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अलंकार किसे कहते हैं? परिभाषा, भेद, उदाहरण, पहचान और अंतर

अलंकार शब्द का शाब्दिक अर्थ आभूषण है। जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा आकर्षक बनाते हैं। अलंकारों के प्रयोग से कविता में माधुर्य, चमत्कार, कलात्मकता और अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास होता है।

रस और छंद की भाँति अलंकार भी काव्यशास्त्र का एक अनिवार्य अंग है। यह केवल कविता की बाहरी सजावट नहीं है, बल्कि भावों को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी है।

अलंकार किसे कहते हैं?

"अलंकरोति इति अलंकारः"

जो तत्त्व काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा आकर्षक बनाता है, उसे अलंकार कहते हैं। सरल शब्दों में, जो काव्य की शोभा बढ़ाए और उसकी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाए, वही अलंकार कहलाता है।

अलंकार की व्युत्पत्ति

अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति अलम् + कृ + घञ् से मानी जाती है। यहाँ अलम् का अर्थ है – पर्याप्त, सुंदर अथवा शोभायुक्त तथा कृ का अर्थ है – करना। अर्थात् जो किसी वस्तु या काव्य को अलंकृत या सुशोभित करे, उसे अलंकार कहते हैं।

विद्वानों के अनुसार अलंकार

आचार्य मत
आचार्य भामह अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाला धर्म है।
आचार्य दंडी काव्य के शोभाकारक धर्मों को अलंकार कहा गया है।
आचार्य मम्मट अलंकार काव्य की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।
आचार्य विश्वनाथ अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले अस्थिर धर्म हैं।

अलंकार के भेद

अलंकार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

  • शब्दालंकार – जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों की विशेष व्यवस्था, पुनरावृत्ति अथवा ध्वनि के कारण उत्पन्न होता है।
  • अर्थालंकार – जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के अर्थ, भाव, कल्पना अथवा विचार के कारण उत्पन्न होता है।

अलंकार की पहचान कैसे करें?

यदि किसी काव्य में शब्दों की विशेष पुनरावृत्ति, ध्वनि या शब्द-चमत्कार के कारण सौंदर्य उत्पन्न हो, तो वहाँ शब्दालंकार होता है। इसके विपरीत यदि सौंदर्य शब्दों के अर्थ, कल्पना, भाव या तुलना के कारण उत्पन्न हो, तो वहाँ अर्थालंकार होता है।

1. शब्दालंकार

अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar)

परिभाषा: जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की बार-बार आवृत्ति होकर काव्य में मधुरता उत्पन्न करे, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण:

चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल-थल में।

स्पष्टीकरण: यहाँ 'च' वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है, जिससे काव्य में मधुर ध्वनि उत्पन्न हुई है।

यमक अलंकार (Yamak Alankar)

परिभाषा: जहाँ एक ही शब्द एक से अधिक बार आए और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदाहरण:

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय॥

स्पष्टीकरण: पहले कनक का अर्थ धतूरा तथा दूसरे कनक का अर्थ सोना है। एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने पर भी दोनों बार अर्थ अलग-अलग हैं।

श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar)

परिभाषा: जहाँ शब्द केवल एक बार प्रयुक्त हो, लेकिन उसके अनेक अर्थ निकलें, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण:

रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

स्पष्टीकरण:

  • मोती के लिए — चमक (आभा)
  • मनुष्य के लिए — मान एवं प्रतिष्ठा
  • चूने के लिए — जल

पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार

परिभाषा: जहाँ किसी शब्द की पुनरावृत्ति से सौंदर्य उत्पन्न हो और दोनों बार अर्थ समान रहे, वहाँ पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार होता है।

उदाहरण:

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।

स्पष्टीकरण: यहाँ 'मधुर' शब्द की पुनरावृत्ति समान अर्थ में हुई है।

वीप्सा अलंकार

परिभाषा: जहाँ किसी भाव की तीव्रता या अधिकता प्रकट करने के लिए शब्दों की बार-बार पुनरावृत्ति की जाए, वहाँ वीप्सा अलंकार होता है।

उदाहरण:

हा! हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई।

स्पष्टीकरण: 'हा! हा!' की पुनरावृत्ति शोक की तीव्रता को व्यक्त कर रही है।

2. अर्थालंकार

उपमा अलंकार (Upma Alankar)

परिभाषा: जहाँ दो वस्तुओं के गुणों की समानता के आधार पर तुलना की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उदाहरण:

पीपर पात सरिस मन डोला।

स्पष्टीकरण: यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।

रूपक अलंकार (Rupak Alankar)

परिभाषा: जहाँ उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप कर दिया जाए अर्थात् दोनों को एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण:

चरण-कमल बंदौं हरि राई।

स्पष्टीकरण: यहाँ भगवान के चरणों पर कमल का सीधा आरोप किया गया है। अतः यह रूपक अलंकार है।

उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar)

परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना व्यक्त की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

उदाहरण:

सोहत ओढ़े पीत पट, सलोने गात।
मनो नीलमणि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात॥

स्पष्टीकरण: उत्प्रेक्षा अलंकार में मनु, मानो, जनु, जानो, इव आदि शब्दों का प्रयोग होता है।  यहाँ 'मनो' शब्द संभावना प्रकट कर रहा है, इसलिए उत्प्रेक्षा अलंकार है।

अतिशयोक्ति अलंकार (Atishayokti Alankar)

परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का वर्णन लोक-सीमा से बढ़ाकर किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण:

आगे नदिया पड़ी अपार,
घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार,
तब तक चेतक था उस पार॥

स्पष्टीकरण: यहाँ चेतक की गति का अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है, इसलिए अतिशयोक्ति अलंकार है।

