकरण: यहाँ 'मुद–मंगलमय' में 'म' की, 'संत–समाजू' में 'स' की तथा 'जो–जग–जंगम' में 'ज' की आवृत्ति हुई है। प्रत्येक वर्ण अपने युग्म में एक ही क्रम से आया है, अनेक बार नहीं – यही छेकानुप्रास का लक्षण है।
2. वृत्त्यानुप्रास – जहाँ एक ही व्यंजन की आवृत्ति अनेक बार हो।
सेस महेस गनेस दिनेस,
सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
स्पष्टीकरण: यहाँ 'स' वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है।
3. श्रुत्यानुप्रास – जहाँ एक ही उच्चारण-स्थान से बोले जाने वाले वर्णों की आवृत्ति हो, जिससे कानों को मधुरता का अनुभव हो।
तुलसीदास सीदति निसिदिन,
देखत तुम्हारि निठुराई।
स्पष्टीकरण: यहाँ त, द, स, न – सभी दंत्य वर्ण हैं, जिनकी आवृत्ति से श्रुति-माधुर्य उत्पन्न हुआ है।
4. अन्त्यानुप्रास – जहाँ पद अथवा चरण के अंत में समान वर्ण या तुक आए।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
स्पष्टीकरण: यहाँ दोनों चरणों के अंत में 'गर' की तुक मिल रही है। तुक का यही विधान छंद के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण होता है।
5. लाटानुप्रास – जहाँ किसी शब्द अथवा वाक्यांश की आवृत्ति उसी अर्थ में हो, किंतु अन्वय करने पर तात्पर्य बदल जाए।
पूत सपूत तो क्यों धन संचय?
पूत कपूत तो क्यों धन संचय?
स्पष्टीकरण: दोनों पंक्तियों में शब्द और उनका अर्थ समान है, किंतु अन्वय बदल जाने से तात्पर्य भिन्न हो गया है – पुत्र सुयोग्य हो तो धन संचय की आवश्यकता नहीं, और कुपुत्र हो तो धन संचय व्यर्थ है।
यमक अलंकार (Yamak Alankar)
परिभाषा: जहाँ एक ही शब्द एक से अधिक बार आए और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण:
कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय॥
स्पष्टीकरण: यहाँ एक कनक का अर्थ सोना तथा दूसरे कनक का अर्थ धतूरा है। कवि का आशय यह है कि सोने में धतूरे से सौ गुनी अधिक मादकता होती है – धतूरा तो खाने पर उन्मत्त करता है, किंतु सोना पाने मात्र से ही मनुष्य उन्मत्त हो जाता है। एक ही शब्द दो बार आया है और दोनों बार अर्थ भिन्न है, अतः यहाँ यमक अलंकार है।
यमक अलंकार के भेद
1. अभंग पद यमक – जहाँ शब्द अपने पूर्ण रूप में, बिना टूटे दोहराया जाए और प्रत्येक बार भिन्न अर्थ दे।
कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
स्पष्टीकरण: 'कनक' शब्द दोनों बार अखंडित रूप में आया है।
2. सभंग पद यमक – जहाँ शब्दों को तोड़-जोड़कर आवृत्ति की जाए और उससे भिन्न अर्थ निकले।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।
स्पष्टीकरण: यहाँ 'मनका' पहली बार माला का दाना है, तथा दूसरी बार 'मन का' (मन से संबंधित) – शब्द को तोड़ने पर भिन्न अर्थ प्राप्त होता है।
श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar)
परिभाषा: जहाँ शब्द केवल एक बार प्रयुक्त हो, लेकिन उसके अनेक अर्थ निकलें, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। श्लेष का शाब्दिक अर्थ है – चिपका हुआ, अर्थात् एक ही शब्द से अनेक अर्थ चिपके रहते हैं।
उदाहरण:
रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
स्पष्टीकरण: यहाँ 'पानी' शब्द एक ही बार प्रयुक्त होकर तीन अर्थ देता है—
- मोती के लिए — चमक अथवा आभा
- मनुष्य के लिए — मान एवं प्रतिष्ठा
- चूने के लिए — जल
एक ही शब्द से अनेक अर्थ निकलने की यह प्रक्रिया शब्द-शक्ति के अध्ययन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
श्लेष अलंकार के भेद
1. शब्द-श्लेष – जहाँ चमत्कार शब्द पर आधारित हो, अर्थात् उस शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख देने से चमत्कार समाप्त हो जाए। ऊपर दिया गया 'रहिमन पानी राखिए' वाला उदाहरण शब्द-श्लेष का ही है, क्योंकि 'पानी' के स्थान पर 'जल' रखते ही तीनों अर्थ नष्ट हो जाते हैं।
2. अर्थ-श्लेष – जहाँ चमत्कार अर्थ पर आधारित हो, अर्थात् पर्यायवाची शब्द रख देने पर भी दोनों अर्थ बने रहें।
जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय॥
स्पष्टीकरण: यह कथन एक साथ दीपक और कुपुत्र दोनों पर घटित होता है। यहाँ 'बारे' का अर्थ दीपक के संदर्भ में जलाने पर तथा कुपुत्र के संदर्भ में बचपन में है; और 'बढ़े' का अर्थ दीपक के संदर्भ में बुझने पर तथा कुपुत्र के संदर्भ में बड़ा होने पर है। अर्थात् दीपक जलाने पर प्रकाश देता है और बुझने पर अंधकार कर देता है; इसी प्रकार कुपुत्र बचपन में सुख देता है और बड़ा होकर कुल को कलंकित करता है।
