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नवरात्रि पर्व का माहात्म्य : आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

नवरात्रि (नवरात्र शुद्ध है) पर्व देवी/शक्ति की पूजा का विशेष पर्व है जिसे पूरे भारत में हर्षोल्लास एवं आस्था पूर्वक मनाया जाता है। नवरात्रि में नौ दिन का व्रत रखने, पूजन-हवनादि करने व नियम-संयम पूर्वक रहने से देवी माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शक्ति की उपासना का यह पर्व वैदिक काल के भी पूर्व से मनाया जा रहा है और यह परंपरा देवनदी की अजस्र, अविरल धारा की भाँति अधुनातन प्रवहमान है।

ॐ दुर्गा देव्यै नमोस्तुते!

नवरात्रि का पर्व मुख्यत: वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक चैत्र मास में वासंतिक नवरात्र और पुनः आश्विन मास में शारदीय नवरात्र। उत्तर भारत के कुछ स्थानों पर आषाढ़ माह में 'आषाढ़ी' नवरात्र भी होता है। शारदीय नवरात्र शरद ऋतु के आरंभ में आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि को आरंभ होता है और नवमी तिथि तक चलता है। प्रतिपदा तिथि को कलश-स्थापना की जाती है और नौ दिन विधि-विधान पूर्वक पूजन व दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। पूजनोपरांत नवमी तिथि को हवन की जाती है। दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। चूँकि यह तिथि हिन्दू पंचांग (चंद्र-कैलेंडर) पर आधारित है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार शारदीय नवरात्र का आरंभ प्रतिवर्ष सितंबर या अक्टूबर माह में पड़ता है — सटीक तिथि प्रत्येक वर्ष पंचांग देखकर जानी जा सकती है।

भगवान श्रीराम ने इसी शारदीय नवरात्र में देवी चंडी का पूजन लंका के समुद्र तट पर किया था।

देवी के नौ रूप - नवदुर्गा

नवरात्र के नौ दिन क्रमशः देवी के नौ रूपों की पूजा होती है जिन्हें हम नवदुर्गा कहते हैं। नवदुर्गा के नौ रूप इस प्रकार हैं:

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:॥ (श्रीदुर्गासप्तशती)

उपर्युक्त श्लोक के अनुसार — प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चन्द्रघण्टा, चतुर्थ कूष्माण्डा, पंचम स्कंदमाता, षष्ठम कात्यायनी, सप्तम कालरात्रि, अष्टम महागौरी, नवम सिद्धिदात्री। ये दुर्गा के नौ रूप नवदुर्गा के नाम से जाने जाते हैं और नवरात्र के नौ दिन क्रमशः इन्हीं रूपों की पूजा होती है।

ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम्॥
ॐ नमश्चंडिकायै!

नवरात्रि का माहात्म्य : पौराणिक कथा

लंका-युद्ध के समय ब्रह्माजी ने रावण का वध करने के लिए राम से चंडी देवी को प्रसन्न करने को कहा और उनकी पूजा का सम्पूर्ण विधान बताया। ब्रह्माजी के निर्देशानुसार पूजन सामग्री की व्यवस्था की गयी। इसमें हवन के निमित्त १०८ दुर्लभ नीलकमल की भी व्यवस्था की गयी और श्रीराम ने देवी के प्रीत्यर्थ पूजन अनुष्ठान आरंभ किया।

यह बात रावण को भी पता चली। उसने भी अपनी जीत के लिए चंडी देवी को प्रसन्न करने का पूजन-विधान आरंभ कर दिया। समांतर ही, राम की पूजा सम्पन्न न होने पाये यह विचारकर अपनी मायावी शक्ति से पूजा के लिए लाये गए १०८ दुर्लभ नीलकमलों में से एक पुष्प गायब कर दिया। तत्समय नीलकमल मिल पाना असंभव प्रतीत हो रहा था। ऐसे में अनुष्ठान का संकल्प टूट जाता। तभी नीलकमल के समान नेत्रों वाले प्रभु श्रीराम संकल्प पूर्ण करने के उद्देश्य से अपना एक नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर से तीर निकालने को उद्यत हुए। तत्क्षण देवी माँ प्रकट हुईं और राम के समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें विजयश्री का वरदान दिया।

नवरात्रि कैसे मनाई जाती है

नवरात्रि का पर्व विधि-विधानपूर्वक मनाया जाता है, जिसमें कई प्रमुख अनुष्ठान शामिल होते हैं:

घटस्थापना (कलश-स्थापना): प्रतिपदा तिथि को शुभ मुहूर्त में मिट्टी के पात्र में जौ बोकर उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। यह देवी शक्ति के आवाहन का प्रतीक माना जाता है, और यहीं से नौ दिनों की पूजा का आरंभ होता है।

अखंड ज्योति: कई भक्त घटस्थापना के साथ ही नौ दिनों तक निरंतर जलने वाली अखंड ज्योति (दीपक) प्रज्वलित करते हैं, जो देवी की कृपा और सतत आराधना का प्रतीक मानी जाती है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ: नौ दिनों तक प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ) का पाठ किया जाता है, जिसमें देवी दुर्गा की विभिन्न लीलाओं और महिषासुर वध की कथा का वर्णन है।