मानवीकरण अलंकार

परिभाषा: जहाँ निर्जीव वस्तुओं, प्रकृति या अमूर्त भावों को मनुष्य के समान व्यवहार करते हुए दिखाया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

उदाहरण:

दिवसावसान का समय,
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुंदरी परी-सी।

स्पष्टीकरण: यहाँ संध्या को मानव (सुंदरी) के रूप में चित्रित किया गया है। इसलिए मानवीकरण अलंकार है।

विरोधाभास अलंकार

परिभाषा: जहाँ देखने में विरोध प्रतीत हो, किंतु वास्तव में विरोध न हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।

उदाहरण:

या अनुरागी चित्त की गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय॥

स्पष्टीकरण: सामान्यतः काले रंग में डूबने पर वस्तु मलिन होती है, किंतु यहाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबने पर मन अधिक उज्ज्वल होना बताया गया है। देखने में विरोध लगता है, पर वास्तव में विरोध नहीं है।

दृष्टांत अलंकार

परिभाषा: जहाँ किसी कथन को स्पष्ट करने के लिए प्रसिद्ध उदाहरण या सामान्य सत्य प्रस्तुत किया जाए, वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।

उदाहरण:

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात।

भावार्थ

जिस प्रकार कठपुतली स्वयं नहीं नाचती, बल्कि उसे डोर पकड़ने वाला व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार नचाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्मों के अनुसार जीवन में सुख-दुःख भोगता है और उसका जीवन कर्मों से संचालित होता है।

स्पष्टीकरण

यहाँ कठपुतली के नृत्य का प्रसिद्ध और सर्वविदित उदाहरण देकर मनुष्य के कर्माधीन होने की बात स्पष्ट की गई है। अर्थात जिस प्रकार कठपुतली डोर के अधीन रहती है, उसी प्रकार मनुष्य अपने कर्मों के अधीन रहता है। प्रसिद्ध उदाहरण के माध्यम से किसी सिद्धांत को स्पष्ट करने के कारण यहाँ दृष्टांत अलंकार है।

संदेह अलंकार

परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु के विषय में निश्चित निर्णय न होकर संदेह प्रकट किया जाए, वहाँ संदेह अलंकार होता है।

उदाहरण:

यह काया है या छाया है?

स्पष्टीकरण: यहाँ वास्तविक स्वरूप के विषय में निश्चित निर्णय नहीं है, बल्कि संदेह व्यक्त किया गया है।

शब्दालंकार और अर्थालंकार में अंतर

आधार शब्दालंकार अर्थालंकार
सौंदर्य का आधार शब्द अर्थ
यदि शब्द बदल दिए जाएँ अलंकार समाप्त हो जाता है। अलंकार प्रायः बना रहता है।
मुख्य प्रभाव ध्वनि एवं शब्द-चमत्कार भाव एवं अर्थ-चमत्कार
प्रमुख उदाहरण अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्ति-प्रकाश, वीप्सा उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, दृष्टांत, संदेह

समान प्रतीत होने वाले अलंकारों में अंतर

यमक और श्लेष में अंतर

यमक अलंकार श्लेष अलंकार
एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है। शब्द केवल एक बार आता है।
प्रत्येक बार उसका अर्थ अलग होता है। एक ही शब्द से अनेक अर्थ निकलते हैं।
शब्द की पुनरावृत्ति आवश्यक होती है। शब्द की पुनरावृत्ति आवश्यक नहीं होती।

उपमा और रूपक में अंतर

उपमा अलंकार रूपक अलंकार
उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है। उपमेय पर उपमान का सीधा आरोप किया जाता है।
जैसे, जैसा, सा, सी, समान, सरिस आदि तुलना-सूचक शब्द आते हैं। तुलना-सूचक शब्द नहीं आते।
दोनों का अलग-अलग अस्तित्व बना रहता है। उपमेय और उपमान को एक मान लिया जाता है।

अलंकार से संबंधित सामान्य प्रश्न (FAQ)

अलंकार किसे कहते हैं?

जो काव्य की भाषा, अर्थ और भाव को सुंदर, प्रभावशाली एवं आकर्षक बनाता है, उसे अलंकार कहते हैं।

अलंकार कितने प्रकार के होते हैं?

अलंकार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं— शब्दालंकार और अर्थालंकार।

शब्दालंकार और अर्थालंकार में क्या अंतर है?

जहाँ काव्य का सौंदर्य शब्दों के कारण उत्पन्न हो, वहाँ शब्दालंकार तथा जहाँ सौंदर्य अर्थ, भाव या कल्पना के कारण उत्पन्न हो, वहाँ अर्थालंकार होता है।

यमक और श्लेष में क्या अंतर है?

यमक में एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ अलग होता है, जबकि श्लेष में शब्द केवल एक बार आता है, लेकिन उसके अनेक अर्थ निकलते हैं।

उपमा और रूपक में क्या अंतर है?

उपमा में उपमेय और उपमान के बीच तुलना की जाती है, जबकि रूपक में उपमेय पर उपमान का सीधा आरोप कर दिया जाता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में कौन-कौन से अलंकार अधिक पूछे जाते हैं?

अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण तथा विरोधाभास प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछे जाने वाले अलंकार हैं।

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निष्कर्ष

अलंकार हिंदी काव्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्त्व है, जो भाषा, अर्थ और भाव को अधिक सुंदर, प्रभावशाली तथा कलात्मक बनाता है। अलंकारों के उचित प्रयोग से काव्य में माधुर्य, चमत्कार और सौंदर्य का विकास होता है। हिंदी साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ UGC NET, TGT, PGT, CTET, DSSSB, UP LT Grade तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अलंकार का सम्यक् ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।

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