ध्यान दें: शब्द-श्लेष शब्दालंकार के अंतर्गत आता है, जबकि अर्थ-श्लेष को अनेक आचार्य अर्थालंकार के अंतर्गत रखते हैं।
वक्रोक्ति अलंकार (Vakrokti Alankar)
परिभाषा: जहाँ वक्ता के कहे गए शब्दों का श्रोता कोई दूसरा अर्थ ग्रहण कर ले, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। वक्रोक्ति का शाब्दिक अर्थ है – टेढ़ी उक्ति, अर्थात् वह कथन जो सीधे अर्थ में न लिया जाए।
वक्रोक्ति अलंकार के भेद
वक्रोक्ति अलंकार के दो भेद माने जाते हैं—
1. श्लेष वक्रोक्ति – जहाँ श्रोता शब्द के अनेकार्थी होने के कारण भिन्न अर्थ ग्रहण करे।
को तुम? – 'घनश्याम।'
'हौं तौ बरसौ कितहूँ जाय।'
स्पष्टीकरण: वक्ता स्वयं को 'घनश्याम' अर्थात् श्रीकृष्ण बताता है, किंतु श्रोता 'घनश्याम' का दूसरा अर्थ बादल ग्रहण कर लेता है और उत्तर देता है कि तब कहीं और जाकर बरसो। भिन्न अर्थ श्लेष के कारण निकला है, अतः यहाँ श्लेष वक्रोक्ति है।
2. काकु वक्रोक्ति – जहाँ श्रोता कंठ की ध्वनि अर्थात् स्वर के उतार-चढ़ाव के कारण भिन्न अर्थ ग्रहण करे।
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू।
तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥
स्पष्टीकरण: सीता जी के शब्द ऊपर से यह कहते प्रतीत होते हैं कि वे वन के योग्य हैं तथा राम के लिए तप और अपने लिए भोग उचित है। किंतु कहने के ढंग अर्थात् काकु के कारण इसका ठीक उल्टा अर्थ निकलता है – मैं सुकुमारी हूँ, फिर भी वन ही मेरे योग्य है; तप आपके लिए और भोग मेरे लिए, यह भला कैसे हो सकता है। स्वर के उतार-चढ़ाव से अर्थ पलट जाने के कारण यहाँ काकु वक्रोक्ति है।
ध्यान दें: श्लेष में शब्द स्वयं अनेक अर्थ देता है, जबकि श्लेष वक्रोक्ति में उस अनेकार्थता का लाभ उठाकर श्रोता भिन्न अर्थ ग्रहण करता है। अर्थ ग्रहण करने वाला कौन है – यही दोनों को अलग करता है।
पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार
परिभाषा: जहाँ किसी शब्द की पुनरावृत्ति से सौंदर्य उत्पन्न हो और दोनों बार अर्थ समान रहे, वहाँ पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार होता है।
उदाहरण:
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।
स्पष्टीकरण: यहाँ 'मधुर' शब्द की पुनरावृत्ति समान अर्थ में हुई है। ध्यान रहे – यमक में अर्थ बदल जाता है, पुनरुक्ति-प्रकाश में नहीं।
वीप्सा अलंकार
परिभाषा: जहाँ किसी भाव की तीव्रता, आदर, हर्ष, शोक या घृणा प्रकट करने के लिए शब्दों की बार-बार पुनरावृत्ति की जाए, वहाँ वीप्सा अलंकार होता है।
उदाहरण:
हा! हा! भारत-दुर्दशा देखी न जाय।
स्पष्टीकरण: 'हा! हा!' की पुनरावृत्ति शोक की तीव्रता को व्यक्त कर रही है।
2. अर्थालंकार
उपमा अलंकार (Upma Alankar)
परिभाषा: जहाँ दो वस्तुओं के गुणों की समानता के आधार पर तुलना की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उदाहरण:
पीपर पात सरिस मन डोला।
स्पष्टीकरण: यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।
उपमा अलंकार के अंग
उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं—
- उपमेय – जिसकी तुलना की जाए।
- उपमान – जिससे तुलना की जाए।
- साधारण धर्म – वह समान गुण, जिसके आधार पर तुलना की जाए।
- वाचक शब्द – तुलना प्रकट करने वाला शब्द, जैसे – सा, सी, सम, समान, सरिस, जैसा, ज्यों।
उपर्युक्त उदाहरण 'पीपर पात सरिस मन डोला' में उपमेय मन है, उपमान पीपल का पत्ता है, साधारण धर्म डोलना है तथा वाचक शब्द 'सरिस' है।
उपमा अलंकार के भेद
1. पूर्णोपमा – जहाँ उपमा के चारों अंग विद्यमान हों। ऊपर दिया गया 'पीपर पात सरिस मन डोला' इसी का उदाहरण है।
2. लुप्तोपमा – जहाँ उपमा के चारों अंगों में से कोई एक या अधिक अंग लुप्त हो।
कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
स्पष्टीकरण: यहाँ उपमान और वाचक शब्द लुप्त हैं, अतः यह लुप्तोपमा है।
रूपक अलंकार (Rupak Alankar)
परिभाषा: जहाँ उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप कर दिया जाए, अर्थात् दोनों को एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें कोई वाचक शब्द नहीं आता।
उदाहरण:
चरण-कमल बंदौं हरि राई।