कन्या पूजन: अष्टमी या नवमी तिथि को छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं।

हवन: नवमी तिथि को पूजन के समापन पर हवन किया जाता है, जिसमें अग्नि को आहुति देकर देवी का आभार व्यक्त किया जाता है।

विजयादशमी (दशहरा): दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है — इसी दिन मूर्ति-विसर्जन भी किया जाता है।

नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

जैसा कि विदित है, नवरात्र वर्ष में मुख्य रूप से दो बार मनाया जाता है — वसंत ऋतु में और शरद ऋतु में। दोनों ही ऋतुओं का यह काल संक्रमण का काल होता है। वातावरण में त्वरित परिवर्तन देखने को मिलता है और वायु में रोगाणुओं की संख्या बढ़ जाती है और वे सक्रिय हो उठते हैं। स्वाभाविक रूप से इस संक्रमणकाल में रोग-बीमारियों का खतरा अपेक्षाकृत बढ़ जाता है। ऐसे समय में व्रत-उपवास करने और नियम-संयम का पालन करने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। शरीर वातावरण के साथ अनुकूलन करता है और हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

इस समय हवनादि करने से वातावरण भी शुद्ध होता है। शरीर के साथ-साथ हम मानसिक रूप से भी स्वस्थ, सक्रिय, संतुलित और शक्तिशाली होते हैं। आजकल की तनाव और भागदौड़ भरी जीवन-शैली में इसका महत्व और बढ़ जाता है।

भारत में नवरात्रि

भारत के विभिन्न भागों में नवरात्रि अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है। गुजरात में यह पर्व गरबा और डांडिया रास के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है — रात्रि में लोग पारंपरिक परिधानों में सजकर गोलाकार घूमते हुए, ताली बजाकर या डांडिया की लकड़ियों से नृत्य करते हैं। यह उत्सव अब पूरे भारत और विदेशों में भी बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा है।

पश्चिम बंगाल में शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा के रूप में मनाई जाती है, जो वहाँ का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। भव्य पंडाल सजाए जाते हैं, कलाकारों द्वारा देवी दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं, और पूजन के बाद विसर्जन की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। उत्तर-प्रदेश के सुलतानपुर जिले में भी कलकत्ता की तरह दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन होता है।

उत्तर भारत में नवरात्रि के साथ-साथ रामलीला का मंचन भी होता है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन-चरित्र और रावण-वध की कथा का नाट्य-रूपांतरण प्रस्तुत किया जाता है, और दसवें दिन रावण के पुतले का दहन कर दशहरा मनाया जाता है। वहीं दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक में, नवरात्रि "गोलू" (या बोम्मई कोलू) के रूप में मनाई जाती है, जिसमें घरों में देवी-देवताओं, पौराणिक पात्रों और गुड़ियों की सीढ़ीनुमा प्रदर्शनी सजाई जाती है, और पड़ोसी-परिजन एक-दूसरे के घर गोलू देखने जाते हैं।

नवरात्रि पर्व से संबंधित कुछ विशेष तथ्य

  • नवरात्र को नवरात्रि, नवराते, माँ के जगराते आदि नामों से भी जाना जाता है।
  • शारदीय और वासंतिक के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश आदि कुछ स्थानों पर आषाढ़ी नवरात्र भी मनाया जाता है।
  • शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: नवरात्रि वर्ष में कितनी बार मनाई जाती है?
उत्तर: मुख्य रूप से नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाई जाती है — चैत्र मास में वासंतिक नवरात्र और आश्विन मास में शारदीय नवरात्र। कुछ स्थानों पर आषाढ़ माह में आषाढ़ी नवरात्र भी मनाई जाती है।

प्रश्न: नवरात्रि में किन नौ देवियों की पूजा होती है?
उत्तर: नवरात्रि के नौ दिनों में क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री — इन नवदुर्गा रूपों की पूजा होती है।

प्रश्न: शारदीय नवरात्र का आरंभ कब होता है?
उत्तर: शारदीय नवरात्र आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होकर नवमी तिथि तक चलता है, और दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः सितंबर-अक्टूबर में पड़ता है।

प्रश्न: नवरात्रि व्रत का वैज्ञानिक महत्व क्या है?
उत्तर: वसंत और शरद ऋतु के संक्रमण-काल में रोगाणुओं की सक्रियता बढ़ जाती है; इस समय व्रत-उपवास और नियम-संयम से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

प्रश्न: नवरात्रि और दशहरा में क्या संबंध है?
उत्तर: नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा-आराधना के बाद दसवें दिन दशहरा (विजयादशमी) मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है — मान्यता है कि इसी दिन श्रीराम ने रावण का वध किया था।

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

नवरात्रि (नवरात्र शुद्ध है) की शुभकामनाएँ!

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