स्पष्टीकरण: यहाँ भगवान के चरणों पर कमल का सीधा आरोप किया गया है – चरणों को कमल के समान नहीं, बल्कि कमल ही कह दिया गया है। अतः यह रूपक अलंकार है।
उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar)
परिभाषा: जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना अथवा कल्पना व्यक्त की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
उदाहरण:
सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मनो नीलमनि सैल पर, आतपु परो प्रभात॥
स्पष्टीकरण: उत्प्रेक्षा अलंकार में मनु, मानो, जनु, जानो, इव आदि संभावना-सूचक शब्दों का प्रयोग होता है। यहाँ 'मनो' शब्द संभावना प्रकट कर रहा है – पीत वस्त्र धारण किए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर की ऐसी शोभा है, मानो नीलमणि के पर्वत पर प्रातःकाल की धूप पड़ रही हो।
उपमा से अंतर: उपमा में समानता का कथन होता है और वाचक शब्द – सा, सी, सम, सरिस, समान – आते हैं; जबकि उत्प्रेक्षा में समानता नहीं, केवल संभावना अथवा कल्पना व्यक्त की जाती है और वाचक शब्द – मनु, मानो, जनु, जानो, इव – आते हैं।
अतिशयोक्ति अलंकार (Atishayokti Alankar)
परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का वर्णन लोक-सीमा से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥
स्पष्टीकरण: यहाँ चेतक की गति का लोक-सीमा से कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है, इसलिए अतिशयोक्ति अलंकार है।
मानवीकरण अलंकार
परिभाषा: जहाँ निर्जीव वस्तुओं, प्रकृति अथवा अमूर्त भावों को मनुष्य के समान व्यवहार करते हुए दिखाया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
उदाहरण:
दिवसावसान का समय,
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुंदरी परी-सी।
स्पष्टीकरण: यहाँ संध्या को मानवी (सुंदरी) के रूप में चित्रित किया गया है, इसलिए मानवीकरण अलंकार है।
विरोधाभास अलंकार
परिभाषा: जहाँ देखने में विरोध प्रतीत हो, किंतु वास्तव में विरोध न हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण:
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय॥
स्पष्टीकरण: सामान्यतः काले रंग में डूबने पर वस्तु मलिन होती है, किंतु यहाँ श्रीकृष्ण के प्रेम-रंग में डूबने पर मन का अधिक उज्ज्वल होना बताया गया है। देखने में विरोध प्रतीत होता है, पर वास्तव में विरोध नहीं है।
दृष्टांत अलंकार
परिभाषा: जहाँ दो स्वतंत्र वाक्यों में उपमेय, उपमान तथा उनके साधारण धर्मों में बिंब-प्रतिबिंब भाव हो, वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है। इसमें कोई वाचक शब्द (जैसे, ज्यों, समान) नहीं आता – पहले एक बात कही जाती है, फिर उससे मिलती-जुलती दूसरी बात उदाहरण के रूप में रखी जाती है।
उदाहरण:
सठ सुधरहिं सत संगति पाई।
पारस परस कुधातु सुहाई॥
स्पष्टीकरण: पहले वाक्य में कहा गया है कि दुष्ट व्यक्ति भी सत्संगति पाकर सुधर जाता है; दूसरे वाक्य में कहा गया है कि पारस के स्पर्श से निकृष्ट धातु भी सुंदर हो जाती है। दोनों वाक्य स्वतंत्र हैं, फिर भी उनमें बिंब-प्रतिबिंब का भाव है – सठ का प्रतिबिंब कुधातु में, सत्संगति का पारस-स्पर्श में तथा सुधरने का सुहाने में। अतः यहाँ दृष्टांत अलंकार है।
ध्यान दें: यदि इसी प्रकार के कथन में ज्यों, त्यों, जैसे आदि वाचक शब्द आ जाएँ, तो वहाँ दृष्टांत नहीं, बल्कि उदाहरण अलंकार होता है। वाचक शब्द की उपस्थिति या अनुपस्थिति ही इन दोनों को अलग करती है।
उदाहरण अलंकार (Udaharan Alankar)
परिभाषा: जहाँ उपमेय और उपमान के कथन में ज्यों, त्यों, जिमि, तिमि, जैसे, वैसे आदि वाचक शब्दों के साथ बिंब-प्रतिबिंब भाव हो, वहाँ उदाहरण अलंकार होता है।
उदाहरण:
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं।
जद्यपि ताहि कामना नाहीं॥
स्पष्टीकरण: यहाँ 'जिमि' वाचक शब्द के साथ नदियों के सागर में जा मिलने का दृष्टांत दिया गया है। वाचक शब्द की यही उपस्थिति इसे दृष्टांत अलंकार से अलग करती है – दृष्टांत में वाचक शब्द नहीं आता, उदाहरण अलंकार में आता है।
संदेह अलंकार
परिभाषा: जहाँ उपमेय और उपमान की अत्यधिक समानता के कारण यह निश्चय न हो सके कि वस्तु वास्तव में क्या है, और संशय अंत तक बना रहे, वहाँ संदेह अलंकार होता है।
उदाहरण:
यह काया है, या शेष उसी की छाया है?
स्पष्टीकरण: यहाँ वास्तविक स्वरूप के विषय में कोई निश्चित निर्णय नहीं हो पाता, संशय बना रहता है। अतः यहाँ संदेह अलंकार है।
भ्रांतिमान अलंकार
परिभाषा: जहाँ अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का निश्चित भ्रम हो जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
उदाहरण:
पायँ महावर दैन को, नाइन बैठी आय।
फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाय॥
स्पष्टीकरण: नायिका के पैरों में महावर लगाने आई नाइन उसकी स्वाभाविक लालिमा वाली एड़ी को ही महावर की गोली समझ बैठती है और बार-बार उसी को मलती रहती है। यहाँ संशय नहीं, बल्कि निश्चित भ्रम है, अतः भ्रांतिमान अलंकार है।
अन्योक्ति अलंकार
परिभाषा: जहाँ किसी अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत के विषय में बात कही जाए, अर्थात् कहा किसी और को जाए और लक्ष्य कोई और हो, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
माली आवत देखि के, कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुन लिए, काल्हि हमारी बार॥
स्पष्टीकरण: ऊपर से यह माली और कलियों की बात है, किंतु वास्तविक आशय काल की अनिवार्यता से है – आज जो खिले हुए हैं वे चुन लिए गए, कल हमारी बारी है। कहा कलियों को गया, लक्ष्य मनुष्य है।
व्यतिरेक अलंकार (Vyatirek Alankar)
परिभाषा: जहाँ उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ अथवा बढ़कर सिद्ध किया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
उदाहरण:
संत हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह पै कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता।
पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥
स्पष्टीकरण: कवियों ने संत के हृदय को मक्खन के समान कहा है, किंतु तुलसीदास इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि मक्खन तो अपने ही ताप से पिघलता है, जबकि संत दूसरों के दुःख से द्रवित होते हैं। यहाँ उपमेय (संत हृदय) को उपमान (मक्खन) से श्रेष्ठ बताया गया है, अतः व्यतिरेक अलंकार है।
अर्थान्तरन्यास अलंकार (Arthantaranyas Alankar)
परिभाषा: जहाँ किसी सामान्य कथन का समर्थन विशेष उदाहरण से अथवा विशेष कथन का समर्थन सामान्य नियम से किया जाए, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है।
उदाहरण:
बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय।
कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाय॥
स्पष्टीकरण: पहली पंक्ति में सामान्य नियम है कि गुणों के बिना केवल उपाधि पा लेने से कोई बड़ा नहीं होता। दूसरी पंक्ति में इसका समर्थन विशेष उदाहरण से किया गया है – धतूरे को 'कनक' कह देने मात्र से उसका गहना नहीं गढ़ा जा सकता। सामान्य का समर्थन विशेष से होने के कारण यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।
काव्यलिंग अलंकार (Kavyaling Alankar)
परिभाषा: जहाँ किसी कथन की पुष्टि के लिए कोई कारण अथवा युक्ति प्रस्तुत की जाए, वहाँ काव्यलिंग अलंकार होता है।
उदाहरण:
कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय॥
स्पष्टीकरण: पहली पंक्ति में कथन है कि सोने में धतूरे से सौ गुनी अधिक मादकता है। दूसरी पंक्ति उसका कारण देती है – धतूरा खाने पर उन्मत्त करता है, जबकि सोना पाने मात्र से ही मनुष्य उन्मत्त हो जाता है। कथन की पुष्टि हेतु कारण दिए जाने से यहाँ काव्यलिंग अलंकार है।
ध्यान दें: यही पंक्ति ऊपर यमक अलंकार के उदाहरण में भी आई है। एक ही काव्य-पंक्ति में एक से अधिक अलंकार हो सकते हैं – 'कनक' की आवृत्ति भिन्न अर्थों में होने से यहाँ यमक है और कथन का कारण दिए जाने से काव्यलिंग। परीक्षा में प्रश्न के संदर्भ के अनुसार उत्तर दीजिए।
विभावना अलंकार (Vibhavana Alankar)
परिभाषा: जहाँ कारण के अभाव में भी कार्य की उत्पत्ति दिखाई जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
उदाहरण:
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु करम करै विधि नाना॥
स्पष्टीकरण: यहाँ ब्रह्म के विषय में कहा गया है कि वह बिना पैरों के चलता है, बिना कानों के सुनता है तथा बिना हाथों के अनेक प्रकार के कर्म करता है। कारण के बिना कार्य होने के कारण यहाँ विभावना अलंकार है।
विशेषोक्ति अलंकार (Visheshokti Alankar)
परिभाषा: जहाँ कारण के उपस्थित रहते हुए भी कार्य की उत्पत्ति न हो, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
नेह न नैनन कौं कछु, उपजी बड़ी बलाय।
नीर भरे नित प्रति रहैं, तउ न प्यास बुझाय॥
स्पष्टीकरण: नेत्रों में निरंतर जल भरा रहता है, अर्थात् प्यास बुझने का कारण उपस्थित है; फिर भी प्यास नहीं बुझती। कारण के रहते हुए भी कार्य न होने के कारण यहाँ विशेषोक्ति अलंकार है।
ध्यान दें: विभावना और विशेषोक्ति परस्पर विपरीत हैं – विभावना में कारण नहीं, फिर भी कार्य होता है; विशेषोक्ति में कारण है, फिर भी कार्य नहीं होता।
स्वभावोक्ति अलंकार (Swabhavokti Alankar)
परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा क्रिया का उसके स्वाभाविक रूप में यथार्थ वर्णन किया जाए, वहाँ स्वभावोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल।
यहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारी लाल॥
स्पष्टीकरण: यहाँ श्रीकृष्ण के रूप का किसी कल्पना या अतिशयता के बिना, ज्यों का त्यों स्वाभाविक चित्रण किया गया है – सिर पर मुकुट, कमर में काछनी, हाथ में मुरली और गले में माला। अतः यहाँ स्वभावोक्ति अलंकार है।
3. उभयालंकार
परिभाषा: जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्द और अर्थ दोनों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न हो, वहाँ उभयालंकार होता है। इसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों एक साथ उपस्थित रहते हैं। उभयालंकार के दो भेद माने जाते हैं—
संसृष्टि अलंकार
परिभाषा: जहाँ दो या दो से अधिक अलंकार परस्पर मिले बिना, अलग-अलग स्थिति में विद्यमान रहें, वहाँ संसृष्टि अलंकार होता है। आचार्य रुय्यक ने अपने ग्रंथ अलंकारसर्वस्व में इसे तिल-तंडुल न्याय कहा है – जिस प्रकार तिल और चावल मिलकर भी अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं, उसी प्रकार संसृष्टि में अलंकार अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं।
उदाहरण: इसे समझने के लिए वही पंक्ति फिर से लीजिए, जो ऊपर अनुप्रास के उदाहरण में आई थी—
चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल-थल में।
स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में 'च' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास तो है ही, साथ ही किरणों के खेलने के वर्णन से मानवीकरण भी है। दोनों अलंकार अलग-अलग आधार पर स्थित हैं और सरलता से पृथक् पहचाने जा सकते हैं, इसलिए यहाँ संसृष्टि है।
संकर अलंकार
परिभाषा: जहाँ दो या दो से अधिक अलंकार परस्पर इस प्रकार मिल जाएँ कि उन्हें अलग करना कठिन हो, वहाँ संकर अलंकार होता है। इसे नीर-क्षीर न्याय कहा गया है – जिस प्रकार जल और दूध मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही यहाँ अलंकार घुल-मिल जाते हैं।
उदाहरण:
काली घटा का घमंड घटा।
स्पष्टीकरण: यहाँ 'घटा' शब्द दो बार भिन्न अर्थों में आया है – पहले बादल तथा बाद में कम होना – अतः यमक है। साथ ही इन्हीं शब्दों में 'घ' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास भी है। दोनों अलंकार एक ही शब्द-समूह पर एक साथ घटित हो रहे हैं और उन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता, इसलिए यह संकर है।
शब्दालंकार और अर्थालंकार में अंतर
| शब्दालंकार | अर्थालंकार |
| सौंदर्य का आधार शब्द होता है। | सौंदर्य का आधार अर्थ होता है। |
| शब्द बदल देने पर अलंकार समाप्त हो जाता है। | शब्द बदल देने पर भी अलंकार प्रायः बना रहता है। |
| मुख्य प्रभाव ध्वनि एवं शब्द-चमत्कार का होता है। | मुख्य प्रभाव भाव एवं अर्थ-चमत्कार का होता है। |
शब्दालंकार के प्रमुख भेद हैं – अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्ति-प्रकाश तथा वीप्सा। अर्थालंकार के प्रमुख भेद हैं – उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, दृष्टांत, उदाहरण, संदेह, भ्रांतिमान, अन्योक्ति, व्यतिरेक, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिंग, विभावना, विशेषोक्ति तथा स्वभावोक्ति।
समान प्रतीत होने वाले अलंकारों में अंतर
यमक और श्लेष में अंतर
| यमक अलंकार | श्लेष अलंकार |
| एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है। | शब्द केवल एक बार आता है। |
| प्रत्येक बार उसका अर्थ अलग होता है। | एक ही शब्द से अनेक अर्थ निकलते हैं। |
| शब्द की पुनरावृत्ति आवश्यक होती है। | शब्द की पुनरावृत्ति आवश्यक नहीं होती। |
उपमा और रूपक में अंतर
| उपमा अलंकार | रूपक अलंकार |
| उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है। | उपमेय पर उपमान का सीधा आरोप किया जाता है। |
| सा, सी, सम, समान, सरिस आदि वाचक शब्द आते हैं। | वाचक शब्द नहीं आते। |
| उपमेय और उपमान का अलग-अलग अस्तित्व बना रहता है। | उपमेय और उपमान को एक ही मान लिया जाता है। |
विभावना और विशेषोक्ति में अंतर
| विभावना अलंकार | विशेषोक्ति अलंकार |
| कारण उपस्थित नहीं होता। | कारण उपस्थित होता है। |
| फिर भी कार्य हो जाता है। | फिर भी कार्य नहीं होता। |
| उदाहरण – बिनु पग चलै सुनै बिनु काना। | उदाहरण – नीर भरे नित प्रति रहैं, तउ न प्यास बुझाय। |
संदेह और भ्रांतिमान में अंतर
संदेह अलंकार में संशय अंत तक बना रहता है और कोई निश्चित निर्णय नहीं हो पाता; प्रायः वहाँ 'या', 'कि' जैसे संशय-सूचक शब्द मिलते हैं। इसके विपरीत भ्रांतिमान में संशय नहीं रहता, बल्कि निश्चित भ्रम हो जाता है और उस भ्रम के कारण की गई क्रिया का वर्णन भी मिलता है।
अलंकारों की पहचान के सूत्र
परीक्षा में अलंकार पहचानने के लिए ये संकेत सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं—
| संकेत | अलंकार |
| किसी वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अनुप्रास |
| एक शब्द दो बार, अर्थ भिन्न | यमक |
| एक शब्द एक बार, अर्थ अनेक | श्लेष |
| श्रोता द्वारा भिन्न अर्थ ग्रहण | वक्रोक्ति |
| सा, सी, सम, सरिस, समान | उपमा |
| वाचक शब्द के बिना सीधा आरोप | रूपक |
| मनु, मानो, जनु, जानो, इव | उत्प्रेक्षा |
| लोक-सीमा से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन | अतिशयोक्ति |
| निर्जीव या प्रकृति का मानवी व्यवहार | मानवीकरण |
| ऊपर से विरोध, वास्तव में नहीं | विरोधाभास |
| वाचक शब्द के बिना दृष्टांत | दृष्टांत |
| वाचक शब्द के साथ दृष्टांत | उदाहरण |
| अंत तक बना रहने वाला संशय | संदेह |
| निश्चित भ्रम | भ्रांतिमान |
| कहा किसी और को, लक्ष्य कोई और | अन्योक्ति |
| उपमेय, उपमान से श्रेष्ठ | व्यतिरेक |
| सामान्य का समर्थन विशेष से | अर्थान्तरन्यास |
| कथन के साथ कारण या युक्ति | काव्यलिंग |
| कारण नहीं, फिर भी कार्य | विभावना |
| कारण है, फिर भी कार्य नहीं | विशेषोक्ति |
| स्वाभाविक, यथार्थ वर्णन | स्वभावोक्ति |
अलंकार : अभ्यास प्रश्न
नीचे दिए गए प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से तैयार किए गए हैं। उत्तर देखने से पहले स्वयं हल करने का प्रयास कीजिए।
1. 'अलंकार' शब्द की व्युत्पत्ति किससे मानी जाती है?
(क) अलम् + कार (ख) अलम् + कृ + घञ् (ग) अलंकृ + तल् (घ) अल + कार
2. "काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते" – यह कथन किस आचार्य का है?
(क) भामह (ख) मम्मट (ग) दंडी (घ) विश्वनाथ
3. अलंकार के कितने मुख्य भेद माने जाते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच
4. "चारु चंद्र की चंचल किरणें" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक (ख) श्लेष (ग) अनुप्रास (घ) उपमा
5. जहाँ एक ही व्यंजन की आवृत्ति अनेक बार हो, वहाँ कौन-सा अनुप्रास होता है?
(क) छेकानुप्रास (ख) वृत्त्यानुप्रास (ग) लाटानुप्रास (घ) अन्त्यानुप्रास
6. "पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय" – यह किसका उदाहरण है?
(क) यमक (ख) लाटानुप्रास (ग) पुनरुक्ति-प्रकाश (घ) वीप्सा
7. अनुप्रास अलंकार के कितने भेद माने जाते हैं?
(क) तीन (ख) चार (ग) पाँच (घ) छह
8. "कनक कनक ते सौ गुनी" में 'कनक' के दो अर्थ हैं—
(क) सोना और चाँदी (ख) सोना और धतूरा (ग) गेहूँ और कमल (घ) कमल और धतूरा
9. यमक अलंकार के भेद हैं—
(क) शब्द-यमक और अर्थ-यमक (ख) अभंग पद और सभंग पद (ग) पूर्ण और लुप्त (घ) संसृष्टि और संकर
10. "रहिमन पानी राखिए" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक (ख) श्लेष (ग) अनुप्रास (घ) रूपक
11. श्लेष का शाब्दिक अर्थ है—
(क) टूटा हुआ (ख) चिपका हुआ (ग) बढ़ा हुआ (घ) छिपा हुआ
12. "मधुर-मधुर मेरे दीपक जल" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक (ख) वीप्सा (ग) पुनरुक्ति-प्रकाश (घ) अनुप्रास
13. उपमा अलंकार के कितने अंग होते हैं?
(क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) पाँच
14. "पीपर पात सरिस मन डोला" – इसमें साधारण धर्म है—
(क) मन (ख) पीपल का पत्ता (ग) सरिस (घ) डोलना
15. "चरण-कमल बंदौं हरि राई" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा (ख) रूपक (ग) उत्प्रेक्षा (घ) श्लेष
16. 'मनो', 'जनु', 'मानहुँ' किस अलंकार के वाचक शब्द हैं?
(क) उपमा (ख) रूपक (ग) उत्प्रेक्षा (घ) संदेह
17. जहाँ उपमेय में उपमान का निश्चित भ्रम हो जाए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) संदेह (ख) भ्रांतिमान (ग) दृष्टांत (घ) विरोधाभास
18. "ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) अतिशयोक्ति (ख) विरोधाभास (ग) दृष्टांत (घ) अन्योक्ति
19. "सठ सुधरहिं सत संगति पाई, पारस परस कुधातु सुहाई" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा (ख) दृष्टांत (ग) रूपक (घ) संदेह
20. "माली आवत देखि के, कलियन करी पुकार" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) मानवीकरण (ख) अन्योक्ति (ग) रूपक (घ) उत्प्रेक्षा
21. तिल-तंडुल न्याय किस अलंकार से संबंधित है?
(क) संकर (ख) संसृष्टि (ग) श्लेष (घ) यमक
22. नीर-क्षीर न्याय किस अलंकार से संबंधित है?
(क) संसृष्टि (ख) संकर (ग) दृष्टांत (घ) उपमा
23. जहाँ श्रोता वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ ग्रहण करे, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) श्लेष (ख) वक्रोक्ति (ग) यमक (घ) अन्योक्ति
24. वक्रोक्ति अलंकार के भेद हैं—
(क) श्लेष वक्रोक्ति और काकु वक्रोक्ति (ख) अभंग और सभंग (ग) पूर्ण और लुप्त (घ) संसृष्टि और संकर
25. "निज परिताप द्रवइ नवनीता, पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा (ख) व्यतिरेक (ग) रूपक (घ) दृष्टांत
26. "बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) काव्यलिंग (ख) दृष्टांत (ग) अर्थान्तरन्यास (घ) विभावना
27. "बिनु पग चलै सुनै बिनु काना" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) विशेषोक्ति (ख) विभावना (ग) अतिशयोक्ति (घ) विरोधाभास
28. जहाँ कारण के उपस्थित रहते हुए भी कार्य न हो, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) विशेषोक्ति (ख) विभावना (ग) काव्यलिंग (घ) संदेह
29. "सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल" – इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक (ख) अतिशयोक्ति (ग) स्वभावोक्ति (घ) उपमा
30. दृष्टांत और उदाहरण अलंकार को अलग करने वाला मुख्य आधार क्या है?
(क) उपमेय की उपस्थिति (ख) वाचक शब्द की उपस्थिति (ग) बिंब-प्रतिबिंब भाव (घ) वाक्यों की संख्या
31. कथन की पुष्टि के लिए कारण अथवा युक्ति दिए जाने पर कौन-सा अलंकार होता है?
(क) अर्थान्तरन्यास (ख) दृष्टांत (ग) काव्यलिंग (घ) विभावना
उत्तरमाला देखें
1. (ख) 2. (ग) 3. (ख) 4. (ग) 5. (ख) 6. (ख) 7. (ग) 8. (ख) 9. (ख) 10. (ख) 11. (ख)
12. (ग) 13. (ग) 14. (घ) 15. (ख) 16. (ग) 17. (ख) 18. (ख) 19. (ख) 20. (ख) 21. (ख) 22. (ख)
23. (ख) 24. (क) 25. (ख) 26. (ग) 27. (ख) 28. (क) 29. (ग) 30. (ख) 31. (ग)
अलंकार से संबंधित सामान्य प्रश्न (FAQ)
अलंकार किसे कहते हैं?
जो काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को सुंदर, प्रभावशाली एवं आकर्षक बनाता है, उसे अलंकार कहते हैं।
अलंकार कितने प्रकार के होते हैं?
अलंकार मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं – शब्दालंकार, अर्थालंकार तथा उभयालंकार।
शब्दालंकार और अर्थालंकार में क्या अंतर है?
जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के कारण उत्पन्न हो, वहाँ शब्दालंकार तथा जहाँ सौंदर्य अर्थ, भाव या कल्पना के कारण उत्पन्न हो, वहाँ अर्थालंकार होता है।
उभयालंकार किसे कहते हैं?
जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्द और अर्थ दोनों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न हो, वहाँ उभयालंकार होता है। इसके दो भेद हैं – संसृष्टि और संकर।
संसृष्टि और संकर में क्या अंतर है?
संसृष्टि में दो या अधिक अलंकार आपस में मिले बिना अलग-अलग स्थिति में रहते हैं (तिल-तंडुल न्याय), जबकि संकर में वे इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग करना कठिन होता है (नीर-क्षीर न्याय)।
अनुप्रास अलंकार के कितने भेद होते हैं?
अनुप्रास अलंकार के मुख्यतः पाँच भेद होते हैं – छेकानुप्रास, वृत्त्यानुप्रास, श्रुत्यानुप्रास, अन्त्यानुप्रास तथा लाटानुप्रास।
यमक और श्लेष में क्या अंतर है?
यमक में एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ अलग होता है, जबकि श्लेष में शब्द केवल एक बार आता है, लेकिन उसके अनेक अर्थ निकलते हैं।
वक्रोक्ति अलंकार किसे कहते हैं?
जहाँ श्रोता वक्ता के कहे गए शब्दों का कोई दूसरा अर्थ ग्रहण कर ले, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। इसके दो भेद हैं – श्लेष वक्रोक्ति और काकु वक्रोक्ति।
उपमा और रूपक में क्या अंतर है?
उपमा में उपमेय और उपमान के बीच तुलना की जाती है और वाचक शब्द आते हैं, जबकि रूपक में उपमेय पर उपमान का सीधा आरोप कर दिया जाता है और वाचक शब्द नहीं आते।
दृष्टांत और उदाहरण अलंकार में क्या अंतर है?
दृष्टांत में कोई वाचक शब्द नहीं आता और दोनों वाक्यों में बिंब-प्रतिबिंब भाव होता है, जबकि उदाहरण अलंकार में ज्यों, त्यों, जैसे आदि वाचक शब्द आते हैं।
विभावना और विशेषोक्ति में क्या अंतर है?
विभावना में कारण के अभाव में भी कार्य हो जाता है, जबकि विशेषोक्ति में कारण उपस्थित रहने पर भी कार्य नहीं होता। दोनों परस्पर विपरीत हैं।
संदेह और भ्रांतिमान में क्या अंतर है?
संदेह में संशय अंत तक बना रहता है और कोई निश्चित निर्णय नहीं हो पाता, जबकि भ्रांतिमान में निश्चित भ्रम हो जाता है।
उपमा अलंकार के कितने अंग होते हैं?
उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं – उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द।
प्रतियोगी परीक्षाओं में कौन-कौन से अलंकार अधिक पूछे जाते हैं?
अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, व्यतिरेक, अर्थान्तरन्यास, संदेह तथा भ्रांतिमान प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछे जाने वाले अलंकार हैं।
अलंकार के कुछ उदाहरण दीजिए?
अनुप्रास का उदाहरण है 'चारु चंद्र की चंचल किरणें', यमक का उदाहरण है 'कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय', उपमा का उदाहरण है 'पीपर पात सरिस मन डोला' तथा रूपक का उदाहरण है 'चरण-कमल बंदौं हरि राई'। सभी प्रमुख अलंकारों के पूर्ण उदाहरण एवं स्पष्टीकरण ऊपर लेख में क्रमबद्ध रूप से दिए गए हैं।
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- रस : परिभाषा, प्रकार एवं उदाहरण
- छंद : परिभाषा, प्रकार एवं उदाहरण
- शब्द-शक्ति : अभिधा, लक्षणा और व्यंजना
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निष्कर्ष
अलंकार हिंदी काव्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्त्व है, जो भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा कलात्मक बनाता है। अलंकारों के उचित प्रयोग से काव्य में माधुर्य, चमत्कार और सौंदर्य का विकास होता है। हिंदी साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी अलंकार का सम्यक् ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। अलंकारों को रटने के स्थान पर उनके पहचान-सूत्रों और परस्पर अंतर को समझ लेना अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।
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